Tuesday, 27 December 2016

पटाकिया मनोरंजन और दुस्वारियां

पुणे स्थित चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन ने अपने रिसर्च में पाया कि 1 अनार बम  34 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाता है। एक फुलझड़ी 74 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाती है। 1 पुलपुल बम 208 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाता है। 1 स्नैक टैवलेट बम 464 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाता है। इस  रिसर्च फाउंडेशन ने यह भी बताया था कि दिवाली के दिन भारत में 20 गुना प्रदुषण फैलता है। जरा सोचिये, हमारे पल भर के मनोरंजन की कीमत पर प्रकृति को यह नुक़सान चुकानी पड़ती है। इतना ही नहीं;  इन पटाकों की वजह से अनगिनत पक्षियां मौत के मुंह में समां जाती है। इसलिए हमें पटाका से होने वाली इन दुस्वारियों से बचना चाहिए और पटाखे नहीं जलाना चाहिए।

पुरे देश और पूरी दुनिया में सेलिब्रेट होने वाला न्यू ईयर, इस पर भी कुछ लोगों अपने छड़ भर के मनोरंजन के लिए पटाका जलाते है। इसका खामियाज़ा प्रकृति को उठाना पड़ता है। हमें प्रकृति को सतत स्वस्थ्य रखने के लिए मनोरंजन के इस तरीके को तिलांजलि कर मनोरंजन के अन्य तरीकों को अख़्तियार में लाना चाहिए। जो इन्वॉयरमेंट फ्रेंडली हो।

एक विशेष अपील और,  कुछ खास तौर के भाई लोग से और आज-कल (खास तौर पे शहरों में) इसमें कुछ बहन जी भी इन्वोल्व है। जो नये साल पे टन्न हो जाते/जाती है। आपकी वजह से ३१ दिसंबर की रात में एक्सीडेंट की घटनाएं बहुत बढ़ जाती है। इतना ही नहीं झगड़ा - फसात की संख्या भी बढ़ जाती है। आप तो खुद ध्वस्त होते ही है, कई बार एक सही व्यक्ति भी बिना गलती किये आपके बेवकूफियों का शिकार हो जाता है। इसलिए आप जैसे धुरन्धारों से विशेष अपील है कि आप इन नौटंकियों के भविष्यगामी परिणाम के मद्दे नजर अपने मनोरंजन के साधनों को अख्तियार में लाएंगे।

रघु द्वारा जनहित में जारी ........

Tuesday, 20 December 2016

जो शिक्षा बाहर में दी गई है वो व्यवस्था यहाँ पर हो

ये आजमगढ़ में लालगंज लोकसभा क्षेत्र से सांसद श्रीमती नीलम सोनकर जी का वक्तव्य चुनाव प्रचार  के समय का है। आप भी जानिए साहिबा ने क्या कहा था।

"....... लालगंज लोकसभा के, जो शिक्षा की व्यवस्था न होने के कारण लोग बाहर जाते है। चाहे वो लखनऊ जाये, बी एच यू जाये, दिल्ली जाये या कही भी जाये लेकिन शिक्षा के अभाव में उनको बाहर जाना पड़ता है। तो मैं चाहूंगी अगर मुझे ऐसा अवसर मिलता है तो यहाँ पर, जो शिक्षा बाहर में व्यवस्था दी गई है वो व्यवस्था यहाँ पर हो। ताकि यहाँ पर बच्चे बाहर जाकर न पढ़े।"

साहिबा के इस बात से हम बिल्कुल सहमत है और शायद पूरा आजमगढ़ सहमत है कि हां ये सही कह रही है। और इससे आजमगढ़ के ब्रेन ड्रेन को रोकने में मदद मिलेगी। इन्होंने फिर आगे ये भी कहा कि

