Sunday, 28 June 2015
Monday, 22 June 2015
कर्म ही पूजा है, योग तो दूजा है
"हठ" योगा प्रचारकों और "हॉट" योगा प्रचारकों के अथक प्रचार ने रंग लाई। भारत ने पूर्व कल्पित रिकार्ड (ये तो होना ही था) बना लिया। बधाई हो भक्तों तुमको। वैसे पूरी दुनिया में भारत में सबसे ज्यादा लोग योगा करते है इसका मतलब की पूरी दुनिया में भारतीयों को सबसे स्वास्थ्य होना चाहिए लेकिन अफ़सोस की स्वास्थ्य के प्रतिमानों पर भारत बहुत पीछे है। तो भक्तों इसे भी समझने की जरुरत है। कर्म ही पूजा है , योग तो दूजा है।
Sunday, 24 May 2015
"सबका साथ, सबका विकास" अरे नहीं भई "कुछ का साथ, कुछ का विकास" जैसे प्रतिमानों पर चलने वाली सरकार के कार्यकाल का 1/5 (एक बटे पांच) भाग समाप्त हुआ और 4/5 (चार बटे पांच) भाग बचा है। मुझे वो भाषण याद आ रहा है जिसमे कहा गया था की मुझे साठ महीने दे दो मैं यु पी को गुजरात बना दूंगा। मुझे उम्मीद है कि यु पी को गुजरात बनने की नीव पड चुकी होगी। सिर्फ नीव ही नहीं यु पी का 1/5 भाग गुजरात भी बन गया होगा। आगे 4/5 (चार बटे पांच) भाग को गुजरात बनाने के लिए भगवान आपकी भला करे , की आप जल्दी बना सके। सबको बिजली , सबको पानी , सबको शौचालय , सबको शिक्षा , सबको रोजगार , सबको इलाज , सबको घर...… और ना जाने क्या -क्या। बटोरते रहो भक्तों सुरुआत तुम्ही से होनी है और शायद अंत भी।
जय राम जी की
जय राम जी की
Tuesday, 7 April 2015
बीजेपी के सांसद श्यामा चरण गुप्ता ने कहा "धूम्रपान से सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता हैं।" मुझे समझ में नहीं आता की फिर एक साल में ९ लाख ८१ हजार लोग तम्बाकू से कैसे मौत को सिधार जाते है। ये महोदय सांसद बाद में बीड़ी कारोबारी पहले है। इस लिए ये कह सकते है आखिर व्यापार वाला मामला है। मुझे बड़ी हैरत होती है और सायद आपको भी कि केंद्र सरकार ने इस बीड़ी कारोबारी को 'तंबाकू उत्पाद कानून २००३' के प्रावधानों पर गौर कर रही एक विधायी समिति का सदस्य भी बनाया है। इस समिति ने सरकार से मांग किया है की सिगरेट और धूम्रपान के पैकेट पर ४०% से बड़ा कर ८५ % किया जाय। जिस प्रस्ताव को इस महोदय ने रोकने के लिए कहा है। इस जनाब को इस कमिटी से हटाया जाना चाहिए। आप को जान कर हैरत होगी की ऐसे उत्पादों के पैकेट पर थाईलैंड में ८५%, आस्ट्रेलिया में ८२.5%, श्रीलंका में ८० % हिस्से पर वैधानिक चेतावनी लिखा होता है। मैं भारत सरकार से यह मांग करता हूँ कि सिगरेट और तम्बाकू जैसे सभी धूम्रपान की पैकेट पर १००% हिस्से पर वैधानिक चेतावनी के निर्देश छपे हो। शायद यह अनूठा कार्य करने वाला भारत पूरी दुनिया में पहला देश बनेगा। हमें धूम्रपान मुक्त भारत चाहिए फिर पूरी दुनिया भी।
जनहित में रघु द्वारा जारी
जनहित में रघु द्वारा जारी
Friday, 3 April 2015
भोजपुरी संगीत: अस्मिता का संकट
