संजय साहनी: बदलाव की नई कहानी
राघवेंद्र यादव *
चंद्रमणि **
परिचय और संघर्ष:
संजय कुमार (सहनी) पिछले 8 सालों से नागरिक समस्याओं
के समाधान, किसानों, मजदूरों और मजलूमों की आवाज बनते रहें हैं।
बात चाहे मनरेगा के तहत लोगों (महिला और पुरुष) को रोजगार दिलवाने में मदद की हो या
लाकडाउन के समय पूरे भारत में फंसे हुए बिहार के प्रवासी कामगारों को सहयोग करने की
या फिर खाद्यान्न के जमाखोरों के खिलाफ लड़ाई लड़कर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत
परिवारों को निर्धारित राशन सुनिश्चित कराने की; इन सब में संजय सहनी अग्रणीय रहें
हैं। वे महिलाओं, श्रमिकों व अल्पसंख्यकों को संगठित कर पितृसत्ता, उच्च-जाति के भेद-भाव
और शासन एवं प्रशासन की कुव्यवस्था के खिलाफ जमीनी स्तर पर लड़ रहें हैं। भारतीय नागरिकों को संविधान के भाग-चार, राज्य
के नीति निदेशक तत्व तथा अन्य में यह व्यवस्था की गई है कि राज्य लोगों के लिए भोजन,
मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बुढ़ापा, निःशक्तता तथा अन्य अनर्ह की दशाओं में लोक
सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त करने का प्रभावी उपबंध करेगा। किंतु ये अधिकार महज
कागजी सिद्ध होते है। इन अधिकारों को पाने
के लिए लोग लम्बे समय से संघर्षरत है लेकिन दुर्भाग्य यह कि राजनैतिक महत्वाकांक्षा
में पार्टियों को सिर्फ़ सत्ता ही दिखती हैं, उन्हें जन-कल्याण के लिए उनके बुनियादी
जरूरतें नहीं।
भारतीय राजनीति के अतीत में, राजनीति के बड़े हिस्से पर सामंतियों
का अबैध कब्ज़ा रहा है। वे सत्ता हासिल करने के लिए कट्टा और गट्टा का इस्तेमाल करते
रहे है। भारतीय राजनीति को कट्टा और गट्टा की लड़ाई भी कही जाती है। आज भी इसपर (राजनीति)
अप्रत्यक्ष रूप से धनपशुओं और बाहुबलियों का कब्ज़ा है। वास्तव में ऐसी स्थितियां हमें
यह सोचने पर विवश करती है कि क्या यही लोकतंत्र है जिसकी बात भारत के संविधान के प्रस्तावना
में की गई है? भारतीय राजनीति के इस बाजारवाद में
एक मनरेगा मजदूर का विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में आना किसी
वर्तमान चमत्कार से कम नहीं है। वो भी उस दौर में जब गिरते राजनीतिक स्तर की वजह से
“भले लोग” राजनीति में आने से कतरा रहें हो। ऐसा नहीं है कि इसके पहले भारतीय राजनीति
के इतिहास में कोई व्यक्ति अंतिम पायदान से राजनीति में नहीं आया है लेकिन इनकी संख्या
अत्यल्प रही है। इक्कीशवी शदी का दूसरा दशक बाहुबल का चरमोत्कर्ष होगा। इसके बाद भारतीय
राजनीति में बाहुबल का ह्रास होगा। यह बदलाव की मांग है कि अब कट्टा और गट्टा से लड़ाई
नहीं बल्कि लड़ाई कलम और जमीनी संघर्ष से होगी। अगर संजय सहनी विधायक चुनकर आते है
तो वे संविधान प्रदत्त अधिकारों को जारूकता के माध्यम से लोक-अनुक्षेत्र में लाएंगे।
इसका लाभ पंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे इसके लिए संघर्ष करेंगे।
शिक्षा:
वह बिहार जो अपने अतीत में शिक्षा एवं समृद्धि के
मामलों में विश्व विख्यात था। जब पूरे विश्व में अशिक्षितों की संख्या वृहद थी तब यहाँ
(बिहार में) नालन्दा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय ज्ञान की अलख जगा रहे थे। लेकिन दुर्भाग्य
यह है कि वर्तमान में बिहार में स्कूली शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालयी शिक्षा तक की
हालत बेहद खस्ता हो गई है जिसके कारण गुणवत्तापरक शिक्षा पाने के लिए यहाँ से प्रतिभावों
को पलायन करना पड़ता है। बिहार में कुछ एक विश्वविद्यालयों को छोड़कर ज्यादातर विश्वविद्यालय
के सत्र लेट है। ऐसे में कई युवाओं को रोजगार पाने में परेशानियाँ होती है। अगर यह कहा जाय कि यह विलम्ब
व्यवस्थात्मक रूप से प्रायोजित है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इन मुद्दों को आज राजनीतिक
