अपने कैफ़ी आज़मी साब कहा करते थे,
"कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले
उस इन्कलाब का, जो आज तक उधार सा है।"
आज भी हम गणतंत्र दिवस जैसे पवित्र पर्व पर किसी मेहमान को सौदे के लिए बुलाते है। आज़ादी की जश्न के लिए नहीं। क्या हम राष्ट्रीय पर्वों पर भी विदेशी सौदेबाजी को निषिद्ध नहीं कर पा रहे है। आज अवाम यह समझ नहीं पा रहा है कि वो मंत्रमुग्ध कर रहे है या आज्ञालंघन। इन दोनों में चाहे जो भी हो, आज अवाम इस भोगाधिकार को झेल रहा है।
"कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले
उस इन्कलाब का, जो आज तक उधार सा है।"
आज भी हम गणतंत्र दिवस जैसे पवित्र पर्व पर किसी मेहमान को सौदे के लिए बुलाते है। आज़ादी की जश्न के लिए नहीं। क्या हम राष्ट्रीय पर्वों पर भी विदेशी सौदेबाजी को निषिद्ध नहीं कर पा रहे है। आज अवाम यह समझ नहीं पा रहा है कि वो मंत्रमुग्ध कर रहे है या आज्ञालंघन। इन दोनों में चाहे जो भी हो, आज अवाम इस भोगाधिकार को झेल रहा है।