Friday, 21 April 2017

अम्बेडकर जयंती: बदलाव का नया दौर

जय भीम, जय समाजवाद साथियों-

यह बेहद संतुष्टि प्रदाता पल होते है जब हम किसी ऐसे शख्शियत को और उसके विचारों को याद कर रहे होते है जिसने इंसानियत कायम करने के लिए पुरे ज़माने से, पुरे जोश के साथ लडा। ये सिर्फ लड़े ही नहीं, प्रतिद्वंदियों को पछाड़े भी जिसका असर सिर्फ उसी समय नहीं दिखा बल्कि आज-तक दिख रहा है और यह आज-कल के आलावा परसों-नरसों-बरसों तक दिखता रहेगा। उस समय मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विद्यार्थी हुआ करता था और केo पीo युo सीo छात्रावास का अंतेवासी था। इस छात्रावास में अम्बेडकर जयंती नहीं मनाई जाती थी और इलाहाबाद में ही नहीं, तक़रीबन पुरे युपी में कदाचित जगहों पर ही अम्बेडकर जयंती मनाई जाती थी। लेकिन छात्रावास में  धार्मिक त्यौहार और यहाँ तक की अखण्ड रामायण और गीता के पाठ कभी कभी कराये जाते थे। वह इस दशक का शुरूआती दौर था जब अम्बेडकर जयंती के दिन हम आपस में डिस्कस किया करते थे कि आज का कोई अख़बार उठा कर देख लीजिये जिस तरह से जवाहर लाल नेहरू, महात्मा गांधी, आदि लोगों के जयंती या पुण्यतिथि पर जो स्थान उनको न्यूज पेपर में मिलता है वो स्थान अम्बेडकर जयंती या पुण्यतिथि पर अम्बेडकर जी को नहीं मिलता। कुछ अखबारों में सरकारी विज्ञापन आ जाते थे लेकिन मीडिया रिपोर्टिंग कुछ खास नहीं होती थी। मेरे बैच ने इसकी (अम्बेडकर जयंती) शुरुवात करने का निर्णय लिया। कुछ लोगो का सहयोग मिला और कुछ लोग इससे संतुष्ट नहीं थे। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हमारे बैच ने इसे मनाया। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये हालात इक्कीशवी शदी के एक दशक बाद था।  उस समय हम लोगों के डिस्कस के निष्कर्ष हुआ करते थे कि सरकार को चाहिए कि अम्बेडकर जयंती और संविधान दिवस मनाना सभी स्कूलों और कालेजों में मैंडेट्री कर दे।  उसके बाद करीब 2013-14 में अम्बेडकर पर डिस्कोर्स शुरू हुआ; जिसका बाद में इसका बड़े स्तर पर राजनीतिकरण हुआ और आज विशेषज्ञ यह कह रहे है कि 20वी सदी गाँधी की थी और 21वी सदी अम्बेडकर की होगी। अब बाबा साहेब की जयंती बड़े स्तर पर मनाते देख हर्ष से पूर्ण हो रहा हूँ। अगर एक्टिविजम का ये दौर ऐसे ही चालू रहा तो अगले दशक में एक बड़ी सामाजिक क्रांति आ सकती है जो जातीय आधार पर ऊँच - नीच की हाइरार्की को ध्वस्त करने में बड़े स्तर पर सफल होगी। 


Wednesday, 5 April 2017

उच्च शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण


.......हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

साथियों,
 सर्व प्रथम मैं यह स्पष्ठ कर दूं कि मेरा यह राइटिंग किसी संगठन के खिलाप नहीं है। किसी विचारधारा के विरुद्ध नहीं है। मेरा प्रयास है, हुकूमते-हिन्द का ध्यान इस ओर आकृष्ट करना।

जैसा कि यह सर्वविदित है कि आजाद भारत सातवें दशक के उत्तरार्ध में है लेकिन हैरत की बात है कि आज तक हमारा संविधान पूरी तरह से जमीनी स्तर पर इम्प्लीमेंट नहीं हो पाया है। अगर मैं बात करू भारत के "केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान " (वे चाहे यूनिवर्सिटी हो या नेशनल इंट्रेस्ट के इंस्टिट्यूशन)  की तो वहाँ भी कुछ ऐसे संस्थान आज भी मिलेंगे जहाँ पर भारत सरकार की रिजर्वेशन पालिसी पूरी तरह से इम्प्लीमेंट नहीं हो पायी है। इसलिए, उच्च शैक्षणिक संस्थानों के सरकारिया-साहबजादों को इसपर विशेष ध्यान देना चाहिए।

मैं, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ बिहार और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च पुणे (IISER) का उदहारण दे रहा हूँ। <https://www.cucet2017.co.in/PDF/EligibilityCriteria/CUSBR%20Eligibility%20Criteria-CUCET2017.pdf>

<http://www.iiserpune.ac.in/admissions/int-phd-programme>

यहाँ पर एडमिशन के लिए नोटिफिकेशन आया है और ओबीसी (नान-क्रीमीलेयर) के लिए रिजर्वेशन इम्प्लीमेंट नहीं हुआ है।

 मैं, आपका ध्यान भारत के राजपत्र, भाग-1, खंड-1, जो 22 दिसंबर 2011 को प्रकाशित हुआ, और भारत के राजपत्र, भाग-1, खंड-1, जो 20 अप्रैल 2008 को प्रकाशित हुआ, पर आकृष्ट करना चाहता हूँ।, जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, और अन्य पिछड़े वर्ग को  केंद्रीय शैक्षणिक संस्थाओ में दाखिले में आरक्षण उपलब्ध कराता है। मैं, इस देश के सामजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ों की आवाज बनकर एचआरडी मंत्रालय, भारत सरकार से यह अपील करता  हूँ कि भारत के संविधान की आत्मा का सम्मान करते हुए, देश के सभी केंद्रीय शैक्षणिक संस्थाओ (जो केंद्र सरकार द्वारा स्थापित, अनुरक्षित अथवा सहायता प्रदत्त है) में रिजर्वेशन लागू करवाना सुनिश्चित करें।