पार्टियां अपना चुनावी एजेंडा नहीं बनाती जबकि ये मुख्य एजेंडे में होना चाहिए। वे
(सभी राजनितिक पार्टियाँ) जाति-पाति की राजनीति में लोगों को बांध कर अपनी रोटियां
सेंकती है। अगर जमीनी हकीकत की बात करें तो प्राथमिक/सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों
को गुणवत्तापरक शिक्षा नहीं मिल पा रही है। इसके कई वजहें है। एक तो अध्यापकों की कमी
है दूसरे जो है उनमें अच्छी ट्रेनिंग का अभाव है। इसके आलावा कुछ शिक्षक-शिक्षिकाएं
निर्धारित समय पर स्कूल नहीं आते अगर आते भी है तो उनमे कुछ समय पर कक्षाओं में नहीं
जाते। स्कूलों में संसाधनों का अभाव भी शैक्षणिक पिछड़ेपन का एक बड़ा वजह है। बिहार के
कुछ जिलों और केन्द्रों पर यह भी पाया गया है कि कागज़ पर नामांकन कुछ और है किन्तु
वास्तविकता कुछ और है। शासन और प्रशासन इसका या तो निगरानी और निरीक्षण नहीं करते या
‘ले-दे’ कर मुद्दे को शांत कर देतें है। उच्च शिक्षा में यहाँ सरकारी स्तर पर रोजगारपरक
शिक्षा देने वाले टेक्निकल कॉलेजों की कमी के कारण कई गरीब छात्र जिनके पास टैलेंट
है किंतु पैसे नहीं वे दाखिला से वंचित रह जाते हैं। इन सभी मुद्दों के लिए संजय सहनी
संघर्ष करेंगे।
स्वास्थ्य:
मुजफ्फरपुर क्षेत्र चमकी बुखार (एक्यूट इंसेफेलाइटिस
सिंड्रोम) से प्रभावित क्षेत्र है। यह बच्चों में पाई जाने वाली बीमारी हैं जो इसके
आस-पास के जिलों में संभवतः अप्रैल-जून के बीच बड़े पैमाने पर होता आ रहा हैं किंतु
स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही, सुविधा एवं जागरूकता की कमी से अनेकानेक बच्चे साल दर साल बेमौत मर जाते है।
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों की कमी, अस्पताल में डाक्टर व अन्य स्वास्थ्य
कर्मियों की घोर कमी, आधुनिक जाँच मशीनों और दवाइयों की कम उपलब्धता इत्यादि कई महत्वपूर्ण
कारण है जिससे इस तरह की अनैच्छिक घटनाएं होती है। परिणाम स्वरूप नवदीप के चिराग बिना
जले ही बुझ जाते है। संजय सहनी अपने घोषणा पत्र में यह दावा किये है कि अगर वे विधायक
चुनकर आते है तो मनियारी में बंद पड़े महंत दर्शन दास अस्पताल को पुनः चालू करवाएंगे
तथा इसके साथ ही साथ कुढ़नी विधानसभा के अंतर्गत आने वाले बंद पड़े सभी प्राथमिक स्वास्थ्य
केंद्रों को तत्काल प्रभाव से पुनः चालू करवाएंगे। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और
अस्पतालों का सही संचालन और उनमें आधुनिक सुविधा और पर्याप्त दवाइयां उपलब्ध करवाएंगे।
रोजगार:
सरकार की सबसे बड़ी नाकामी हैं बिहार में राज्याश्रित
विभागों और संस्थाओं में सीटे खाली हैं किंतु सरकार उन रिक्तियों पर आज तक बहाली नहीं
करवा पायी है। अगर वे विधायक बनकर आएंगे तो शिक्षकों एवं अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति,
ट्रेनिंग और जबाबदेही सुनिश्चित करवाएंगे। वे सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग को बढ़ावा
देंगे जिससे घरेलू उद्योगों को मजबूती मिलेगी। संजय सहनी खुद एक मनरेगा मजदूर है वे
सालों से इसके सही इम्प्लीमेंटेशन के लिए काम कर रहे हैं। वे इसकी मजदूरी बढ़वाने के लिए विधानसभा में आवाज उठाएंगे।
संजय सहनी अपने भाषणों और घोषणापत्र में यह दावा किये है कि सभी सरकारी अनुबंध कर्मचारियों,
आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी सेविका, सहायिका, रोजगार सेवक सहित अन्य कर्मचारियों के वेतन
में वृद्धि की मांग करेंगे तथा साथ ही इनके मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष करेंगे।
वे संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में रोजगार सृजित करेंगे। महिलाओं को सुरक्षा
और सशक्तिकरण उनके संघर्षों के मूल में होगा। उनके घोषणा पत्र में यह भी दावा किया
गया है कि सभी योग्य व्यक्तियों के लिए वृद्ध, विधवा और विकलांग पेंशन स्वीकृति करवाना
