Monday, 12 June 2017

एमफिल/पीएचडी में दाखिला के लिए दोहरा मापदंड क्यों?

भारत के राजपत्र, भाग-3 , खंड-4 , जो 5  मई 2016 को प्रकाशित हुआ के धारा 2 और 3 के उप  धारा 2.1, 2.2 और 3.1, 3.2 के तहत ऍमफील/पीएचडी में दाख़िला लेने के लिए स्नातकोत्तर उपाधि  या उसके समतुल्य में कम से कम 55% अंक या इसके समकक्ष ग्रेड प्राप्त हो। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जन जाति/अन्य पिछड़ा वर्ग (गैर लाभान्वित श्रेणी) को 5% की छूट या ग्रेड में समतुल्य छूट प्रदान की जाएगी। यूजीसी द्वारा बनाया गया यह प्रतिमान भारत में पढ़ने वाले छात्रों के लिए है।  भारत के बाहर अर्थात विदेश में पढ़ने वाले भारतीयों के अलग प्रतिमान है। उनके लिए, विदेशी शैक्षणिक संस्थान से स्नातकोत्तर उपाधि  या उसके समतुल्य की उपाधि प्राप्त की हो जो ऐसे किसी सांविधिक प्राधिकरण द्वारा या ऐसे एक प्राधिकरण के अंतर्गत स्वीकृत एवं प्रत्यायित है जो कि उस देश में किसी कानून के अंतर्गत स्थापित अथवा निगमित हो। अब सवाल यह है कि कोई छात्र भारत के टॉप शैक्षणिक संस्थान में पढ़ता हो जो गुणवत्ता एवं मानकों को सुनिश्चित करने एवं उनके आकलन, प्रत्यायन हेतू सांविधिक प्राधिकरण के अंतर्गत स्वीकृत एवं प्रत्यायित है। जो कि भारत के कानून के अंतर्गत स्थापित एवं निगमित है। उसके लिए परास्नातक में 55% का बैरियर और विदेश में पढ़ने वाले छात्रों के लिए सिर्फ स्नातकोत्तर या उसके समतुल्य की उपाधि। उनके लिए कोई पर्सेंटेज बैरियर नहीं। आख़िर ऐसा दोहरा मापदंड क्यों? क्योंकि विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्र इलीट क्लास के होते है। ये बड़े-बड़े नेता, आढ़तिया नौकरशाह, बड़े-बड़े बिजनेसमैन या लाख में हर महीने तनख्वाह उठाने वाले प्रोफ़ेसर्स के बेटे-बेटियाँ होती है। इसलिए उनको परास्नातक के प्रतिशतता में छूट मिलती है और भारत में पढ़ने वाले छात्रों के लिए प्रतिशतता का बैरियर इस लिए लगाया जाता है कि वंचित तपका और रिमोट (सुदूरवर्ती) और शैक्षणिक रूप से पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों  को शोध में दाख़िला लेने से रोका जा सके। एक कोर्स में दाख़िला के लिए ये दोहरा मापदंड न्याय संगत नहीं है। यह नियम पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों  को अप्रत्यक्ष रूप से उच्तम शिक्षा से वंचित करने का एक शातिर प्रयास सिद्ध हो रहा है।  अगर रिमोट (सुदूरवर्ती) और शैक्षणिक रूप से पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के छात्र शोध कार्य से वंचित रहे तो सामाजिक न्याय की आधारशिला एक अपूर्ण स्वप्न बन कर रह जाएगी।  सरकार के कानून निर्माताओं को चाहिए कि वे भारत में पढ़ने वाले छात्रों को भी परास्नातक या समकक्ष की उपाधि प्राप्त करना ही ऍमफील/पीएचडी की न्यूनतम योग्यता सुनिश्चित करें।