Friday, 11 November 2016

हालत - ए - शिक्षा

आज हमारे देश में कुछ स्कूलों में कुछ छोटे बच्चों को प्रवेश इस लिए नहीं दिए जा रहे है क्योंकि उनके माता पिता निरक्षर है। मुझे लगता है कि ये उसी मज़लिस के क्रूर सोच के पक्षधर है जो निरक्षर को निरक्षर तथा गरीब को और गरीब बनाने की साजिशे रचते है। इस लिए ऐसे मज़लिस के मज़मून की मज़ाल को समझना जरुरी है। जरा सोचिये जिस देश की सरकार सर्व शिक्षा अभियान जैसे महत्वपूर्ण मिशन चला रही हो। "पढ़ेगा भारत, बढ़ेगा भारत" जैसे वैचारिक नारे दिए जा रहे हो। ऐसे दौर में इस तरह के लोमहर्षक नियम बनाना इन महत्वपूर्ण मिशन को तमाचा मारने जैसा है और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तपके के साथ घोर अन्याय है। मैं इस देश की सरकार तथा राज्य सरकारों से यह उम्मीद करता हूँ कि ऐसे संवेदनशील मुद्दो से अंजान न बने, ऐसे स्कूलों को चिन्हित कर इनके संविधान को बदलवाए और अगर ये नहीं मानते है तो इनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए।
ये तो प्राथमिक शिक्षा का हाल है। अग़र हम उच्च शिक्षा पर नजर डाले तो इनकी वैचारिक हालत और भी निकम्मी है। शायद आज हमारे देश का कोई भी शख्स इस कथन से असहमत नहीं होगा की हमारे देश की उच्च शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा भाग चमचा युग में जी रही है। उपरोक्त दोनों दशाये वेहद खतरनाक है इन्हे सुधारने के लिए बड़े बदलाव की जरुरत है।
मेरे भारत, मेरे हिन्दोस्ताँ, मेरे इंडिया मैं तुमसे यही कहना चाहता हूँ कि तुम्हारी ये हालत हम जैसे लोग सुधारंगे………
राघवेन्द्र यादव
इन्कलाब - जिंदाबाद