Friday, 8 April 2022

सीयूईटी: अवसर और चुनौतियाँ

सीयूईटी: अवसर और चुनौतियाँ

सीयूईटी का पुरे देश में विरोध हो रहा है और इसे बंद करके पहले जैसी प्रणाली को लागु करने की मांग की जा  रही है। सही है। विरोध होना भी चाहिए क्योंकि पुरे देश से आने वाले ग्रामीण तबके के छात्रों पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा खास तौर से जो राज्य बोर्ड से पढ़ने वाले छात्र है। मेरे ख्याल से इसका विरोध सिर्फ  संशोधन के लिए होना चाहिए, सीयूईटी को बंद करके पहले जैसी प्रणाली के लिए नहीं क्योंकि अलग-अलग विश्वविद्यालयों का फॉर्म भरना, फीस जमा करना, परीक्षा देना इत्यादि चीजे सीमित अवसर कर देती है। अगर एक फॉर्म और परीक्षा से देश के किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय में दाखिला पाने के अवसर हो तो यह अच्छा है और इसे होना चाहिए। इसकी मांग बहुत पहले से अकादमिक जगत में चल रही थी। यूपीए के कार्यकाल में सीयूसीईटी सभी नए केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए बनी थी। फिर बाद में कुछ राज्य विश्वविद्यालय भी जुड़े। अगर उस प्लान को पुरे देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों से जोड़ दिया जाय तो यह सराहनीय कदम है।

 वास्तव में सीयूईटी ठीक उसी तरह का एक यूनिक मॉडल होगा जैसे आईआईटी, आईआईऍम, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी और अन्य इलीट इंस्टिटूशन्स में था। सीयूईटी को सिर्फ सभी सेंट्रल यूनिवर्सिटी के लिए लागु किया जाना चाहिए राज्य विश्वविद्यालय, डीम्ड विश्वविद्यायल और अन्य नहीं। लेकिन हां, सभी अलग-अलग राज्यों के राज्य विश्वविद्यालयों के लिए एक फार्म और एक परीक्षा होनी चाहिए जिससे उस राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में दाखिला मिल सके। विश्वविद्यालयों में दाखिला पाने के लिए सिर्फ तीन प्रणाली हो सकती है। पहला इंट्रेंस एग्जाम दूसरा मिनिमम एलिजिबिलिटी के मेरिट के आधार पर और तीसरा प्रथम आगमन प्रथम स्वागतम के आधार पर। इसमें सबसे सशक्त और अच्छा इंट्रेंस प्रणाली है सरकार अक्सर अमीर आश्रित नीतियां बनती है। ये नीति भी उन्ही में में से एक है।

इस देश के बड़े हिस्से में एनसीईआरटी की किताबें नहीं पढ़ाई जाती है। इस लिए वे छात्र प्रभावित होंगे जो राज्य बोर्ड से पढ़ते है और इससे सीबीएसई बोर्ड के छात्रों को लाभ होगा जिसमें अधिकतम अच्छी आर्थिक स्थिति के बच्चे पढ़ते हैं। हालाँकि एनसीईआरटी की किताबें मेरे अनुभव में सभी बोर्ड की किताबों से अच्छी है। इसलिए गणित, विज्ञान, अर्थशास्त्र ...... इत्यादि को (साहित्य को छोड़ कर) सभी विद्यालयों में अनिवार्य कर देना चाहिए। साहित्य का पाठ्यक्रम जैसे हिंदी, इंगलिश, गुजराती, मराठी ..... इत्यादि सम्बंधित राज्यों को निर्धारित करना चाहिए।