"....... मैं चाहूंगी यहाँ पर जीतनी भी महिलाएं है और बालिका है, उन सबको उच्च शिक्षा प्राप्त हो और उच्च शिक्षा प्राप्त होने की वजह से वे जागरूक हो जाएँगी और अपने अधिकार को समझ सकेंगी कि सरकार ने उनके लिए क्या-क्या अधिकार दिया है और जब अधिकार अपना जान लेंगी तो वे एक जुट होकर, एक मत होकर, एक दिशा में काम करेंगी।"

बतौर महिला प्रत्यासी, महिलाओ की जरुरत बखूबी बतायीं थी। यह एक मजबूत इसारा था आजमगढ़ के विकास के लिए। उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि

"...... इस सब, जो मैं कर सकूँ अपने सरकार के सामने वो बात रखूं ताकि यहाँ कि समस्या जब वहाँ रखूंगी तो सुनी जाएगी और यहाँ का विकास कार्य होगा।"

सांसद महोदया से आजमगढ़ में विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में #विश्वविद्यालय_अभियान कई बार संपर्क किया और इस जरुरत की ओर ध्यान आकर्षित किया। मैं खुद सांसद जी से आजमगढ़ में विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में बात किया। सांसद महोदया ने कहा,

"हां आप लोगों की मांग तो बिल्कुल सही है और मैं इसका पूरा समर्थन करती हूँ। राज्य सरकार को यहाँ एक विश्वविद्यालय देना चाहिए। लेकिन मैं इसमें क्या कर सकती हूँ? आप बताइये मुझसे क्या चाहते है?"

 मैंने उनसे आग्रह किया कि,

 "मैडम हम सरकार से मांग कर रहे है और सूबे की सरकार हमारी बात नहीं सुन रही है। आप सरकार से बात कर सकती है। आप सीo एमo को लेटर लिख सकती है। तो शायद आजमगढ़ को विश्वविद्यालय मिल जाय। इसके बाद सांसद महोदया ने आश्वासन दिया ठीक है, अभी तो मैं दिल्ली में हूँ लेकिन सरकार से बात करुँगी।" और आज तक बात होती रही .........

आजमगढ़ को विश्वविद्यालय न मिलने तक संघर्ष जारी रहेगा ......

राघवेंद्र यादव
विश्वविद्यालय अभियान


you may listen from mentioned link

https://www.youtube.com/watch?v=N-dNwIsS7kg

Friday, 11 November 2016

हालत - ए - शिक्षा

आज हमारे देश में कुछ स्कूलों में कुछ छोटे बच्चों को प्रवेश इस लिए नहीं दिए जा रहे है क्योंकि उनके माता पिता निरक्षर है। मुझे लगता है कि ये उसी मज़लिस के क्रूर सोच के पक्षधर है जो निरक्षर को निरक्षर तथा गरीब को और गरीब बनाने की साजिशे रचते है। इस लिए ऐसे मज़लिस के मज़मून की मज़ाल को समझना जरुरी है। जरा सोचिये जिस देश की सरकार सर्व शिक्षा अभियान जैसे महत्वपूर्ण मिशन चला रही हो। "पढ़ेगा भारत, बढ़ेगा भारत" जैसे वैचारिक नारे दिए जा रहे हो। ऐसे दौर में इस तरह के लोमहर्षक नियम बनाना इन महत्वपूर्ण मिशन को तमाचा मारने जैसा है और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तपके के साथ घोर अन्याय है। मैं इस देश की सरकार तथा राज्य सरकारों से यह उम्मीद करता हूँ कि ऐसे संवेदनशील मुद्दो से अंजान न बने, ऐसे स्कूलों को चिन्हित कर इनके संविधान को बदलवाए और अगर ये नहीं मानते है तो इनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए।
ये तो प्राथमिक शिक्षा का हाल है। अग़र हम उच्च शिक्षा पर नजर डाले तो इनकी वैचारिक हालत और भी निकम्मी है। शायद आज हमारे देश का कोई भी शख्स इस कथन से असहमत नहीं होगा की हमारे देश की उच्च शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा भाग चमचा युग में जी रही है। उपरोक्त दोनों दशाये वेहद खतरनाक है इन्हे सुधारने के लिए बड़े बदलाव की जरुरत है।
मेरे भारत, मेरे हिन्दोस्ताँ, मेरे इंडिया मैं तुमसे यही कहना चाहता हूँ कि तुम्हारी ये हालत हम जैसे लोग सुधारंगे………
राघवेन्द्र यादव
इन्कलाब - जिंदाबाद

Saturday, 1 October 2016

ये दोहरापन क्यों है?

