Wednesday, 25 March 2015
Wednesday, 4 February 2015
अवाम
अपने कैफ़ी आज़मी साब कहा करते थे,
"कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले
उस इन्कलाब का, जो आज तक उधार सा है।"
आज भी हम गणतंत्र दिवस जैसे पवित्र पर्व पर किसी मेहमान को सौदे के लिए बुलाते है। आज़ादी की जश्न के लिए नहीं। क्या हम राष्ट्रीय पर्वों पर भी विदेशी सौदेबाजी को निषिद्ध नहीं कर पा रहे है। आज अवाम यह समझ नहीं पा रहा है कि वो मंत्रमुग्ध कर रहे है या आज्ञालंघन। इन दोनों में चाहे जो भी हो, आज अवाम इस भोगाधिकार को झेल रहा है।
"कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले
उस इन्कलाब का, जो आज तक उधार सा है।"
आज भी हम गणतंत्र दिवस जैसे पवित्र पर्व पर किसी मेहमान को सौदे के लिए बुलाते है। आज़ादी की जश्न के लिए नहीं। क्या हम राष्ट्रीय पर्वों पर भी विदेशी सौदेबाजी को निषिद्ध नहीं कर पा रहे है। आज अवाम यह समझ नहीं पा रहा है कि वो मंत्रमुग्ध कर रहे है या आज्ञालंघन। इन दोनों में चाहे जो भी हो, आज अवाम इस भोगाधिकार को झेल रहा है।
Tuesday, 16 December 2014
आजमगढ़: आज और आदि
यू तो अपना आजमगढ़ हमेशा खबरों की सुर्खियों में रहा है। आज भी और आदि में भी था। कभी ऋषि - मुनियों की तपस्थली के रूप में, कभी स्वतंत्रता सेनानियों के धरती के रूप में, कभी कवियों, शायरों, लेखकों और विचारकों के गढ़ के रूप में इसके अलावा भी मार्क्सवादी विचार धारा के लोग भी कुछ ऐसा ही रोल अदा करते है जिसकी वजह से आजमगढ़ को उत्तर प्रदेश का केरल भी कहा जाता है। इतना ही नहीं पुलिस की फर्जी छापेमारी और मिडिया की निर्विचार चहलकदमी (जिसे कुछ लोग मीडिया की चुतियापा भी कहते हैं ) ने इसे रौदते हुए शुर्खियो में रखा जिसकी वजह से इसे आतंक की नर्सरी के रूप में भी कुछ बचकाने उल्लुओ ने देखना शुरू कर दिया। हालाँकि ऐसे उल्लुओ ने आत्महित के लिए पुरजोर बुढ़भस और बौखलाहट दिखाई जिसमे वे कदाचित सफल भी रहे लेकिन ये सफलता लोकाभिमुख नहीं थी। इस ब्लॉग की फाइल में अटैच फोटु की वजह से आज-कल आजमगढ़ को एक बार फिर बेपनाह किया गया है खैर ये उस मजलिश के लोग है जिसे समाजवादी पार्टी के सेवक के तौर पर जाना जाता है। मेरा व्यक्तिगत मानना है की हम ऐसे सेवकों से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं कर सकते क्योंकि जिस मजलिश की नियत ही दादागिरी और परिवारगिरी जैसी मान्यताओ पर चलती दिखती है उससे हम लोकाभिमुख कार्य प्रणाली की बात नहीं कर सकते है।
Tuesday, 11 November 2014
हमारी शिक्षा व्यवस्था
आज हमारे देश में कुछ स्कूलों में कुछ छोटे बच्चों को प्रवेश इस लिए नहीं दिए जा रहे है क्योंकि उनके माता पिता निरक्षर है। मुझे लगता है कि ये उसी मज़लिस के क्रूर सोच के पक्षधर है जो निरक्षर को निरक्षर तथा गरीब को और गरीब बनाने की साजिशे रचते है। इस लिए ऐसे मज़लिस के मज़मून की मज़ाल को समझना जरुरी है। जरा सोचिये जिस देश की सरकार सर्व शिक्षा अभियान जैसे महत्वपूर्ण मिशन चला रही हो। "पढ़ेगा भारत, बढ़ेगा भारत" जैसे वैचारिक नारे दिए जा रहे हो। ऐसे दौर में इस तरह के लोमहर्षक नियम बनाना इन महत्वपूर्ण मिशन को तमाचा मारने जैसा है और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तपके के साथ घोर अन्याय है। मैं इस देश की सरकार तथा राज्य सरकारों से यह उम्मीद करता हूँ कि ऐसे संवेदनशील मुद्दो से अंजान न बने, ऐसे स्कूलों को चिन्हित कर इनके संविधान को बदलवाए और अगर ये नहीं मानते है तो इनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए।
