Monday, 1 August 2022

गरीबी रेखा के मापदंड और नीतिगत निहितार्थ

     गरीबी पूरी दुनिया में हमेशा ज्वलंत मुद्दा के रूप में पायी जाती है। गरीबी रेखा के प्रतिमान क्या होने चाहिए? यह पूरी दुनिया में हमेशा चर्चा का विषय रही है। अगर स्थितियां ऐसी ही रही तो यह कभी न समाप्त होने वाली बहस के रूप में देखी जा सकती है।  अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी रेखा के गणित को सुलझाने के लिए अनेक प्रयास किये जा चुके है और अभी जारी भी है। भारत सरकार ने भी आजादी के बाद  तात्कालिक योजना आयोग के सानिध्य में कार्यकारी दल, विशेषज्ञ दल और टास्क फोर्स के माध्यम से गरीबी रेखा को परिभाषित किया और हर प्रयास में गरीबी रेखा की एक खास अवधारणा  विकसित हुई लेकिन सरकार का हर प्रयास महज कागजी कार्यवाही ही सिध्द हुई जो कि धरातलीय सच्चाई का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही थीयोजना आयोग के सानिध्य में अंतिम बार डॉ सी० रंगराजन के अध्यक्षता में विशेषज्ञ दल ने गरीबी रेखा निर्धारण का एक नया फार्मूला दिया।  इस कमेटी ने बताया कि अगर गाँव में रहने वाला व्यक्ति 32.40 रु० और शहर में रहने वाला व्यक्ति 46.90 रु० प्रतिदिन या इससे अधिक कमाता है तो वह गरीब नहीं है अर्थात वह व्यक्ति गरीबी रेखा से ऊपर जीवन-यापन कर रहा है। योजना आयोग द्वारा दिए गए पूर्ववर्ती फार्मूले की तरह यह फार्मूला भी लोगों को रास नहीं आया। इस फार्मूले से गरीबी निर्धारण से ज्यादा राजनीतिक सरगर्मी मापी गई। गरीबी रेखा के इस प्रतिमान को कुछ विशेषज्ञ भूखमरी और कुपोषित रेखा कहे थे तो कुछ लोग इसे कुत्ता-बिल्ली लाइन कह कर इस परिभाषा का उपहास उड़ाये। 2014 के आम चुनाव में गरीबी मापदंड की इस परिभाषा को उसी तरह भुनाया गया था जैसे कालाधन, घोटाला और महंगाई।

            वर्तमान सरकार ने डॉ सी० रंगराजन कमेटी के परिभाषा को अस्वीकार करते हुए एक नए कमेटी का गठन कर गरीबी को नए तरीके से परिभाषित करने की बात की। जिसे नीति आयोग के पहले मीटिंग में गरीबी रेखा निर्धारण के लिए एक टास्क फोर्स बनाने का निर्णय लिया गया। 16 मार्च 2015 को नीति आयोग के वाइस चेयरमैन डॉ अरविन्द पनगरिया के अध्यक्षता में “भारत में गरीबी उन्मूलन” के लिए 14 सदस्यी एक टास्क फोर्स बनी। इस टास्क फोर्स को गरीबी मापदंड की कार्यकारी परिभाषा विकसीत करना था तथा गरीबी उन्मूलन के लिए एक रोडमैप तैयार करना और साथ ही साथ गरीबी उन्मूलन के लिए कारगर नीतियों के सन्दर्भ में सुझाव देना था। इस टास्क फोर्स को जून 2015 तक अपनी रिपोर्ट तैयार करना था। 21 जुलाई 2015 को 30 अगस्त 2015 तक इसका समय विस्तारित किया गया। भारत में गरीबी मापदंड के इस नये परिभाषा का इस समय बुद्धिजीवी से लेकर आम आदमी तक बड़ी शिद्दत से इंतजार कर रहा है लेकिन हैरत की बात है कि निश्चित्त समय बीतने के दो साल बाद भी टास्क फोर्स द्वारा विकसित आधिकारिक परिभाषा जो भारत सरकार के विचार का प्रतिनिधित्व करती हो, आज तक पब्लिक डोमेन में नहीं आयी है और न ही यह पता है कि उस टास्क फोर्स का समय कब तक बढ़ाया गया है।

भारत जैसे विकासशील देश जहाँ  कुपोषण का स्तर भयानक स्थिति में हो। किसान और मजदूर गरीबी और बेबसी की वजह से आये दिन आत्महत्या कर करे हो। देश की एक बड़ी आबादी भोगानुभव में जी रही हो। वहाँ (उस देश में) आधिकारिक तौर पर यह न पता हो कि गरीब कौन है? गरीबी की प्रकृति क्या है? गरीबों की संख्या कितनी है? यह सरकार के अकर्मण्यता को दर्शाता है। भारत को अपने कुपोषण, भुखमरी और गरीबी की वजह से कई बार वैश्विक पटल पर शर्म से झुकना पड़ता है। भारत सरकार और सूबे की सरकारों को यह चाहिए कि वे सर्वप्रथम गरीब और गरीबी के प्रकृति को पहचाने फिर उसके उन्मूलन हेतु नीतियां चलायें। उन नीतियों  का निहितार्थ सिर्फ कागजी न होकर धरातलीय कार्यकारी भी हो।



परिचय

राघवेंद्र यादव

रिसर्च स्कॉलर

सेंटर फॉर स्टडीज एण्ड रिसर्च  इन  इकोनॉमिक्स & प्लानिंग

स्कूल ऑफ सोशल साइंस

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात

गांधीनगर, गुजरात, 382029

Email- raghavendra.pahal50@gmail.com

 

 

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