 उत्तर प्रदेश सरकार से पूछ रहा हूँ कि ये दोहरापन क्यों है? आप विधान सभा में एरा विश्वविद्यालय लखनऊ, उत्तर प्रदेश विधेयक, 2015 पारित करने के लिए सदन में कहते है कि "यह विधेयक है विश्वविद्यालय  के बारे में और सैद्धान्तिक रूप से हम लोग किसी भी नए विश्वविद्यालय की स्थापना का कभी भी विरोध नहीं करते है।" अगर नए विश्वविद्यालय बनाने के सन्दर्भ में वाकयी आपके विचार ऐसे है तो यह सराहनीय विचार है और हम ऐसे विचार का स्वागत करते है। लेकिन यथार्थ कुछ और है। इसे मैं आपके विचार नहीं बल्कि कागजी नौटंकी मानता हूँ। क्योंकि उत्तर प्रदेश विधान परिषद में जब आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाये जाने पर सूबे के मुख्यमंत्री से सवाल पूछा गया तो सरकार के मंत्री जवाब दिए कि आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाया जाना प्रासंगिक नहीं है। इसका मतलब है कि वे आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाये जाने का विरोध कर रहे है। सूबे की सरकार का यह एक मनमाना जवाब था, जिसका यथार्थ से कोई लेना-देना नहीं था। इस जवाब ने हजारों आजमगढ़ियों को आहत किया था। मैं जानना चाहता हूँ कि अगर एक प्राइवेट कालेज को विश्वविद्यालय बनाने के लिए इतना मधुर और बौद्धिक विचार दिए गए तो आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाने के लिए इतना निष्क्रिय और उलजुलूल उत्तर क्यों दिया गया? मैं सूबे की सरकार से पूछता हूँ कि "आजमगढ़ विश्वविद्यालय विधेयक" कब पारित होगा?