जश्न मनाने के डी जे कल्चर ने भोजपुरी संगीत को आज - कल एकदम रौद कर रख दिया है। अगर भोजपुरी प्रेमी इस फूहड़पन को निषिद्ध नहीं किये तो इसकी अस्मित्ता समाप्तप्राय हो जाएगी। फूहड़पन से ओत-प्रोत ऐसे गाना को रिवाज में लाने का मुख्य वजह इस व्यवसाय का अर्थशास्त्र है जो भोजपुरिया अस्मित्ता को वेपनाह करने का पुरजोर कोशिश कर रहा है। इससे भी दुख की बात ये है कि आज किसी समारोह में ये फूहड़ गाने धड़ल्ले से बज रहे है। जैसे एक गाने की लाइन है 'फस गइल अडस गइल ', अब इस गाने फस गइल, अडस गइल पर लड़का भी नाच रहा है, उसका बाप भी नाच रहा है और उसका बाबा भी नाच रहा है। आखिर ये समाज कहा जा रहा है ? हम आज के पीढ़ी को क्या परोस रहे है ? हम कैसा समाज बना रहे है ? आज भोजपुरी के बहुत सारे ऐसे फूहड़ गाने जो एक सभ्य समाज नहीं सुन सकता फिर ऐसे गाने इतना धड़ल्ले से कानफाडू आवाज में क्यों बज रहे है ? आज असली भोजपुरी गाने (जो लोकाभिमुख हुआ करते है) कदाचित सुनाने को मिलते है। मैं आज के भोजपुरिया प्रेमियों से यह आह्वान करता हूँ कि ऐसे गानो का तिलांजलि करें। आज सांगीतिक क्रूर गायक /गायिकाओं के बौखलाहट, बुढ़भस , पोंगापन को सिरे से नकारें। हमें अच्छे गायकों/गायिकाओं को सुनने की पुरज़ोर उत्कंठा रखनी चाहिए। तभी हम अपने हर पीढ़ी को एक स्वस्थ कल्चर दे पाएंगे।
*******
राघवेन्द्र यादव
बिरहा भले ही बिरह से निकली हो लेकिन बिरहा सुनने के बाद मुझे लगा कि यह मनोरंजन का अच्छा साधन भी है जो बिरह के इतर शृंगारिकता, हास्यता और ना जाने ऐसे कितने भाव है जिसमे बिरहा की अच्छी पैठ है। यह अभिव्यक्ति, आत्माभिव्यक्ति और भावाभिव्यक्ति का अच्छा माध्यम है। यह चौतरफा समाज के इतिहास और वर्तमान की परिथितियों की गठरी है। इतना ही नहीं इसमें अच्छे भविष्य के लिए एक रोड मैप भी है अर्थात यह दूरदृष्टा भी है। इनके सुझाव समाज सुधार के लिए एक संस्था के रूप में कार्यरत है। देश पर जब - जब विपत्ति आयी बिरहा ने जम कर मुकाबला किया। जब देश में सैनिक और धन की कमी थी। तब बिरहा के गवईया ने गाया था, "माई हो ललनवा देदा, बहिनी हो बिरनवा देदा, एहि देशवा के खातिर अपने तन क गहनवा देदा.........।" बिरहा कल्चर को अपने बलेस्सर दादा (आदरणीय श्री बालेश्वर यादव) अंतर्राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया है। बिरहा के बारे में एक और अनोखी चीज जो मुझे लगी कि बिरहा बनाने में रिसर्च बहुत किया जाता है और यह रिसर्च बहुत कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ लोगो के द्वारा किया जाता है लेकिन उनकी फाइंडिंग जब बिरहा के माध्यम से समाज में आती है तो वैसी फाइंडिंग उस विषय के अच्छे-2 विशेषज्ञ उस तह तक जा कर वैसी फाइंडिंग नहीं दे पाएंगे। शायद ऐसा भी हो कि जितना रिसर्च बिरहा बनाने में किया जाता है उतना रिसर्च फिल्म बनाने में भी नहीं होता हो।
- - - - - - - -
राघवेन्द्र यादव
आजमगढ़
Wednesday, 25 March 2015
Wednesday, 4 February 2015
अवाम
अपने कैफ़ी आज़मी साब कहा करते थे,
"कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले
