Friday, 8 April 2022

सीयूईटी: अवसर और चुनौतियाँ

सीयूईटी: अवसर और चुनौतियाँ

सीयूईटी का पुरे देश में विरोध हो रहा है और इसे बंद करके पहले जैसी प्रणाली को लागु करने की मांग की जा  रही है। सही है। विरोध होना भी चाहिए क्योंकि पुरे देश से आने वाले ग्रामीण तबके के छात्रों पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा खास तौर से जो राज्य बोर्ड से पढ़ने वाले छात्र है। मेरे ख्याल से इसका विरोध सिर्फ  संशोधन के लिए होना चाहिए, सीयूईटी को बंद करके पहले जैसी प्रणाली के लिए नहीं क्योंकि अलग-अलग विश्वविद्यालयों का फॉर्म भरना, फीस जमा करना, परीक्षा देना इत्यादि चीजे सीमित अवसर कर देती है। अगर एक फॉर्म और परीक्षा से देश के किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय में दाखिला पाने के अवसर हो तो यह अच्छा है और इसे होना चाहिए। इसकी मांग बहुत पहले से अकादमिक जगत में चल रही थी। यूपीए के कार्यकाल में सीयूसीईटी सभी नए केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए बनी थी। फिर बाद में कुछ राज्य विश्वविद्यालय भी जुड़े। अगर उस प्लान को पुरे देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों से जोड़ दिया जाय तो यह सराहनीय कदम है।

 वास्तव में सीयूईटी ठीक उसी तरह का एक यूनिक मॉडल होगा जैसे आईआईटी, आईआईऍम, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी और अन्य इलीट इंस्टिटूशन्स में था। सीयूईटी को सिर्फ सभी सेंट्रल यूनिवर्सिटी के लिए लागु किया जाना चाहिए राज्य विश्वविद्यालय, डीम्ड विश्वविद्यायल और अन्य नहीं। लेकिन हां, सभी अलग-अलग राज्यों के राज्य विश्वविद्यालयों के लिए एक फार्म और एक परीक्षा होनी चाहिए जिससे उस राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में दाखिला मिल सके। विश्वविद्यालयों में दाखिला पाने के लिए सिर्फ तीन प्रणाली हो सकती है। पहला इंट्रेंस एग्जाम दूसरा मिनिमम एलिजिबिलिटी के मेरिट के आधार पर और तीसरा प्रथम आगमन प्रथम स्वागतम के आधार पर। इसमें सबसे सशक्त और अच्छा इंट्रेंस प्रणाली है सरकार अक्सर अमीर आश्रित नीतियां बनती है। ये नीति भी उन्ही में में से एक है।

इस देश के बड़े हिस्से में एनसीईआरटी की किताबें नहीं पढ़ाई जाती है। इस लिए वे छात्र प्रभावित होंगे जो राज्य बोर्ड से पढ़ते है और इससे सीबीएसई बोर्ड के छात्रों को लाभ होगा जिसमें अधिकतम अच्छी आर्थिक स्थिति के बच्चे पढ़ते हैं। हालाँकि एनसीईआरटी की किताबें मेरे अनुभव में सभी बोर्ड की किताबों से अच्छी है। इसलिए गणित, विज्ञान, अर्थशास्त्र ...... इत्यादि को (साहित्य को छोड़ कर) सभी विद्यालयों में अनिवार्य कर देना चाहिए। साहित्य का पाठ्यक्रम जैसे हिंदी, इंगलिश, गुजराती, मराठी ..... इत्यादि सम्बंधित राज्यों को निर्धारित करना चाहिए।

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