Wednesday, 1 December 2021

बाबू बागेश्वर यादव: एक बहुआयामी व्यक्तित्व

मेरे गांव के पड़ोसी गांव मसीविरमउवा (होशामपुर), आजमगढ़ में 1 दिसंबर 1912 को जन्में आदरणीय श्री बागेश्वर यादव जी उन गिने चुने वकीलों में थे जो समाज के नीचले तबके और गरीबों को उनका हक़ दिलाने के लिए लड़ते थे। वे सर्वग्राही नीति और निश्छल नीयत के धनी, मर्यादित वकील, समाज सुधारक, भविष्योन्मुखी, बेजुबानों के आवाज.... थे। मेरे बाबा जी मुझे बचपन में बाबू बागेश्वर जी के बारे में बताये थे कि वे जिस व्यक्ति का मुक़दमा लड़ते थे अगर वह गरीब है तो उस व्यक्ति से फीस नहीं लेते थे। वह व्यक्ति किसी सुदूर गांव से जिला पर (आजमगढ़ ) तारिक देखने गया है और अगर उसके पास पैसे नहीं है तो बाबू बागेश्वर जी उसे अपनी जेब से किराया देते थे। मेरे बाबा जी यह भी बताये थे कि बाबू बागेश्वर जी सामाजिक और धार्मिक कुरूतियों के खिलाप भी लड़ते थे। ज्ञात हो कि बाबू बागेश्वर जी जो उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व राज्यपाल रहे बाबू रामनरेश यादव जी व पूर्व केंद्रीय मंत्री बाबू चंद्रजीत यादव जी जैसे असाधारण नेताओं के राजनीतिक गुरु रहे थे।


यूं तो अपना  आज़मगढ़ अपने अतीत में समाजवादी और मार्क्सवादी विचारधारा का गढ़ रहा है और आज भी है लेकिन जनपद मुख्यालय से सुदूर किसी ग्रामीण अंचल से जहाँ एक सदी पहले विद्यालयी इल्म पाना भी बहुत बड़ी बात थी, ऐसे दौर और परिवेश में उन्होंने वकालत किया। बाबू बागेश्वर जी जैसा आदर्श व्यक्तित्व और वंचितों का रहबर पैदा होना जो एक स्वनिर्मित मिशाल है, का तख़य्युल करना भी मुश्किल है लेकिन यह सच है।

एक ऐसा दौर जब समाज अंग्रजी हुकूमत के बर्बरता से ज़्यादा पोंगापंथ के बर्बरता से परेशान था जिसके कारण समाज का एक बड़ा तबका शोषित रहा, उस दौर में समाज के शोषितों के इस्मत को समझना और बदलाव की शरार उछालना एक बड़ी बात थी। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में उठी वो बदलाव की शरार जिससे अवाम जुड़ा और आगे चलकर जो परिवर्तन की मशाल बनीं। यह मशाल जुल्मत में मजलूमों के लिए जिया फ़रोश बनी जो आगे चलकर सामाजिक यकजिहदी का बेजोड़ मिशाल बनी। इसलिए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि बाबू बागेश्वर जी जैसा व्यक्तित्व देश में कदाचित मिलते है जो अवाम में समाज बदलाव की ललक जगाये। 

आजमगढ़ को वैचारिकगढ़ के रूप में परिपक़्व बनाने में अनेकानेक ऋषि-मुनियों, चिंतकों, विद्वानों, साहित्यकारों, कवियों, लेखकों, क्रांतिकारियों, स्वतंत्रता सेनानियों ..... इत्यादि लोगों का अमूल्य योगदान रहा है जिसमें बाबू बागेश्वर को एक इकाई के रूप में देखा जा सकता है। हमें नाज है बाबू बागेश्वर जी के कर्तव्यों पर जो बचपन में ही हम लोगों के लिए प्रेरणा श्रोत बने। मुझे गर्व इस बात पर भी है कि जिस स्कूल से मेरी शिक्षा शुरू हुई उस स्कूल का नाम बाबू बागेश्वर जी के नाम पर था।

भारतीय राजनीति का एक ऐसा दौर जब लोकतंत्र को शासन के सह पर कमजोर किया जा रहा हो, जब व्यवस्था नाज़ियत के दौर से गुजर रही हो तो हमें बाबू बागेश्वर जी को एक आदर्श पथ प्रदर्शक के रूप में याद करने की जरुरत है। भारतीय न्याय का एक ऐसा दौर जब वकालत सिर्फ एक धंधे तक सीमित हो तो हमें बाबू बागेश्वर जी को एक आदर्श वकील के रूप में याद करने की जरुरत है। भारतीय समाज का एक ऐसा दौर जब वैज्ञानिक सोच से ज्यादा ऐसे सोच और गतिविधियों पर बल दिया जाय जिससे धर्म निरपेक्ष के प्रतिमान क्षरित हो रहे हो तो हमें बाबू बागेश्वर जी को एक आदर्श समाज सुधारक के रूप में याद करने की जरुरत है।

