अम्बेडकर जयंती: बदलाव का नया दौर
जय भीम, जय समाजवाद साथियों-
यह बेहद संतुष्टि प्रदाता पल होते है जब हम किसी ऐसे शख्शियत को और उसके विचारों को याद कर रहे होते है जिसने इंसानियत कायम करने के लिए पुरे ज़माने से, पुरे जोश के साथ लडा। ये सिर्फ लड़े ही नहीं, प्रतिद्वंदियों को पछाड़े भी जिसका असर सिर्फ उसी समय नहीं दिखा बल्कि आज-तक दिख रहा है और यह आज-कल के आलावा परसों-नरसों-बरसों तक दिखता रहेगा। उस समय मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विद्यार्थी हुआ करता था और केo पीo युo सीo छात्रावास का अंतेवासी था। इस छात्रावास में अम्बेडकर जयंती नहीं मनाई जाती थी और इलाहाबाद में ही नहीं, तक़रीबन पुरे युपी में कदाचित जगहों पर ही अम्बेडकर जयंती मनाई जाती थी। लेकिन छात्रावास में धार्मिक त्यौहार और यहाँ तक की अखण्ड रामायण और गीता के पाठ कभी कभी कराये जाते थे। वह इस दशक का शुरूआती दौर था जब अम्बेडकर जयंती के दिन हम आपस में डिस्कस किया करते थे कि आज का कोई अख़बार उठा कर देख लीजिये जिस तरह से जवाहर लाल नेहरू, महात्मा गांधी, आदि लोगों के जयंती या पुण्यतिथि पर जो स्थान उनको न्यूज पेपर में मिलता है वो स्थान अम्बेडकर जयंती या पुण्यतिथि पर अम्बेडकर जी को नहीं मिलता। कुछ अखबारों में सरकारी विज्ञापन आ जाते थे लेकिन मीडिया रिपोर्टिंग कुछ खास नहीं होती थी। मेरे बैच ने इसकी (अम्बेडकर जयंती) शुरुवात करने का निर्णय लिया। कुछ लोगो का सहयोग मिला और कुछ लोग इससे संतुष्ट नहीं थे। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हमारे बैच ने इसे मनाया। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये हालात इक्कीशवी शदी के एक दशक बाद था। उस समय हम लोगों के डिस्कस के निष्कर्ष हुआ करते थे कि सरकार को चाहिए कि अम्बेडकर जयंती और संविधान दिवस मनाना सभी स्कूलों और कालेजों में मैंडेट्री कर दे। उसके बाद करीब 2013-14 में अम्बेडकर पर डिस्कोर्स शुरू हुआ; जिसका बाद में इसका बड़े स्तर पर राजनीतिकरण हुआ और आज विशेषज्ञ यह कह रहे है कि 20वी सदी गाँधी की थी और 21वी सदी अम्बेडकर की होगी। अब बाबा साहेब की जयंती बड़े स्तर पर मनाते देख हर्ष से पूर्ण हो रहा हूँ। अगर एक्टिविजम का ये दौर ऐसे ही चालू रहा तो अगले दशक में एक बड़ी सामाजिक क्रांति आ सकती है जो जातीय आधार पर ऊँच - नीच की हाइरार्की को ध्वस्त करने में बड़े स्तर पर सफल होगी।
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