Friday, 3 April 2015

भोजपुरी संगीत: अस्मिता का संकट

जश्न मनाने के डी जे कल्चर ने भोजपुरी संगीत को आज - कल  एकदम रौद कर रख दिया है। अगर भोजपुरी प्रेमी इस फूहड़पन को निषिद्ध नहीं किये तो इसकी अस्मित्ता समाप्तप्राय हो जाएगी। फूहड़पन से ओत-प्रोत ऐसे गाना को रिवाज में लाने का मुख्य वजह इस व्यवसाय का अर्थशास्त्र है जो भोजपुरिया अस्मित्ता को वेपनाह करने का पुरजोर कोशिश कर रहा है। इससे भी दुख की बात ये है कि आज किसी समारोह में ये फूहड़ गाने धड़ल्ले से बज रहे है। जैसे एक गाने की लाइन है  'फस गइल अडस गइल ', अब  इस गाने  फस गइल, अडस गइल पर लड़का भी नाच रहा है, उसका बाप भी नाच रहा है और उसका बाबा भी नाच रहा है। आखिर ये समाज कहा जा रहा है ? हम आज के पीढ़ी को क्या परोस रहे है ? हम कैसा समाज बना रहे है ? आज भोजपुरी के बहुत सारे ऐसे फूहड़  गाने जो  एक सभ्य समाज  नहीं सुन सकता फिर ऐसे गाने इतना धड़ल्ले से कानफाडू आवाज में क्यों बज रहे है ? आज असली भोजपुरी गाने  (जो लोकाभिमुख हुआ करते है) कदाचित सुनाने को मिलते है। मैं आज के भोजपुरिया प्रेमियों से यह आह्वान करता हूँ कि ऐसे गानो का तिलांजलि करें। आज सांगीतिक क्रूर गायक /गायिकाओं के बौखलाहट, बुढ़भस , पोंगापन को सिरे से नकारें। हमें अच्छे गायकों/गायिकाओं  को सुनने की पुरज़ोर उत्कंठा रखनी चाहिए। तभी हम अपने हर पीढ़ी को एक स्वस्थ कल्चर दे पाएंगे।

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बिरहा भले ही बिरह से निकली हो लेकिन बिरहा सुनने के बाद मुझे लगा कि यह मनोरंजन का अच्छा साधन भी है जो बिरह के इतर शृंगारिकता, हास्यता और ना जाने ऐसे कितने भाव है जिसमे बिरहा की अच्छी पैठ है। यह अभिव्यक्ति, आत्माभिव्यक्ति और भावाभिव्यक्ति का अच्छा माध्यम है। यह चौतरफा समाज के इतिहास और वर्तमान की परिथितियों की गठरी है। इतना ही नहीं इसमें अच्छे भविष्य के लिए एक रोड मैप भी है अर्थात यह दूरदृष्टा भी है। इनके सुझाव समाज सुधार के लिए एक संस्था के रूप में कार्यरत है। देश पर जब - जब विपत्ति आयी बिरहा ने जम कर मुकाबला किया। जब देश में सैनिक और धन की कमी थी। तब बिरहा के गवईया ने गाया था, "माई हो ललनवा देदा, बहिनी हो बिरनवा देदा, एहि देशवा के खातिर अपने तन क गहनवा देदा.........।" बिरहा कल्चर को अपने बलेस्सर दादा (आदरणीय श्री बालेश्वर यादव) अंतर्राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया है। बिरहा के बारे में एक और अनोखी चीज जो मुझे लगी कि बिरहा बनाने में रिसर्च बहुत किया जाता है और यह रिसर्च बहुत कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ लोगो के द्वारा किया जाता है लेकिन उनकी फाइंडिंग जब बिरहा के माध्यम से समाज में आती है तो वैसी फाइंडिंग उस विषय के अच्छे-2 विशेषज्ञ उस तह तक जा कर वैसी फाइंडिंग नहीं दे पाएंगे। शायद ऐसा भी हो कि जितना रिसर्च बिरहा बनाने में किया जाता है उतना रिसर्च फिल्म बनाने में भी नहीं होता हो।
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राघवेन्द्र यादव
आजमगढ़

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