श्री बागेश्वर जी के जयंती पर हम श्रद्धांजलि-श्रद्धा-सुमन अर्पित करते है। 

 साभार:

राघवेंद्र- आजमगढ़ 

01/12/2021

 

Wednesday, 9 June 2021

बिरसा मुंडा: एक मसीहा

 आदिवासी जननायक,  महापुरुष, और समाज सुधारक बिरसा मुंडा ने 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में उलगुलान आन्दोलन  को अंजाम दिया। कहते है इतिहास भगवान से भी बड़ा होता है क्योकि भगवान सिर्फ भविष्य बनाता और बिगाड़ता है भूतकाल को नहीं छेड़ सकता लेकिन इतिहास भूतकाल को भी बनाता और बिगाड़ता है. इतिहास की मार खाने वालो में एक प्रमुख नाम श्री बिरसा मुंडा जी का भी है. बिरसा जी को इतिहास ने चाहे जितना रौंदा हो लेकिन वे आज भी लाखो लोगो के लिए वैचारिक ऊर्जा के केंद्र है जिन्हे दलित समाज भगवान की तरह पूजता है.

बिरसा मुण्डा  ने मुण्डा विद्रोह पारम्परिक भू-व्यवस्था के जमींदारी व्यवस्था में बदलने के कारण किया. बिरसा मुण्डा ने अपनी सुधारवादी प्रक्रिया के तहत  सामाजिक जीवन में एक आदर्श प्रस्तुत किया.   9 जून बिरसा मुंडा जी के पुण्य तिथि  पर हम श्रदांजलि-श्रद्धा-सुमन अर्पित करते है।






Wednesday, 4 November 2020

संजय साहनी: बदलाव की नई कहानी

 

संजय साहनी: बदलाव की नई कहानी

राघवेंद्र यादव *

चंद्रमणि **

 

परिचय और संघर्ष:

संजय कुमार (सहनी) पिछले 8 सालों से नागरिक समस्याओं के समाधान, किसानों, मजदूरों और मजलूमों की आवाज बनते रहें हैं। बात चाहे मनरेगा के तहत लोगों (महिला और पुरुष) को रोजगार दिलवाने में मदद की हो या लाकडाउन के समय पूरे भारत में फंसे हुए बिहार के प्रवासी कामगारों को सहयोग करने की या फिर खाद्यान्न के जमाखोरों के खिलाफ लड़ाई लड़कर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत परिवारों को निर्धारित राशन सुनिश्चित कराने की; इन सब में संजय सहनी अग्रणीय रहें हैं। वे महिलाओं, श्रमिकों व अल्पसंख्यकों को संगठित कर पितृसत्ता, उच्च-जाति के भेद-भाव और शासन एवं प्रशासन की कुव्यवस्था के खिलाफ जमीनी स्तर पर लड़ रहें हैं। भारतीय नागरिकों को संविधान के भाग-चार, राज्य के नीति निदेशक तत्व तथा अन्य में यह व्यवस्था की गई है कि राज्य लोगों के लिए भोजन, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बुढ़ापा, निःशक्तता तथा अन्य अनर्ह की दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त करने का प्रभावी उपबंध करेगा। किंतु ये अधिकार महज कागजी सिद्ध  होते है। इन अधिकारों को पाने के लिए लोग लम्बे समय से संघर्षरत है लेकिन दुर्भाग्य यह कि राजनैतिक महत्वाकांक्षा में पार्टियों को सिर्फ़ सत्ता ही दिखती हैं, उन्हें जन-कल्याण के लिए उनके बुनियादी जरूरतें नहीं।

