Sunday, 29 November 2015

लीजिये हाज़िर है रामदेव एण्ड  कंपनी  की  नूडल्‍स । मैं ये जानने में असमर्थ हूँ की क्या ये स्वराज फ़ूड के दायरे में आता है या नहीं ? खैर जो  भी हो ये बात  समझ  में आ ही गई होगी की नेस्‍ले की मैगी पर बैन क्यों  लगी। हाल-फ़िलहाल  हमें इंतजार  है रामदेव एण्ड  कंपनी के पेप्सी-कोला आने का ।
अभी  तक  हम कार्पोरेट से बच रहे थे अब निओ  कार्पोरेट से भी बचना है । 

आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाओ अभियान


आजमगढ़ अपने अतीत में ऋषि - मुनियों की तपस्थली, स्वतंत्रता सेनानियों के धरती के रूप में रहा है, इतना ही नहीं यह कवियों, शायरों, लेखकों और विचारकों का गढ़ था और आज भी है।  ऐसे दिव्य चिंतको का एक जगह पर प्रादुर्भाव पुरे दुनिया में बहुत कम जगह मिलता है।  इतिहास का अच्छी समझ रखने वालो को  ये पता  होगा कि आजमगढ़ का इतिहास बहुत ही दिलचस्प और आदर्श  रहा है। यहाँ के कई महापुरुषों ने न सिर्फ भारत में शिक्षा का प्रसार किया बल्कि दुनिया के कई देशों में जाकर शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया। लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है की आज आज़ादी के लगभग सात दसक बाद भी यहाँ कोई विश्वविद्यालय नहीं है। जिससे  हर साल भारी संख्या में यहाँ के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए पलायन करना पड़ता है। सरकार से हमारी मांग है कि आजमगढ़ में यथाशीघ्र एक विश्वविद्यालय का निर्माण कराये। अगर ऐसा नहीं होता है तो यह मुहीम सड़क से विधानसभा फिर संसद की ओर अग्रसर होगा।

राघवेन्द्र यादव
आजमगढ़

Wednesday, 9 September 2015

"आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाओ अभियान"

साथियों, मैं आजमगढ़ प्रशासन से यह सूचना माँगा था कि आजमगढ़ में कितने सरकारी, अर्ध सरकारी और प्राइवेट डिग्री कालेज है और उसमे प्रवेशार्थियों की संख्या कितनी है? मुझे अभी तक सिर्फ आजमगढ़ में सरकारी, अर्ध सरकारी और प्राइवेट डिग्री कालेज के आकड़े ही मिले है। प्राप्त आकड़ो के अनुसार 1 (एक) सरकारी, 10 (दस) अर्ध सरकारी और 128 (एक सौ अट्ठाइस) प्राइवेट डिग्री कालेज हैं। अर्थात आजमगढ़ में कुल 139 डिग्री कालेज हैं। ज्ञात हो कि वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल यूनिवर्सिटी जौनपुर के वेब साईट पर आजमगढ़ में कुल डिग्री कालेजों की संख्या 154 है। फ़िलहाल सच्चाई जो भी हो आप ये समझ सकते है कि आजमगढ़ की वर्तमान जनसँख्या लगभग 46 लाख से ज्यादा है। (जनगड़ना 2011 के अनुसार) और वहा एक भी यूनिवर्सिटी नहीं है। जबकि इसकी मांग वर्षों से हो रही है। आजमगढ़ में यूनिवर्सिटी को राजनैतिक मुद्दा के रूप में भी प्रयोग किया जाता है लेकिन वो महज भाषणों तक ही सिमित रहता है, प्रैक्टिकल का हिस्सा अभी तक नहीं हुआ है। वेहद दुख होता है जब कुछ तथाकथित माननीय तर्कहीन तथ्य देते हुए इस मांग को नकार देते है और कहते है कि आजमगढ़ में यूनिवर्सिटी की क्या जरुरत है? जब उसके पडोसी जनपद जौनपुर में यूनिवर्सिटी है, फैजाबाद में यूनिवर्सिटी है, गोरखपुर में यूनिवर्सिटी है, बनारस (वाराणसी) में यूनिवर्सिटी है। आजमगढ़ से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर इलाहाबाद में यूनिवर्सिटी है। तो फिर आजमगढ़ में यूनिवर्सिटी की क्या जरुरत है? प्यारे तथाकथित माननीयों मैं तुमसे पूछ रहा हूँ। अगर जौनपुर की जनसँख्या 44 लाख है और वहा यूनिवर्सिटी है, फैजाबाद की जनसँख्या 24 लाख है और वहा यूनिवर्सिटी है, गोरखपुर की जनसँख्या 44 लाख है और वहा यूनिवर्सिटी है, बनारस (वाराणसी) की जनसँख्या 36 लाख है और वहा तीन यूनिवर्सिटी है, इलाहाबाद की जनसँख्या 59 लाख है और वहा चार यूनिवर्सिटी है। तो मैं पूछना चाहता हूँ कि आजमगढ़ की जनसँख्या 46 लाख है तो वहा यूनिवर्सिटी क्यों नहीं होनी चाहिए? साथियों हम आजमगढ़ में यूनिवर्सिटी की मांग कर रहे है इससे न सिर्फ आजमगढ़ का, न सिर्फ पूर्वांचल का, बल्कि पुरे देश का लाभ होगा। हम अपील करते है आजमगढ़ वासियों से, पूर्वांचल वासियों से, प्रदेश वासियों से और देश वासियों से की आप "आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाओ अभियान" का हिस्सा बनिये, ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों को एक ''उपहार'' दिलवाने का हिस्सा बनिए। मैं पुरे विश्वास से कह रहा हूँ कि धान, गेहूँ, गन्ना, आलू.... आदि पैदा करने वाली धरती बहुत सारे अधिकारी, इंजीनियर, डाक्टर, जज, राजनेता …. आदि पैदा करेगी।
जय हिन्द जय भारत
आपका अपना
राघवेन्द्र यादव
शोधार्थी
सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ गुजरात
गृह जनपद - आजमगढ़