Thursday, 11 August 2016

आदिवासी हालात और दिवस

जोहार साथियों,
विश्व आदिवासी दिवस दुनिया के महत्वपूर्ण दिवसों में से एक है। अगर युo एनo के आकड़ो पर गौर करे तो दुनिया के 90 देशों में लगभग 370 मिलियन आदिवासी है। जिनके पास 7००० (सात हजार) भाषाएँ और 5००० (पांच हजार) अलग-अलग कल्चर है। आदिवासियों का मौखिक साहित्य अत्यंत समृद्ध है। लोक कथाओं, गीतों, कहावतों और मुहावरों की वाचिक परंपरा आदिवासी समुदायों में भरी-पड़ी है। 
 विश्व के विभिन्न देशों में निवासरत आदिवासियों के मानव अधिकार की सुरक्षा के लिए यु0 एन0 ने 1982 में एक सब-कमीशन बनाया। इस कमीशन ने यह पाया की आदिवासी गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, बंधुआ मजदूर और सामाजिक उपेक्षा जैसे समस्याओं से जूझ रहे हैं। इन समस्याओ  के निराकरण हेतु यु0 एन0 वर्किंग ग्रुप के सब-कमीशन ने 9 अगस्त 1982 में  विश्व आदिवासी दिवस मनाने का प्रस्ताव यु0 एन0 जनरल असेम्बली में रखा जिसे 1994 में यु0 एन0 जनरल असेम्बली ने स्वीकार कर लिया। 9 अगस्त 2016 को विश्व आदिवासी दिवस, शिक्षा के अधिकार को समर्पित है।
आदिवासियों का अपना धर्म है। ये प्रकृति को अपना ईस्ट देव मानते है और जंगल, पहाड़, नदियों..... आदि की आराधना करते हैं।  लेकिन दूभर हालात होने के नाते ईसाई मशीनरी, इस्लामिक मशीनरी, हिन्दू मशीनरी....... आदि ने कुछ लोभ देकर या जबरन धर्म परिवर्तन करवाया। परंतु आज ये स्वयं की धार्मिक पहचान के लिए संगठित हो रहे हैं। अगर हम भारत के आदिवासियों की बात करे तो ब्राहमेनिकल मैकेनिजम ने इन्हें कभी आदमी के रूप में स्वीकार ही नहीं किया। लेकिन यह भी एक विडम्बना है की  "रामायण", जिसपर हिन्दू धर्म का ताना-बाना  बुना गया है, के रचयिता महर्षि वाल्मीकि जी आदिवासी थे। 
हम आज 23वे विश्व आदिवासी दिवस को मना रहे है। लेकिन सरकारें जो प्रयास दूसरे विश्व दिवसों को मनाने में करती है वो विश्व आदिवासी दिवस मनाने में नहीं करती। इस दिवस पर मीडिया में भी गाहे-बगाहे ही खबरें, लेख  या संपादकीय दिखती है। जो यह दर्शाता है कि लोग आदिवासियों के जीवन स्तर में सुधार को लेकर कितना जागरूक या चिंतित है। आज से दो साल बाद हम विश्व आदिवासी दिवस का 25वा  विश्व आदिवासी दिवस मनाएंगे। अगर 25वे  विश्व आदिवासी दिवस को यु0 एन0 विश्व आदिवासी वर्ष के रूप में मनाये तो आदिवासियों के जीवन स्तर में सुधार लाने का एक बड़ा प्रयास होगा।