तथा इसकी राशि बढ़वाना। सभी को राशन कार्ड निर्गत करवाना तथा उस पर सरकार द्वारा निर्धारित
पूरा राशन उपलब्ध करवाना। यह अच्छी खबर है कि वैश्विक ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री
प्रोफेसर ज्यां द्रेज जिन्होंने नरेगा योजना निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई,
वे संजय सहनी के पक्ष में कैम्पेन कर रहें हैं।
उद्योग और आधारभूत संरचना:
मुजफ्फरपुर जनपद उत्तर बिहार की कथित राजधानी हैं
यहाँ कई बड़े प्रोजेक्ट्स जैसे - हवाईअड्डा, रेलवे कारखाना भारत वैगन, दवा की फैक्ट्री
आईडीबीएल, मोतीपुर चीनी मिल जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय स्तर की इकाई बन्द हो गई जो
लोगों के रोजगार एवं क्षेत्र के संरचनात्मक विकास और समृद्धि की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण
थीं। दूरदर्शन केंद्र भी यहां बदहाली में अपनी आखिरी साँसे ले रहा हैं किंतु सोये जनप्रतिनिधियों
का इससे कोई सरोकार नहीं हैं। वर्तमान नगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक नगर विकास मंत्री
हैं। मुजफ्फरपुर स्मार्ट सिटी घोषित होने के बाद भी यह लगातार अपने निम्न स्तर पर रहा
जिसके लिए जनप्रतिनिधियों की उदासीन और ढुलमुल रवैया भी जिम्मेदार है। यदि महात्मा गाँधी सेतु के समानांतर रेलवे पुल बनाया
जाय तो बिहार की समृद्धि को यह चार चांद लगायेगा। ज्ञात हो कि उत्तर बिहार को दक्षिण
बिहार से जोड़ने में महात्मा गाँधी सेतु का महत्वपूर्ण योगदान हैं। अगर यह रेलवे कनेक्ट
हो गया तो जनता और उद्यमियों का पैसा और समय दोनों बचेगा। इसके अलावा
मुजफ्फरपुर लीची, लहठी और सूती कपड़ो के लिये विश्वविख्यात हैं किंतु जनप्रतिनिधियों
का इसपर भी कोई ध्यान नहीं हैं जिसमें उद्योग की अपार संभावनाएं हैं लेकिन दुर्भाग्य
कि न तो इसपर सरकारें (केंद्र और राज्य) ध्यान दे रही है और न ही उद्योगपति। यहाँ कंपिनयों
को उचित साधन-संसाधन एवं उधमी को पर्याप्त सुरक्षा न मिलना भी मुख्य कारणों में रहा
है। यहाँ की टूटी एवं सिमटी सड़कें तथा जलजमाव
से भरे नाले मुँह चिढ़ाते है। अगर संजय सहनी विधायक चुन कर आते है तो इन सभी मुद्दों
पर प्रमुखता से ध्यान देंगे व इन सभी के लिए जमीनी संघर्ष करेंगे। कोसी नदी जिसे बिहार
का शोक भी कहा जाता है, से बिहार बाढ़ प्रभावित रहता है। इससे बचाव के लिए मजबूत कदम
उठाएंगे।
जनता से अपील:
वह बिहार जो कभी पूरे भारत का शासन मगध साम्राज्य
के द्वारा पाटलिपुत्र (पटना) पर केंद्रित था। विश्व का प्रथम गणतंत्र घोषित करने वाला
गणराज्य लिच्छवी गणराज्य ( वैशाली ) बिहार में ही अवस्थित हैं। आज बिहार जिन ऊंचाइयों
को पाने के लिए लड़ रहा है वह इतिहास में बहुत पहले ही पा लिया था किंतु राजनीतिक, सामाजिक
और आर्थिक लचर नीतियों और कुरीतियों की वजह से इससे वंचित है। इसलिए जनता को यह चाहिए
कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर, जाति-धर्म को छोड़कर, धन-बल और बाहु-बल को धक्का देकर,
दल्लों-दलालों और चमचों को धिक्कारकर, धन-पशुओं को खदेड़कर, राजनीतिक घरानों के लाड़लों/लाड़लियों
को नकारकर समाज के निचले पायदान से आने वाले ऐसे व्यक्ति को चुनें जो इस देश के हासिये
के किसानों, मजदूरों, मजलूमों और वंचितों की आवाज बन सके। उनके दुःख-दर्द को महसूस
करे तथा उसके लिए संघर्ष करे। हमें शासक नहीं, प्रतिनिधि चाहिए। हमें एक ऐसा समाज चाहिए
जिसमें कतार में खडा आख़िरी व्यक्ति भी मर्यादा और सम्मान के साथ जीवन यापन कर सके।
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*प्रथम लेखक: अर्थशास्त्र एवं आयोजन अध्ययन केंद्र,
केंद्रीय विश्वविद्यालय गुजरात में शोधरत है। raghavendra.pahal50@gmail.com पर
संपर्क कर सकते है।
**द्वितीय लेखक: युवा समाजसेवी & नारायण नर्सिंग
कॉलेज सासाराम बिहार में इंटर्न्स है।


