गरीबी एक निर्विवाद सत्य है लेकिन यह जानना बेहद
विवाद का विषय है कि गरीब कौन है? सामान्यतया, गरीबी
निर्धारण मानवीय स्थिति का अध्ययन है जिसे आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक…. आदि प्रतिबिम्बों के रूप में देखा जा सकता है। अगर हम
गरीबी रेखा निर्धारण के इतिहास को देखे तो पहले पोषक तत्वों के आधार पर गरीबी रेखा
का निर्धारण किया जाता था लेकिन आज वैश्वीकरण, उदारीकरण, और निजीकरण ने गरीबों की इतनी प्रजातियां
पैदा कर दी हैं कि इसकी प्रकृति को समझना अर्थशास्त्रियों और सामाजिक वैज्ञानिकों के
लिए बेहद कठिन और पेचीदा हो गया है। वैसे वैज्ञानिक तौर पर गरीबी निर्धारण के लिए कोई एक निश्चित रेखा नहीं खींची जा सकती है
जिसके नीचे जीवन यापन करने वाले व्यक्ति को गरीब और उसके ऊपर जीवन यापन करने वाले व्यक्ति
को अमीर कहा जा सके क्योंकि गरीबी एक गुणात्मक चर है। जिसकी मात्रात्मक माप संभव नहीं
है। फिर भी सामान्य तौर पर कुछ मूलभूत वस्तुओं का सूचकांक बना कर जीवन यापन करने के
लिए एक रेखा खींची जा सकती है जिस पर एक आम आदमी को आत्म सम्मान के साथ स्वास्थ्य जिंदगी
जीना मुमकिन हो। गरीबी रेखा का
यह मापदंड
गरीब और गैर-गरीब को अलग कर सकती है।
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी रेखा के
गणित को सुलझाने के लिए अनेक प्रयास किये जा चुके है और अभी भी जारी है। भारत में वर्तमान समय में
गरीबी को परिभाषित करने के लिए नीति आयोग के सानिध्य में मार्च 2015 में एक
कार्य दल का गठन किया गया है। इस कार्य दल को गरीबी रेखा मापदंड की कार्यकारी परिभाषा
विकसीत करना, गरीबी उन्मूलन के लिए एक रोडमैप तैयार करना और साथ ही साथ गरीबी उन्मूलन
के लिए कारगर नीतियों के सन्दर्भ में सुझाव देना है। इस कार्य दल को जून 2015 तक अपनी रिपोर्ट तैयार करना था।
21 जुलाई 2015 को 30 अगस्त 2015 तक इसका समय
विस्तारित किया गया लेकिन हैरत की बात है कि निश्चित्त समय बीतने के दो साल बाद भी
इस कार्य दल द्वारा विकसित आधिकारिक परिभाषा जो भारत सरकार के विचार का प्रतिनिधित्व
करती हो, आज तक पब्लिक डोमेन में नहीं आयी और न ही यह पता है कि उस कार्य दल का समय
कब तक विस्तारित किया गया है।
भारत जैसे विकासशील देश जहाँ कुपोषण का स्तर भयानक स्थिति में
हो। किसान और मजदूर गरीबी और बेबसी की वजह से आये दिन आत्महत्या कर रहे हो। देश की
एक बड़ी आबादी भोगानुभव में जी रही हो। वहाँ (उस देश में) आधिकारिक तौर पर यह न पता
हो कि गरीब कौन है? गरीबी की प्रकृति क्या है? गरीबों की संख्या कितनी है? यह सरकार
के अकर्मण्यता को दर्शाता है। गरीबी अध्ययन महज दो देशों या राज्यों में तुलना का विषय
ही नहीं वरन यह नीति विषयक भी है। इसलिये सरकार आधिकारिक तौर पर गरीबी रेखा का प्रतिमान
सुनिश्चित करे जिससे गरीबों का सही चेहरा सामने आएगा और सही मायने में
गरीबों के प्रसार का पता चलेगा। गरीबी की
प्रकृति और गरीबों के प्रसार का सही आकड़ा ज्ञात होने पर गरीबी उन्मूलन के लिए बनाई
गई रणनीति ज्यादा सार्थक और कारगर होगी। गरीबी उन्मूलन के लिए बने रणनीतियों का निहितार्थ
सिर्फ कागजी न होकर जमीनी स्तर पर क्रियाशील भी होना चाहिए।
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रिसर्च स्कॉलर
सेंटर फॉर स्टडीज एण्ड रिसर्च इन इकोनॉमिक्स
& प्लानिंग
स्कूल ऑफ सोशल साइंस
सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात
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