यू तो अपना आजमगढ़ हमेशा खबरों की सुर्खियों में रहा है। आज भी और आदि में भी था। कभी ऋषि - मुनियों की तपस्थली के रूप में, कभी स्वतंत्रता सेनानियों के धरती के रूप में, कभी कवियों, शायरों, लेखकों और विचारकों के गढ़ के रूप में इसके अलावा भी मार्क्सवादी विचार धारा के लोग भी कुछ ऐसा ही रोल अदा करते है जिसकी वजह से आजमगढ़ को उत्तर प्रदेश का केरल भी कहा जाता है। इतना ही नहीं पुलिस की फर्जी छापेमारी और मिडिया की निर्विचार चहलकदमी (जिसे कुछ लोग मीडिया की चुतियापा भी कहते हैं ) ने इसे रौदते हुए शुर्खियो में रखा जिसकी वजह से इसे आतंक की नर्सरी के रूप में भी कुछ बचकाने उल्लुओ ने देखना शुरू कर दिया। हालाँकि ऐसे उल्लुओ ने आत्महित के लिए पुरजोर बुढ़भस और बौखलाहट दिखाई जिसमे वे कदाचित सफल भी रहे लेकिन ये सफलता लोकाभिमुख नहीं थी। इस ब्लॉग की फाइल में अटैच फोटु की वजह से आज-कल आजमगढ़ को एक बार फिर बेपनाह किया गया है खैर ये उस मजलिश के लोग है जिसे समाजवादी पार्टी के सेवक के तौर पर जाना जाता है। मेरा व्यक्तिगत मानना है की हम ऐसे सेवकों से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं कर सकते क्योंकि जिस मजलिश की नियत ही दादागिरी और परिवारगिरी जैसी मान्यताओ पर चलती दिखती है उससे हम लोकाभिमुख कार्य प्रणाली की बात नहीं कर सकते है।