उस इन्कलाब का, जो आज तक उधार सा है।"
आज भी हम गणतंत्र दिवस जैसे पवित्र पर्व पर किसी मेहमान को सौदे के लिए बुलाते है। आज़ादी की जश्न के लिए नहीं। क्या हम राष्ट्रीय पर्वों पर भी विदेशी सौदेबाजी को निषिद्ध नहीं कर पा रहे है। आज अवाम यह समझ नहीं पा रहा है कि वो मंत्रमुग्ध कर रहे है या आज्ञालंघन। इन दोनों में चाहे जो भी हो, आज अवाम इस भोगाधिकार को झेल रहा है।
"कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले
उस इन्कलाब का, जो आज तक उधार सा है।"
आज भी हम गणतंत्र दिवस जैसे पवित्र पर्व पर किसी मेहमान को सौदे के लिए बुलाते है। आज़ादी की जश्न के लिए नहीं। क्या हम राष्ट्रीय पर्वों पर भी विदेशी सौदेबाजी को निषिद्ध नहीं कर पा रहे है। आज अवाम यह समझ नहीं पा रहा है कि वो मंत्रमुग्ध कर रहे है या आज्ञालंघन। इन दोनों में चाहे जो भी हो, आज अवाम इस भोगाधिकार को झेल रहा है।
Tuesday, 16 December 2014
आजमगढ़: आज और आदि
यू तो अपना आजमगढ़ हमेशा खबरों की सुर्खियों में रहा है। आज भी और आदि में भी था। कभी ऋषि - मुनियों की तपस्थली के रूप में, कभी स्वतंत्रता सेनानियों के धरती के रूप में, कभी कवियों, शायरों, लेखकों और विचारकों के गढ़ के रूप में इसके अलावा भी मार्क्सवादी विचार धारा के लोग भी कुछ ऐसा ही रोल अदा करते है जिसकी वजह से आजमगढ़ को उत्तर प्रदेश का केरल भी कहा जाता है। इतना ही नहीं पुलिस की फर्जी छापेमारी और मिडिया की निर्विचार चहलकदमी (जिसे कुछ लोग मीडिया की चुतियापा भी कहते हैं ) ने इसे रौदते हुए शुर्खियो में रखा जिसकी वजह से इसे आतंक की नर्सरी के रूप में भी कुछ बचकाने उल्लुओ ने देखना शुरू कर दिया। हालाँकि ऐसे उल्लुओ ने आत्महित के लिए पुरजोर बुढ़भस और बौखलाहट दिखाई जिसमे वे कदाचित सफल भी रहे लेकिन ये सफलता लोकाभिमुख नहीं थी। इस ब्लॉग की फाइल में अटैच फोटु की वजह से आज-कल आजमगढ़ को एक बार फिर बेपनाह किया गया है खैर ये उस मजलिश के लोग है जिसे समाजवादी पार्टी के सेवक के तौर पर जाना जाता है। मेरा व्यक्तिगत मानना है की हम ऐसे सेवकों से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं कर सकते क्योंकि जिस मजलिश की नियत ही दादागिरी और परिवारगिरी जैसी मान्यताओ पर चलती दिखती है उससे हम लोकाभिमुख कार्य प्रणाली की बात नहीं कर सकते है।
Tuesday, 11 November 2014
हमारी शिक्षा व्यवस्था
आज हमारे देश में कुछ स्कूलों में कुछ छोटे बच्चों को प्रवेश इस लिए नहीं दिए जा रहे है क्योंकि उनके माता पिता निरक्षर है। मुझे लगता है कि ये उसी मज़लिस के क्रूर सोच के पक्षधर है जो निरक्षर को निरक्षर तथा गरीब को और गरीब बनाने की साजिशे रचते है। इस लिए ऐसे मज़लिस के मज़मून की मज़ाल को समझना जरुरी है। जरा सोचिये जिस देश की सरकार सर्व शिक्षा अभियान जैसे महत्वपूर्ण मिशन चला रही हो। "पढ़ेगा भारत, बढ़ेगा भारत" जैसे वैचारिक नारे दिए जा रहे हो। ऐसे दौर में इस तरह के लोमहर्षक नियम बनाना इन महत्वपूर्ण मिशन को तमाचा मारने जैसा है और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तपके के साथ घोर अन्याय है। मैं इस देश की सरकार तथा राज्य सरकारों से यह उम्मीद करता हूँ कि ऐसे संवेदनशील मुद्दो से अंजान न बने, ऐसे स्कूलों को चिन्हित कर इनके संविधान को बदलवाए और अगर ये नहीं मानते है तो इनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए।