Friday, 4 September 2015

रामदेव एण्ड कंपनी

लीजिये हाज़िर है रामदेव एण्ड  कंपनी  की  नूडल्‍स। अब ये मैगी भी बेचेंगे। मैं ये जानने में असमर्थ हूँ की क्या ये स्वराज फ़ूड के दायरे में आता है या नहीं ? खैर   जो  भी  हो   ये  बात  समझ  में आ ही गई होगी की नेस्‍ले की मैगी पर बैन क्यों  लगी। हाल-फ़िलहाल  हमें इंतजार  है रामदेव एण्ड  कंपनी के पेप्सी-कोला आने का। 


अभी  तक  हम कार्पोरेट से बच रहे  थे  अब  निओ  कार्पोरेट  से  भी  बचना    है .

Wednesday, 1 July 2015

योग और गिनीज रिकॉर्ड

अच्छा एक बात मुझे यह  समझ  में नहीं आयी कि #अंतर्राष्ट्रीय_योग_दिवस को भारत ने एड़ी-चोटी का जोर लगाकर, करोड़ों रूपये खर्च कर मनाया। इसके लिए महीनों तैयारी किया। बहुत सारे  जरुरी कामों को तिलांजलि कर योग दिवस मनाने में जुटा रहा। इसके लिए  गिनीज रिकॉर्ड्स ने दो  रिकॉर्ड की घोषणा की। पहला सबसे  ज्यादा लोग (35,985) एक साथ, एक जगह योग किये  और दूसरा सबसे ज्यादा देशों (चौरासी देश) के लोग इस आयोजन में एक साथ, एक जगह योग किये। इन दो घोषणाओं का हम सभी भारतीय सम्मान करते है। हमारा सवाल या असहमति इस बात से है कि आखिर केवल दो रिकॉर्ड ही क्यों ? इससे यह लगता है की गिनीज रिकॉर्ड्स के अधिकारियों ने इसे संकुचित रूप में देखा है जिसे और व्यापक रूप में देखे जाने की जरुरत है। मैं चाहता हूँ और गिनीज रिकॉर्ड्स के अधिकारियों से मांग करता हूँ कि इसे निम्न प्रतिमानों पर भी देखा जाना चाहिए।
) किस देश में एक साथ, एक जगह सबसे ज्यादा पुरुष योग किये?
) किस देश में एक साथ, एक जगह सबसे ज्यादा महिलायें योग की?
किस देश में एक साथ, एक जगह दूसरे देश के सबसे ज्यादा पुरुष योग किये?
) किस देश में एक साथ, एक जगह दूसरे देश की सबसे ज्यादा महिलायें योग की?
 मुझे लगता है कि अगर उपरोक्त चार प्रतिमानों पर भी गिनीज रिकॉर्ड की घोषणा की जाय तो ये  रिकॉर्ड भारत के नाम हो सकते हैं। मैं प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी से कहना चाहता हूँ कि वे अपना मौनेन्द्र वाला रूप छोड़ कर गिनीज रिकॉर्ड्स के अधिकारियों से वार्तासन करें। शायद भारत चार और रिकॉर्ड बनाने में सफल हो जाय।