राघवेंद्र यादव 
शोधार्थी 
सेंटर फॉर स्टडीज एंड रिसर्च इन इकोनॉमिक्स एंड प्लानिंग 

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ गुजरात 

Tuesday, 26 July 2016

कश्मीर की पत्थरबाजी

आज कश्मीर में पत्थर फेंकने को लेकर गजब की भक्ति दिखाई जा रही है। क्या यह पहली बार हो रहा है? क्या ऐसा सिर्फ कश्मीर में ही होता है? कश्मीर को छोड़कर पुरे भारत में कही नहीं होता है? अगर होता है तो उस पर इतना राजनितिक नौटंकी करने के जगह समाधान पर ध्यान देना चाहिए कि उनको ऐसा न करना पड़े। मेरा अनुभव है कि भारत का शायद कोई भी ऐसा राज्य नहीं है जहां कर्फ्यू लगे और पुलिस के ऊपर पत्थर न फेंका गया हो। खैर ये तो बड़े मुद्दे पर होता है। इसे छोडिए। आइए हम कुछ छोटे मुद्दों पर बात करते है। हम किसी भी राज्याश्रित या केंद्राश्रित विश्वविद्यालय को लेते है। वहां कुछ छात्र अपने मांग को लेकर सड़क पर आते है। फिर दोनों (छात्र और पुलिस) में झड़प होती है और छात्रों द्वारा पुलिस पर पत्थर फेंके जाते है, ठीक वैसे ही जैसे कश्मीर में चल रहा है। क्या हम इन पत्थरबाजों को आतंकवादी कहते है, जैसा की कश्मीर के लिए कहा जा रहा है? इसके आलावा, हम सभी वकीलों और पुलिस के झड़प से भी चीर-परिचित होंगे। इनके झड़प में भी पुलिस के ऊपर पत्थरबाजी होती है क्या हम उन वकीलों को आतंकवादी कहते है? शायद नहीं। हम राजनितिक पार्टियों को लेते है। सत्तासीन पार्टी को छोड़ कर, अन्य पार्टियाँ कुछ मुद्दे तलाश (ढूढ़कर) कर सड़क पर शक्ति प्रदर्शन करती है। जिसमे कई बार ऐसा होता है कि वे पुलिस से झगड़ते है और पुलिस के ऊपर पत्थर फेंकते है। शायद हम उन्हें भी आतंकवादी जैसा उच्चारण नहीं करते है। पुरे भारत में कश्मीर को छोड़कर दूसरे किसी भी राज्य के किसी भी जनपद में ऐसी पत्थरबाजी होती है तो हम उन्हें आतंकवादी नहीं कहते है। तो ये नौटंकी और टैग कश्मीर के लिए क्यों है? मेरा मानना है कि यह सब गवर्नमेंट फेल्योर के कारण है। इसके लिए कुछ राजनितिक व्यापारी जिम्मेदार है। उनके खिलाप करवाई करनी चाहिए। लेकिन दुखद की इसे आम जनता झेल रही है और कुछ नौटंकीबाज जबरदस्ती की भक्ति दिखा रहे है और कह रहे है की कश्मीरियों को गोली मार देना चाहिए। टैग और सर्टिफिकेट बांटने वाले इन चोचलेबाजों को राजनितिक नौटंकी करने के जगह समाधान पर ध्यान देना चाहिए कि उनको ऐसा न करना पड़े और कश्मीर में अमन-चैन रहे। आम कश्मीरियों को छर्रे या गोली मारने से समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। सरकार को चाहिए की इसपर गम्भीरता से विचार करे और "स्थाई समाधान" निकाले। जिसमे आम जनता की भलाई है, हमारे देश की रक्षा करने वाले वीरों की भलाई है और हमारे देश की भलाई है।

Saturday, 9 July 2016

साथियों, हममें से कुछ लोगों को आजमगढ़ में विश्वविद्यालय की मांग को लेकर कन्फ्यूजन है कि हम आजमगढ़ में एक नये विश्वविद्यालय की मांग कर रहे है या शिब्ली नेशनल कालेज को विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाने के लिए मांग कर रहे है? साथियों मैं आप लोगों को बता दू कि शिब्ली नेशनल कालेज के प्रिंसिपल महोदय से हमारी बात हुई है और वे बताये है कि, शिब्ली नेशनल कालेज की प्रबंध समिति ऐसी कोई मांग नहीं की है। वे खुद चाहते है कि आजमगढ़ में एक नया विश्वविद्यालय बने। इसके लिए वे #मिशन_यूनिवर्सिटी_इन_आजमगढ़ के साथ है। आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनने पर शिब्ली नेशनल कालेज को स्वायत्त डिग्री कालेज बनाया जा सकता है। साथियों हमारी मांग स्पष्ठ है की हम आजमगढ़ में नये विश्वविद्यालय के लिए आंदोलन कर रहे है और यह विश्वविद्यालय पूर्ण आवासीय होना चाहिए तथा विश्वस्तरीय सुविधा युक्त होना चाहिए। हमें सिर्फ सर्टिफिकेट बाटने वाली संस्था नहीं चाहिए। हमे शैक्षणिक गुणवत्तापरक विश्वविद्यालय चाहिए।

"विश्वविद्यालय अभियान संघर्ष समिति"

Monday, 16 May 2016

आजमगढ़ पुरे प्रदेश में प्रथम स्थान पर

बधाई हो !!!!!!

