Wednesday, 1 December 2021

बाबू बागेश्वर यादव: एक बहुआयामी व्यक्तित्व

मेरे गांव के पड़ोसी गांव मसीविरमउवा (होशामपुर), आजमगढ़ में 1 दिसंबर 1912 को जन्में आदरणीय श्री बागेश्वर यादव जी उन गिने चुने वकीलों में थे जो समाज के नीचले तबके और गरीबों को उनका हक़ दिलाने के लिए लड़ते थे। वे सर्वग्राही नीति और निश्छल नीयत के धनी, मर्यादित वकील, समाज सुधारक, भविष्योन्मुखी, बेजुबानों के आवाज.... थे। मेरे बाबा जी मुझे बचपन में बाबू बागेश्वर जी के बारे में बताये थे कि वे जिस व्यक्ति का मुक़दमा लड़ते थे अगर वह गरीब है तो उस व्यक्ति से फीस नहीं लेते थे। वह व्यक्ति किसी सुदूर गांव से जिला पर (आजमगढ़ ) तारिक देखने गया है और अगर उसके पास पैसे नहीं है तो बाबू बागेश्वर जी उसे अपनी जेब से किराया देते थे। मेरे बाबा जी यह भी बताये थे कि बाबू बागेश्वर जी सामाजिक और धार्मिक कुरूतियों के खिलाप भी लड़ते थे। ज्ञात हो कि बाबू बागेश्वर जी जो उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व राज्यपाल रहे बाबू रामनरेश यादव जी व पूर्व केंद्रीय मंत्री बाबू चंद्रजीत यादव जी जैसे असाधारण नेताओं के राजनीतिक गुरु रहे थे।


यूं तो अपना  आज़मगढ़ अपने अतीत में समाजवादी और मार्क्सवादी विचारधारा का गढ़ रहा है और आज भी है लेकिन जनपद मुख्यालय से सुदूर किसी ग्रामीण अंचल से जहाँ एक सदी पहले विद्यालयी इल्म पाना भी बहुत बड़ी बात थी, ऐसे दौर और परिवेश में उन्होंने वकालत किया। बाबू बागेश्वर जी जैसा आदर्श व्यक्तित्व और वंचितों का रहबर पैदा होना जो एक स्वनिर्मित मिशाल है, का तख़य्युल करना भी मुश्किल है लेकिन यह सच है।

एक ऐसा दौर जब समाज अंग्रजी हुकूमत के बर्बरता से ज़्यादा पोंगापंथ के बर्बरता से परेशान था जिसके कारण समाज का एक बड़ा तबका शोषित रहा, उस दौर में समाज के शोषितों के इस्मत को समझना और बदलाव की शरार उछालना एक बड़ी बात थी। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में उठी वो बदलाव की शरार जिससे अवाम जुड़ा और आगे चलकर जो परिवर्तन की मशाल बनीं। यह मशाल जुल्मत में मजलूमों के लिए जिया फ़रोश बनी जो आगे चलकर सामाजिक यकजिहदी का बेजोड़ मिशाल बनी। इसलिए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि बाबू बागेश्वर जी जैसा व्यक्तित्व देश में कदाचित मिलते है जो अवाम में समाज बदलाव की ललक जगाये। 

आजमगढ़ को वैचारिकगढ़ के रूप में परिपक़्व बनाने में अनेकानेक ऋषि-मुनियों, चिंतकों, विद्वानों, साहित्यकारों, कवियों, लेखकों, क्रांतिकारियों, स्वतंत्रता सेनानियों ..... इत्यादि लोगों का अमूल्य योगदान रहा है जिसमें बाबू बागेश्वर को एक इकाई के रूप में देखा जा सकता है। हमें नाज है बाबू बागेश्वर जी के कर्तव्यों पर जो बचपन में ही हम लोगों के लिए प्रेरणा श्रोत बने। मुझे गर्व इस बात पर भी है कि जिस स्कूल से मेरी शिक्षा शुरू हुई उस स्कूल का नाम बाबू बागेश्वर जी के नाम पर था।

भारतीय राजनीति का एक ऐसा दौर जब लोकतंत्र को शासन के सह पर कमजोर किया जा रहा हो, जब व्यवस्था नाज़ियत के दौर से गुजर रही हो तो हमें बाबू बागेश्वर जी को एक आदर्श पथ प्रदर्शक के रूप में याद करने की जरुरत है। भारतीय न्याय का एक ऐसा दौर जब वकालत सिर्फ एक धंधे तक सीमित हो तो हमें बाबू बागेश्वर जी को एक आदर्श वकील के रूप में याद करने की जरुरत है। भारतीय समाज का एक ऐसा दौर जब वैज्ञानिक सोच से ज्यादा ऐसे सोच और गतिविधियों पर बल दिया जाय जिससे धर्म निरपेक्ष के प्रतिमान क्षरित हो रहे हो तो हमें बाबू बागेश्वर जी को एक आदर्श समाज सुधारक के रूप में याद करने की जरुरत है।

श्री बागेश्वर जी के जयंती पर हम श्रद्धांजलि-श्रद्धा-सुमन अर्पित करते है। 

 साभार:

राघवेंद्र- आजमगढ़ 

01/12/2021

 

Wednesday, 9 June 2021

बिरसा मुंडा: एक मसीहा

 आदिवासी जननायक,  महापुरुष, और समाज सुधारक बिरसा मुंडा ने 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में उलगुलान आन्दोलन  को अंजाम दिया। कहते है इतिहास भगवान से भी बड़ा होता है क्योकि भगवान सिर्फ भविष्य बनाता और बिगाड़ता है भूतकाल को नहीं छेड़ सकता लेकिन इतिहास भूतकाल को भी बनाता और बिगाड़ता है. इतिहास की मार खाने वालो में एक प्रमुख नाम श्री बिरसा मुंडा जी का भी है. बिरसा जी को इतिहास ने चाहे जितना रौंदा हो लेकिन वे आज भी लाखो लोगो के लिए वैचारिक ऊर्जा के केंद्र है जिन्हे दलित समाज भगवान की तरह पूजता है.

बिरसा मुण्डा  ने मुण्डा विद्रोह पारम्परिक भू-व्यवस्था के जमींदारी व्यवस्था में बदलने के कारण किया. बिरसा मुण्डा ने अपनी सुधारवादी प्रक्रिया के तहत  सामाजिक जीवन में एक आदर्श प्रस्तुत किया.   9 जून बिरसा मुंडा जी के पुण्य तिथि  पर हम श्रदांजलि-श्रद्धा-सुमन अर्पित करते है।