ये तो प्राथमिक शिक्षा का हाल है। अग़र हम उच्च शिक्षा पर नजर डाले तो इनकी वैचारिक हालत और भी निकम्मी है। शायद आज हमारे देश का कोई भी शख्स इस कथन से असहमत नहीं होगा की हमारे देश की उच्च शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा भाग चमचा युग में जी रही है। उपरोक्त दोनों दशाये वेहद खतरनाक है इन्हे सुधारने के लिए बड़े बदलाव की जरुरत है।
मेरे भारत, मेरे हिन्दोस्ताँ, मेरे इंडिया मैं तुमसे यही कहना चाहता हूँ कि तुम्हारी ये हालत हम जैसे लोग सुधारंगे………।
राघवेन्द्र यादव
इन्कलाब - जिंदाबाद
ये तो प्राथमिक शिक्षा का हाल है। अग़र हम उच्च शिक्षा पर नजर डाले तो इनकी वैचारिक हालत और भी निकम्मी है। शायद आज हमारे देश का कोई भी शख्स इस कथन से असहमत नहीं होगा की हमारे देश की उच्च शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा भाग चमचा युग में जी रही है। उपरोक्त दोनों दशाये वेहद खतरनाक है इन्हे सुधारने के लिए बड़े बदलाव की जरुरत है।
मेरे भारत, मेरे हिन्दोस्ताँ, मेरे इंडिया मैं तुमसे यही कहना चाहता हूँ कि तुम्हारी ये हालत हम जैसे लोग सुधारंगे………।
राघवेन्द्र यादव
इन्कलाब - जिंदाबाद
Saturday, 9 August 2014
राजनितिक नौटंकिया
सुना है किसी सीएम ने बालिका शिक्षा बढ़ाने के लिए बारहवीं पास करने वाली छात्रा को स्कूटी देगी।
हद हो गई !!!!!!!!!!!
अब इनको कौन समझाए! यहाँ स्कूल की फ़ीस देना मुस्किल है मैडम। अगर आप मुक्त शिक्षा , मुक्त अध्ययन सामग्री दे तो शिक्षा का स्तर बढ़ जायेगा। स्कूलों में शिक्षको की कमी है उनकी पूर्ति करिये। जो शिक्षक स्कूल नहीं जा रहे है उनको स्कूल भेजिए। जिन गाँवो में स्कूल नहीं है उन गाँवो में नया स्कूल का निर्माण करवाइये। शिक्षा का स्तर स्वतः बढ़ जायेगा। ये राजनितिक नौटंकिया करने से आप समाचार की सुर्ख़ियो में भले ही रहे, शिक्षा का विकास नहीं हो सकता। फ़िलहाल उपरवाला आपके नीति निर्माताओ को सद्बुद्धि दे।
हद हो गई !!!!!!!!!!!
अब इनको कौन समझाए! यहाँ स्कूल की फ़ीस देना मुस्किल है मैडम। अगर आप मुक्त शिक्षा , मुक्त अध्ययन सामग्री दे तो शिक्षा का स्तर बढ़ जायेगा। स्कूलों में शिक्षको की कमी है उनकी पूर्ति करिये। जो शिक्षक स्कूल नहीं जा रहे है उनको स्कूल भेजिए। जिन गाँवो में स्कूल नहीं है उन गाँवो में नया स्कूल का निर्माण करवाइये। शिक्षा का स्तर स्वतः बढ़ जायेगा। ये राजनितिक नौटंकिया करने से आप समाचार की सुर्ख़ियो में भले ही रहे, शिक्षा का विकास नहीं हो सकता। फ़िलहाल उपरवाला आपके नीति निर्माताओ को सद्बुद्धि दे।
Wednesday, 16 July 2014
जवाहर लाल नेहरू और नरेंद्र मोदी