आजमगढ़ के होनहारों ने अपना लोहा मनवा दिया। 
यूपी बोर्ड 2016 हाईस्कूल के रिजल्ट में, जिला स्तरीय मेरिट के आधार पर आजमगढ़ 95.12% के साथ पुरे प्रदेश में प्रथम स्थान पर है। 
अब ये इंटर के बाद किस यूनिवर्सिटी के हिस्सा बनेंगे? इनमें जो इकोनोमिकली वीक होंगे उनका क्या होगा? 
सरकार से अनुरोध है कि आजमगढ़ के इन टैलेंट्स को रौदें नहीं, इनके टैलेंट पर रहम करे। ये आजमगढ़ के ही नहीं, उत्तर प्रदेश के ही नहीं, देश के भविष्य है। यहाँ अतिशीघ्र एक यूनिवर्सिटी का निर्माण करवाए।

Saturday, 14 May 2016

आजमगढ़ में विश्वविद्यालय की मांग किसका हिस्सा?

आजमगढ़ में विश्वविद्यालय की मांग को उत्तर प्रदेश सूबे की सरकार स्वीकार नहीं कर रही है। सरकार मनमानी पूर्ण तर्क देकर कहती है कि आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाया जाना प्रासंगिक नहीं है। सूबे की सरकार को मैं बता देना चाहता हूँ कि आजमगढ़ में विश्वविद्यालय, निरर्थक अलंकरण का हिस्सा नहीं है। यह बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का हिस्सा है। यह गरीबों और उच्च शिक्षा से बंचित लोगो को हक दिलाने का हिस्सा है। यह ग्रामीण छात्राएं जो कुछ कारणों से उच्च शिक्षा के लिए जनपद से बहार नहीं जा पाती उनको मौका देने का हिस्सा है। फिर भी सूबे की सरकार को लगता है कि आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाया जाना प्रासंगिक नहीं है तो मैं शिक्षा मंत्री यु पी, मुख्यमंत्री यु पी और पुरे उत्तर प्रदेश सरकार को चैलेन्ज करता हूँ कि वे कभी भी आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाए जाने की प्रासंगिकता पर बात कर सकते है, बहस कर सकते है, संवाद कर सकते है। 
हम लेकर रहेंगे ........विश्वविद्यालय 
आजमगढ़ में ........विश्वविद्यालय

Monday, 21 March 2016

आजमगढ़ में विश्वविद्यालय

"रूह-ए-आजमगढ़ में तामीर-ए-विश्वविद्यालय उतना ही प्रासंगिक है जितना किसी बेघर को घर देना।"


गुणवत्तापरक उच्च शिक्षा की जरुरत ने आजमगढ़ में विश्वविद्यालय की मांग के लिए प्रेरित किया। आजमगढ़ में विश्वविद्यालय की मांग चार दशक से भी ज्यादा पुरानी है। शिक्षा के दृष्टिकोण से अगर एक पीढ़ी के लिए  20 वर्ष माना जाय तो 40 वर्ष में दो पीढ़िया बीत चुकी है। अब हम तीसरी पीढ़ी के लोग हैं जो आजमगढ़ में विश्वविद्यालय की मांग कर रहे हैं और उत्तर प्रदेश सरकार इस मांग को ठुकरा  रही है। अभी हाल ही में श्री ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने विधान परिषद में सरकार से आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाये जाने से सम्बंधित सवाल पूछे थे। उनका जबाब देते हुए सरकार के मंत्री श्री विजय बहादुर पाल ने कहा कि आजमगढ़ में विश्वविद्यालय की स्थापना का औचित्य इस लिए नहीं पाया गया क्योंकि पड़ोस के जनपद वाराणसी, जौनपुर, गोरखपुर, फैजाबाद, इलाहाबाद में पहले से ही विश्वविद्यालय स्थापित है। माननीय मंत्री महोदय के इस जबाब से आजमगढ़ में विश्वविद्यालय की चाहत रखने वाले  लोग हतप्रभ और इताव हैं क्योंकि ऐसे तर्कहीन और मनमानीपूर्ण जबाब की तख़य्युल नहीं थी। माननीय जी का यह जबाब उस डरावने  सांप जैसा है जो विश्वविद्यालय में पढ़ने की चाहत रखने वाले हजारों युवाओं को अपनी फुंफकार से डरा रहा है।