राघवेन्द्र यादव
आजमगढ़, उत्तर प्रदेश 

Sunday, 28 June 2015

खट्टी मीठी बात

प्रधान संत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कहा ‪#‎मन_की_बात‬ खट्टी मीठी बात है।एक बार फिर भक्त हैरान है,की साब! अपने पहले साल वाले हनीमून पीरियड में मन की बात बहुत कर ली। वो चाहे खट्टी-मीठी हो या तीखी या नमकीन। अब अपनी ये खट्टी मीठी बात बंद करो कुछ काम की बात करो। दूसरा साल है, हो सके तो ‪#‎काम_की_बात‬ से एक नया रेडियो धारावाहिक शुरू कर दो शायद भक्तों का अच्छा मनोरंजन होगा।

Monday, 22 June 2015

कर्म ही पूजा है, योग तो दूजा है

"हठ" योगा प्रचारकों और "हॉट" योगा प्रचारकों के अथक प्रचार ने रंग लाई।  भारत ने पूर्व कल्पित रिकार्ड (ये तो होना ही था) बना लिया। बधाई हो भक्तों तुमको। वैसे पूरी दुनिया में भारत में  सबसे ज्यादा लोग योगा करते है इसका मतलब की पूरी दुनिया में भारतीयों को सबसे स्वास्थ्य होना चाहिए लेकिन अफ़सोस की स्वास्थ्य के प्रतिमानों पर भारत बहुत पीछे है। तो  भक्तों इसे भी समझने की जरुरत है। कर्म ही पूजा है , योग तो दूजा है।

Sunday, 24 May 2015

"सबका साथ, सबका विकास" अरे नहीं भई "कुछ का साथ, कुछ का विकास" जैसे प्रतिमानों पर चलने वाली सरकार के कार्यकाल का 1/5 (एक बटे पांच) भाग समाप्त हुआ और 4/5 (चार बटे पांच) भाग बचा है। मुझे वो भाषण याद आ रहा है जिसमे कहा गया था की मुझे साठ महीने दे दो मैं यु पी को गुजरात बना दूंगा। मुझे उम्मीद है कि यु पी को गुजरात बनने की नीव पड चुकी होगी। सिर्फ नीव ही नहीं यु पी का 1/5 भाग गुजरात भी बन गया होगा। आगे 4/5 (चार बटे पांच) भाग को गुजरात बनाने के लिए भगवान आपकी भला करे , की आप जल्दी बना सके। सबको बिजली , सबको पानी , सबको शौचालय , सबको शिक्षा , सबको रोजगार , सबको इलाज , सबको घर...… और ना जाने क्या -क्या। बटोरते रहो भक्तों सुरुआत तुम्ही से होनी है और  शायद अंत   भी। 
जय राम जी की

Tuesday, 7 April 2015

बीजेपी के सांसद श्यामा चरण गुप्ता  ने  कहा  "धूम्रपान से सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता हैं।" मुझे समझ में नहीं आता की फिर एक  साल में  ९ लाख ८१ हजार लोग तम्बाकू से कैसे मौत को सिधार जाते है।  ये महोदय सांसद बाद में बीड़ी कारोबारी पहले है। इस लिए ये कह सकते है आखिर व्यापार वाला मामला है।   मुझे बड़ी हैरत होती है और सायद आपको भी कि केंद्र सरकार ने इस  बीड़ी कारोबारी को 'तंबाकू उत्पाद कानून २००३' के प्रावधानों पर गौर कर रही एक विधायी समिति का सदस्य भी बनाया है। इस समिति ने सरकार से मांग किया है की सिगरेट और धूम्रपान के पैकेट पर ४०% से बड़ा कर ८५ % किया जाय। जिस प्रस्ताव को  इस महोदय ने रोकने के लिए कहा है। इस जनाब को इस कमिटी से हटाया जाना चाहिए। आप को जान कर हैरत होगी  की ऐसे उत्पादों के पैकेट पर थाईलैंड में ८५%, आस्ट्रेलिया में ८२.5%, श्रीलंका में ८० % हिस्से पर वैधानिक चेतावनी लिखा होता है। मैं भारत सरकार से यह मांग करता हूँ कि  सिगरेट और तम्बाकू जैसे सभी धूम्रपान की पैकेट पर १००% हिस्से पर  वैधानिक चेतावनी के निर्देश छपे हो। शायद यह अनूठा कार्य करने वाला भारत पूरी दुनिया में  पहला देश बनेगा। हमें धूम्रपान मुक्त भारत चाहिए फिर पूरी दुनिया भी। 