मुझे लगता है जवाहर लाल नेहरू और नरेंद्र मोदी के आर्थिक विचारों के बीच कोई भिन्नता नहीं है क्योकि दोनों भारी औद्योगीकरण के पक्ष में हैं. दोनों विदेशी तकनीकी के पक्ष में है। कुछ समय पहले गुजरात में जब नरेंद्र मोदी जी चुनावी सभा सम्बोधित कर रहे थे तो वे नेहरू जी पर कटाक्ष करते हुए कहे थे की इस देश के पहले पी एम सरदार पटेल जी होते तो देश की दिशा कुछ अलग होती। शायद उनका इसारा विदेशी बड़े उद्योग की जगह देशी छोटे उद्योगो की तरफ था। इस तथ्य से मैं सहमत भी था की सरदार पटेल जी गरीबो को ध्यान में रख कर नीतिया बनाते। वे आर्थिक ग्रोथ पर जोर न देकर आर्थिक विकास पर ज्यादा ध्यान देते। ऐसे भाषणो से मोदी जी ने लोगो को लुभाया तो जरूर लेकिन कर क्या रहे है ? किसके पद चिंन्हो पर चल रहे है नेहरू जी के या सरदार पटेल जी के। शायद नेहरू जी के। कहा गया पटेल जी का आर्थिक सिद्धांत ? मोदी जी आप चाहे जितना विदेशियो को निवेश के लिए बुला लीजिये, चाहे जितना भारी उद्यमों को बढ़ावा दीजिये। उससे आप ग्रोथ भले ही कर लेंगे लेकिन विकास नहीं कर पाएंगे। इसका परिणाम होगा सापेक्ष गरीबी बढ़ेगी, असमानता बढेगी, लोगो में असंतोष बढ़ेगा। आपके द्वारा लागु की जा रही नीतियों से एक गाव का एक आदमी तो हवाई जहाज से चलेगा लेकिन पूरा गाव रोज की दो वक्त की रोटी जुटाने में पूरी जिंदगी गुजार देगा वो और कुछ नहीं कर पायेगा। इसलिए आप ग्रोथ की जगह समावेशी विकास पर ध्यान दीजिये जिससे सवा सौ करोड़ जनता का भला हो सके। सबका साथ सबका विकास केवल नारा मत दीजिये उसे धरातल पर उतारिये।
Monday, 30 June 2014
गैर जरूरी और गैर हितैसी
अभी हाल ही में बनी नई-नवेली सरकार से जनता को यह उम्मीद नहीं थी कि ये भी वही गैर जरूरी और जनता की गैर हितैसी काम करेंगे जो इसके पूर्ववर्ती सरकार ने किये थे। गैर जरुरी कार्य जैसे राज्यपालों को बिना वजह हटाना और गैर हितैसी कार्य जैसे महगाई में बढ़ोत्तरी, रेल किराया में बढ़ोत्तरी, विदेशी पूजीपतियों को उद्योग के लिए शरण देना …… आदि आदि। देश को उम्मीद थी की सुशासन आयेगा तो देश की सरकारी मशीनरी नियमित काम करना शुरू कर देगी। लेकिन सरकार के एक महीना बीतने के बाद भी कोई बड़ा परिवर्तन देखने को नहीं मिला। आज भी ट्रेनों के आवागमन का वही हाल है जैसे की पहले थी। हाल ही में मैं इलाहाबाद से अहमदाबाद का सफर किया था। मैं जिस ट्रेन से आया उसके पहुँचने का समय शाम के 7.10 पर था लेकिन वह 8.20 घंटे की देरी से 3.30 पर पहुंची। आज कल ट्रेनों के लेट होने का कोई प्राकृतिक कारन भी नहीं है जैसे घना कुहरा या अन्य समस्या। इसे लेट होने के लिए सिर्फ सरकारी मशीनरी जिम्मेदार है। इसके अलावा रेल से जुडी एक और समस्या जो लम्बी दुरी के लिए भी सामान्य श्रेणी में यात्रा करते है (चाहे पैसा के अभाव में या टिकट न ले पाने की वजह से) उनको डायरेक्ट प्रभावित करती है। स्टेशन पर पुलिस की मिली-भगत से कुलियों द्वारा सीट देने के नाम पर जबरदस्ती वसूली। ये समस्या मुझे दिल्ली और अहमदाबाद में कुछ ज्यादा दिखी। दिखाने के लिए तो यहाँ कैमरा से रेकार्डिंग होती है लेकिन ये महज दिखावा ही सिद्ध होता है। सरकार को चाहिए की सरकारी मशीनरी के ऊपर लगाम लगाये की इस प्रकार की समस्याएं जल्दी दूर हो जिससे लोगो को राहत मिले। अगर वर्तमान सरकार भी पूर्ववर्ती सरकार की तरह महगाई बढ़ाते रही और विदेशी निवेश को बढ़ाई तो ये जनता है सोया हुआ शेर। जिस दिन जागेगी तख्ता पलट कर देगी वे पांच साल का इंतजार नहीं करेगी।
रघु अपना
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