      मैं माननीय मंत्री जी से पूछना चाहता हूँ कि क्या आपकी सरकार वास्तव में इस तरह के प्रतिमान पर निर्णय लेती है? माननीय जी मैं आपको याद दिला दू कि वर्तमान सरकार ने ही 2013-2014 के बजट भाषण में इलाहाबाद में राज्य विश्वविद्यालय स्थापित करने का प्रावधान किया था। जबकि इलाहाबाद में पहले से ही केंद्रीय विश्वविद्यालय, डीम्ड विश्वविद्यालय, ओपेन विश्वविद्यालय सहित चार विश्वविद्यालय थे। इसके अलावा एनo आईo टीo और ट्रिपल आईo टीo भी था। ऐसे में वहा विश्वविद्यालय की खास जरुरत नहीं थी लेकिन  सरकार ने वहा विश्वविद्यालय खोला।  माननीय मंत्री जी,  मेरा मानना है कि एक जनपद में चार विश्वविद्यालय स्थापित करने से अच्छा है कि चार जनपद में एक-एक विश्वविद्यालय स्थापित किया जाय। जो ज्यादा तर्क संगत और प्रासंगिक होगा। 


       दूसरा सवाल, मैं माननीय मंत्री जी से पूछना चाहता हूँ कि अगर जौनपुर की जनसँख्या 44 लाख है और वहा विश्वविद्यालय है, फैजाबाद की जनसँख्या 24 लाख है और वहा विश्वविद्यालय है, गोरखपुर की जनसँख्या 44 लाख है और वहा दो विश्वविद्यालय है, बनारस (वाराणसी) की जनसँख्या 36 लाख है और वहा तीन विश्वविद्यालय है, इलाहाबाद की जनसँख्या 59 लाख है और वहा चार विश्वविद्यालय है। तो आजमगढ़ की जनसँख्या 46 लाख है फिर वहा विश्वविद्यालय क्यों नहीं होनी चाहिए? इस बात से तो हर कोई सहमत होता है कि आज विश्वविद्यालय बड़े-बड़े शहरों में बनाने के बजाय गरीब ग्रामीण इलाकों में बनाया जाय तो ज्यादा प्रासंगिक होगा। इस लेहाज से भी आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाया जाना जरुरी है क्योंकि जनगड़ना 2011 के अनुसार आजमगढ़ में 91.5 % जनसंख्या ग्रामीण है और जनसंख्या के दृष्टिकोण से आजमगढ़ उत्तर प्रदेश का चौथा सबसे बड़ा जनपद है इस लिए यहाँ विश्वविद्यालय बनाया जाना अत्यंत जरुरी है।

तीसरा सवाल, माननीय मंत्री जी, आपने इलाहाबाद, बनारस, और गोरखपुर में विश्वविद्यालय होने की बात की है। श्रीमान जी, बता दू की आजमगढ़ से बनारस और इलाहाबाद की दूरी 100 से 200 किलोमीटर  है यहाँ पढ़ने के लिए प्रवसन करना पड़ता है। जो गरीब और अतिगरीब का बच्चा सोच भी नहीं पाता है और उसके प्रतिस्थापन में वह दिल्ली, बम्बई .... आदि जगहों पर रोजगार तलासता है जिससे वह उच्च शिक्षा से पूरी तरह बंचित हो जाता है। माननीय मंत्री जी आपके इस उत्तर से आहत होकर श्री राकेश गांधी जी ने ठीक ही कहा था कि "किसी घर को यह कहकर बिजली कनेक्टिविटी देने से मना नहीं किया जा सकता कि पड़ोसी के घर में बिजली है। अतः आप को बिजली दिया जाना औचित्यपूर्ण नहीं है।  ठीक उसी तरह आजमगढ़ की जनता की विश्वविद्यालय  की मांग को भी अनौचित्यपूर्ण नहीं कहा जा सकताI"
     उत्तर प्रदेश और विश्व बैंक के संयुक्त रिपोर्ट में यह  बताया गया था कि आजमगढ़ मंडल का शहरी इलाका उत्तर प्रदेश के सभी मंडलों से पीछे है और ग्रामीण इलाका दूसरा सबसे पीछे है। पंचायती राज मंत्रालय, भारत सरकार ने 2006  में आजमगढ़ को भारत के 250 अत्याधिक पिछड़े जिलों में पाया था और यह उत्तर प्रदेश के 34 सबसे पिछड़े  जिलों में से एक है। जो बैकवर्ड रीजन ग्रांट फंड का हिस्सा है। भारत सरकार ने 2006 में नरेगा योजना को शुरू किया था जिसमें देश के 200 सबसे पिछड़े जिलों का चयन किया था। आजमगढ़ देश के 200 सबसे पिछड़े जिलों में एक तथा उत्तर प्रदेश के 22 सबसे पिछड़े जिलों में एक हैं। अगर यहाँ विश्वविद्यालय बनवाया गया तो आजमगढ़ का बहुमुखी विकास होगा। 

