बिरहा भले ही बिरह से निकली हो लेकिन बिरहा सुनने के बाद मुझे लगा कि यह मनोरंजन का अच्छा साधन भी है जो बिरह के इतर शृंगारिकता, हास्यता और ना जाने ऐसे कितने भाव है जिसमे बिरहा की अच्छी पैठ है। यह अभिव्यक्ति, आत्माभिव्यक्ति और भावाभिव्यक्ति का अच्छा माध्यम है। यह चौतरफा समाज के इतिहास और वर्तमान की परिथितियों की गठरी है। इतना ही नहीं इसमें अच्छे भविष्य के लिए एक रोड मैप भी है अर्थात यह दूरदृष्टा भी है। इनके सुझाव समाज सुधार के लिए एक संस्था के रूप में कार्यरत है। देश पर जब - जब विपत्ति आयी बिरहा ने जम कर मुकाबला किया। जब देश में सैनिक और धन की कमी थी। तब बिरहा के गवईया ने गाया था, "माई हो ललनवा देदा, बहिनी हो बिरनवा देदा, एहि देशवा के खातिर अपने तन क गहनवा देदा.........।" बिरहा कल्चर को अपने बलेस्सर दादा (आदरणीय श्री बालेश्वर यादव) अंतर्राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया है। बिरहा के बारे में एक और अनोखी चीज जो मुझे लगी कि बिरहा बनाने में रिसर्च बहुत किया जाता है और यह रिसर्च बहुत कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ लोगो के द्वारा किया जाता है लेकिन उनकी फाइंडिंग जब बिरहा के माध्यम से समाज में आती है तो वैसी फाइंडिंग उस विषय के अच्छे-2 विशेषज्ञ उस तह तक जा कर वैसी फाइंडिंग नहीं दे पाएंगे। शायद ऐसा भी हो कि जितना रिसर्च बिरहा बनाने में किया जाता है उतना रिसर्च फिल्म बनाने में भी नहीं होता हो।
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राघवेन्द्र यादव
आजमगढ़
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