ये तो प्राथमिक शिक्षा का हाल है। अग़र हम उच्च शिक्षा पर नजर डाले तो इनकी वैचारिक हालत और भी निकम्मी है। शायद आज हमारे देश का कोई भी शख्स इस कथन से असहमत नहीं होगा की हमारे देश की उच्च शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा भाग चमचा युग में जी रही है। उपरोक्त दोनों दशाये वेहद खतरनाक है इन्हे सुधारने के लिए बड़े बदलाव की जरुरत है।
मेरे भारत, मेरे हिन्दोस्ताँ, मेरे इंडिया मैं तुमसे यही कहना चाहता हूँ कि तुम्हारी ये हालत हम जैसे लोग सुधारंगे………।
राघवेन्द्र यादव
इन्कलाब - जिंदाबाद
ये तो प्राथमिक शिक्षा का हाल है। अग़र हम उच्च शिक्षा पर नजर डाले तो इनकी वैचारिक हालत और भी निकम्मी है। शायद आज हमारे देश का कोई भी शख्स इस कथन से असहमत नहीं होगा की हमारे देश की उच्च शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा भाग चमचा युग में जी रही है। उपरोक्त दोनों दशाये वेहद खतरनाक है इन्हे सुधारने के लिए बड़े बदलाव की जरुरत है।
मेरे भारत, मेरे हिन्दोस्ताँ, मेरे इंडिया मैं तुमसे यही कहना चाहता हूँ कि तुम्हारी ये हालत हम जैसे लोग सुधारंगे………।
राघवेन्द्र यादव
इन्कलाब - जिंदाबाद
Saturday, 9 August 2014
राजनितिक नौटंकिया
सुना है किसी सीएम ने बालिका शिक्षा बढ़ाने के लिए बारहवीं पास करने वाली छात्रा को स्कूटी देगी।
हद हो गई !!!!!!!!!!!
अब इनको कौन समझाए! यहाँ स्कूल की फ़ीस देना मुस्किल है मैडम। अगर आप मुक्त शिक्षा , मुक्त अध्ययन सामग्री दे तो शिक्षा का स्तर बढ़ जायेगा। स्कूलों में शिक्षको की कमी है उनकी पूर्ति करिये। जो शिक्षक स्कूल नहीं जा रहे है उनको स्कूल भेजिए। जिन गाँवो में स्कूल नहीं है उन गाँवो में नया स्कूल का निर्माण करवाइये। शिक्षा का स्तर स्वतः बढ़ जायेगा। ये राजनितिक नौटंकिया करने से आप समाचार की सुर्ख़ियो में भले ही रहे, शिक्षा का विकास नहीं हो सकता। फ़िलहाल उपरवाला आपके नीति निर्माताओ को सद्बुद्धि दे।
हद हो गई !!!!!!!!!!!
अब इनको कौन समझाए! यहाँ स्कूल की फ़ीस देना मुस्किल है मैडम। अगर आप मुक्त शिक्षा , मुक्त अध्ययन सामग्री दे तो शिक्षा का स्तर बढ़ जायेगा। स्कूलों में शिक्षको की कमी है उनकी पूर्ति करिये। जो शिक्षक स्कूल नहीं जा रहे है उनको स्कूल भेजिए। जिन गाँवो में स्कूल नहीं है उन गाँवो में नया स्कूल का निर्माण करवाइये। शिक्षा का स्तर स्वतः बढ़ जायेगा। ये राजनितिक नौटंकिया करने से आप समाचार की सुर्ख़ियो में भले ही रहे, शिक्षा का विकास नहीं हो सकता। फ़िलहाल उपरवाला आपके नीति निर्माताओ को सद्बुद्धि दे।
Subscribe to:
Posts (Atom)