अध्यात्म हो या स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई हो या राजनीति हो या सामाजिक सरोकार का अन्य कोई भी रूप आजमगढ़ हमेशा अग्रणी रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में अस्मित्ता धूमिल होने के पीछे मुख्य कारण उच्च शिक्षण संस्थान का कमी होना है। आजमगढ़ में विश्वविद्यालय को राजनैतिक मुद्दा के रूप में भी इंटरटेन किया जाता है लेकिन वो महज भाषणों तक ही सिमित रहता है, प्रैक्टिकल का हिस्सा अभी तक नहीं हुआ है।मैं उत्तर प्रदेश सरकार से यह अपील कर रहा हूँ कि राजनीतिक आपा-धापी से ऊपर उठकर आजमगढ़ में विश्वविद्यालय की मांग को पूरा किया जाय। जो सिर्फ सर्टीफिकेट बाटने वाली संस्था न होकर विश्व स्तरीय सुविधायुक्त विश्वविद्यालय हो। 

देख अँधेरा मत घबराओ, हम दीप जलाने वाले है।
बस साथ हमारे हो लो, हम सूरज पिघलाने वाले है।


राघवेन्द्र यादव 
रिसर्च स्कॉलर 
सेंटर फॉर स्टडीज एंड रिसर्च इन इकोनॉमिक्स & प्लानिंग 
सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात 
गांधीनगर 
गृह जनपद - आजमगढ़ 


Thursday, 17 March 2016

राजस्थान उच्च न्यायालय के सामने मनु या बाबा साहेब?

साथियों, यह (फोटो में) भवन माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय का है। इसके सामने एक प्रतिमा दिख रही है जो "मनु" की प्रतिमा है। आपको ज्ञात होगा, मनु ने एक संविधान लिखा था जिसका नाम है "मनुस्मृति"। जैसा कि आप यह भी जानते है कि हर देश का अपना एक संविधान होता है जिसके आधार पर वह देश चलता है। भारत के पास भी एक संविधान है (constitution of India) जिसे बाबा साहेब की अध्यक्षता वाली कमिटी ने लिखा था। क्या हमारा देश  मनु के संविधान "मनुस्मृति" से चलता है या बाबा साहेब की अध्यक्षता वाली कमिटी द्वारा लिखित  संविधान (constitution of India) से चलता है। अगर आपका जबाब है  बाबा साहेब की अध्यक्षता वाली कमिटी द्वारा लिखित  संविधान (constitution of India) से चलता है तो अब बात सोचने की यह है कि माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय के सामने मनु की प्रतिमा कैसे और क्यों लगी।  मैं आपसे यह पूछता हूँ कि  यहाँ पर बाबा साहेब की प्रतिमा होनी चाहिए या "मनु" की?
जय हिन्द.........