Sunday, 12 February 2017

एमo फिल/पीo एचडी में दाखिला देने का अनम्य कानून

भारत में उच्च शिक्षण संस्थानों को गाइड करने के लिए बनाया गया विश्वविद्यालय अनुदान आयोग आज कल अनपढो जैसी हरकत करने लगा है। यह आयोग 5 जुलाई 2016 को प्रकाशित राजपत्र के क्लॉज 5 के सब-क्लॉज 5.4 में कहता है कि उच्च शिक्षण संस्थान M.Phil/Ph.D में अभियर्थियों को द्वि-चरणीय प्रक्रिया के माध्यम से दाखिला देंगे। लेकिन यह आयोग अपने उसी राजपत्र में त्रि-चरणीय प्रक्रिया के माध्यम से M.Phil/Ph.D में दाखिला देने का अनम्य कानून बनाया है। पहला प्रतिमान अर्थात पहला चरण परास्नातक में 50-55% . दूसरा प्रतिमान लिखित परीक्षा और तीसरा प्रतिमान इंटरव्यू। इस तरह से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अपने ही वक्तव्य का खंडन कर रहा है; मतलब वह कह कुछ रहा है और कर कुछ रहा है। M.Phil/Ph.D में एडमिशन के लिए सिर्फ दो प्रतिमान ही होने चाहिए।  पहला प्रतिमान लिखित परीक्षा और दूसरा प्रतिमान इंटरव्यू। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को तीसरे प्रतिमान को तत्काल प्रभाव से समाप्त करना चाहिए क्योंकि शोध कार्य के लिए ऐसे प्रतिमान की कोई प्रासंगिकता नहीं है। 

इनकी, देश-द्रोहिता पर आवाज नहीं उठती

"हिंदुस्तान - मुर्दाबाद", "भारत के बर्बादी तक - जंग रहेगी, जंग रहेगी" यह नारा दिया गया जो देश के लिए शर्म की बात है। हमारी असहमति देश की प्रशासनिक व्यवस्था से हो सकती है। हमारी असहमति देश की कानून व्यवस्था से हो सकती है। हमारी असहमति देश की गद्दार नेताओ से हो सकती है। हमारी असहमति देश के उन तमाम लोगो/संस्थाओ से भी हो सकती है जो लोग आधिकारिक रूप से सिस्टम में रह कर, देश का आगे बढ़ाने के नाम पर देश को लात मार रहे है। देश को लूट रहे है। जो देश को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बर्बाद कर रहे है, इन तमाम लोगो से हमारी असहमति है। लेकिन हमारे इस असहमति का मतलब ये नहीं होना चाहिए कि हम जिसके लिए लड़ रहे है, उसी का मुर्दाबाद करने लगे। वैसे जे एन यू के छात्रों को ऐसा क्यों करना पड़ा यह विचार का मुद्दा होना चाहिए। लेकिन सवाल ये है की सिर्फ वही देश द्रोही के श्रेणी में क्यों है? क्या दंगे कराने वाले देश द्रोही के श्रेणी में नहीं आते? इनको देश से निकालने का कथित-वीजा कोई नहीं देता। इनकी देश-द्रोहिता पर आवाज नहीं उठती है. ऐसे पक्षपातीय राष्ट्र भक्ति पर भी लानत होनी चाहिए। इस पर विचार करने के जगह राजनीति करने वालो तुम पर शर्म है।