जनहित में रघु द्वारा जारी 

Friday, 3 April 2015

भोजपुरी संगीत: अस्मिता का संकट

जश्न मनाने के डी जे कल्चर ने भोजपुरी संगीत को आज - कल  एकदम रौद कर रख दिया है। अगर भोजपुरी प्रेमी इस फूहड़पन को निषिद्ध नहीं किये तो इसकी अस्मित्ता समाप्तप्राय हो जाएगी। फूहड़पन से ओत-प्रोत ऐसे गाना को रिवाज में लाने का मुख्य वजह इस व्यवसाय का अर्थशास्त्र है जो भोजपुरिया अस्मित्ता को वेपनाह करने का पुरजोर कोशिश कर रहा है। इससे भी दुख की बात ये है कि आज किसी समारोह में ये फूहड़ गाने धड़ल्ले से बज रहे है। जैसे एक गाने की लाइन है  'फस गइल अडस गइल ', अब  इस गाने  फस गइल, अडस गइल पर लड़का भी नाच रहा है, उसका बाप भी नाच रहा है और उसका बाबा भी नाच रहा है। आखिर ये समाज कहा जा रहा है ? हम आज के पीढ़ी को क्या परोस रहे है ? हम कैसा समाज बना रहे है ? आज भोजपुरी के बहुत सारे ऐसे फूहड़  गाने जो  एक सभ्य समाज  नहीं सुन सकता फिर ऐसे गाने इतना धड़ल्ले से कानफाडू आवाज में क्यों बज रहे है ? आज असली भोजपुरी गाने  (जो लोकाभिमुख हुआ करते है) कदाचित सुनाने को मिलते है। मैं आज के भोजपुरिया प्रेमियों से यह आह्वान करता हूँ कि ऐसे गानो का तिलांजलि करें। आज सांगीतिक क्रूर गायक /गायिकाओं के बौखलाहट, बुढ़भस , पोंगापन को सिरे से नकारें। हमें अच्छे गायकों/गायिकाओं  को सुनने की पुरज़ोर उत्कंठा रखनी चाहिए। तभी हम अपने हर पीढ़ी को एक स्वस्थ कल्चर दे पाएंगे।

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बिरहा भले ही बिरह से निकली हो लेकिन बिरहा सुनने के बाद मुझे लगा कि यह मनोरंजन का अच्छा साधन भी है जो बिरह के इतर शृंगारिकता, हास्यता और ना जाने ऐसे कितने भाव है जिसमे बिरहा की अच्छी पैठ है। यह अभिव्यक्ति, आत्माभिव्यक्ति और भावाभिव्यक्ति का अच्छा माध्यम है। यह चौतरफा समाज के इतिहास और वर्तमान की परिथितियों की गठरी है। इतना ही नहीं इसमें अच्छे भविष्य के लिए एक रोड मैप भी है अर्थात यह दूरदृष्टा भी है। इनके सुझाव समाज सुधार के लिए एक संस्था के रूप में कार्यरत है। देश पर जब - जब विपत्ति आयी बिरहा ने जम कर मुकाबला किया। जब देश में सैनिक और धन की कमी थी। तब बिरहा के गवईया ने गाया था, "माई हो ललनवा देदा, बहिनी हो बिरनवा देदा, एहि देशवा के खातिर अपने तन क गहनवा देदा.........।" बिरहा कल्चर को अपने बलेस्सर दादा (आदरणीय श्री बालेश्वर यादव) अंतर्राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया है। बिरहा के बारे में एक और अनोखी चीज जो मुझे लगी कि बिरहा बनाने में रिसर्च बहुत किया जाता है और यह रिसर्च बहुत कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ लोगो के द्वारा किया जाता है लेकिन उनकी फाइंडिंग जब बिरहा के माध्यम से समाज में आती है तो वैसी फाइंडिंग उस विषय के अच्छे-2 विशेषज्ञ उस तह तक जा कर वैसी फाइंडिंग नहीं दे पाएंगे। शायद ऐसा भी हो कि जितना रिसर्च बिरहा बनाने में किया जाता है उतना रिसर्च फिल्म बनाने में भी नहीं होता हो।
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राघवेन्द्र यादव
आजमगढ़

Wednesday, 4 February 2015

अवाम

अपने कैफ़ी आज़मी साब कहा करते थे,

 "कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले
 उस इन्कलाब का, जो आज तक उधार सा है।"

आज भी हम गणतंत्र दिवस जैसे पवित्र पर्व पर किसी मेहमान को सौदे के लिए बुलाते है।  आज़ादी की जश्न के लिए नहीं। क्या हम राष्ट्रीय पर्वों पर भी विदेशी सौदेबाजी को निषिद्ध नहीं कर पा रहे है। आज अवाम यह समझ नहीं पा रहा है कि वो मंत्रमुग्ध कर रहे है या आज्ञालंघन। इन दोनों में चाहे जो भी हो,  आज अवाम  इस  भोगाधिकार को झेल रहा है।