 भारतीय राजनीति के अतीत में, राजनीति के बड़े हिस्से पर सामंतियों का अबैध कब्ज़ा रहा है। वे सत्ता हासिल करने के लिए कट्टा और गट्टा का इस्तेमाल करते रहे है। भारतीय राजनीति को कट्टा और गट्टा की लड़ाई भी कही जाती है। आज भी इसपर (राजनीति) अप्रत्यक्ष रूप से धनपशुओं और बाहुबलियों का कब्ज़ा है। वास्तव में ऐसी स्थितियां हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या यही लोकतंत्र है जिसकी बात भारत के संविधान के प्रस्तावना में की गई है? भारतीय राजनीति के इस बाजारवाद में  एक मनरेगा मजदूर का विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में आना किसी वर्तमान चमत्कार से कम नहीं है। वो भी उस दौर में जब गिरते राजनीतिक स्तर की वजह से “भले लोग” राजनीति में आने से कतरा रहें हो। ऐसा नहीं है कि इसके पहले भारतीय राजनीति के इतिहास में कोई व्यक्ति अंतिम पायदान से राजनीति में नहीं आया है लेकिन इनकी संख्या अत्यल्प रही है। इक्कीशवी शदी का दूसरा दशक बाहुबल का चरमोत्कर्ष होगा। इसके बाद भारतीय राजनीति में बाहुबल का ह्रास होगा। यह बदलाव की मांग है कि अब कट्टा और गट्टा से लड़ाई नहीं बल्कि लड़ाई कलम और जमीनी संघर्ष से होगी। अगर संजय सहनी विधायक चुनकर आते है तो वे संविधान प्रदत्त अधिकारों को जारूकता के माध्यम से लोक-अनुक्षेत्र में लाएंगे। इसका लाभ पंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे इसके लिए संघर्ष करेंगे।

शिक्षा:

वह बिहार जो अपने अतीत में शिक्षा एवं समृद्धि के मामलों में विश्व विख्यात था। जब पूरे विश्व में अशिक्षितों की संख्या वृहद थी तब यहाँ (बिहार में) नालन्दा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय ज्ञान की अलख जगा रहे थे। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि वर्तमान में बिहार में स्कूली शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालयी शिक्षा तक की हालत बेहद खस्ता हो गई है जिसके कारण गुणवत्तापरक शिक्षा पाने के लिए यहाँ से प्रतिभावों को पलायन करना पड़ता है। बिहार में कुछ एक विश्वविद्यालयों को छोड़कर ज्यादातर विश्वविद्यालय के सत्र लेट है। ऐसे में कई युवाओं को रोजगार पाने  में परेशानियाँ होती है। अगर यह कहा जाय कि यह विलम्ब व्यवस्थात्मक रूप से प्रायोजित है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इन मुद्दों को आज राजनीतिक पार्टियां अपना चुनावी एजेंडा नहीं बनाती जबकि ये मुख्य एजेंडे में होना चाहिए। वे (सभी राजनितिक पार्टियाँ) जाति-पाति की राजनीति में लोगों को बांध कर अपनी रोटियां सेंकती है। अगर जमीनी हकीकत की बात करें तो प्राथमिक/सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को गुणवत्तापरक शिक्षा नहीं मिल पा रही है। इसके कई वजहें है। एक तो अध्यापकों की कमी है दूसरे जो है उनमें अच्छी ट्रेनिंग का अभाव है। इसके आलावा कुछ शिक्षक-शिक्षिकाएं निर्धारित समय पर स्कूल नहीं आते अगर आते भी है तो उनमे कुछ समय पर कक्षाओं में नहीं जाते। स्कूलों में संसाधनों का अभाव भी शैक्षणिक पिछड़ेपन का एक बड़ा वजह है। बिहार के कुछ जिलों और केन्द्रों पर यह भी पाया गया है कि कागज़ पर नामांकन कुछ और है किन्तु वास्तविकता कुछ और है। शासन और प्रशासन इसका या तो निगरानी और निरीक्षण नहीं करते या ‘ले-दे’ कर मुद्दे को शांत कर देतें है। उच्च शिक्षा में यहाँ सरकारी स्तर पर रोजगारपरक शिक्षा देने वाले टेक्निकल कॉलेजों की कमी के कारण कई गरीब छात्र जिनके पास टैलेंट है किंतु पैसे नहीं वे दाखिला से वंचित रह जाते हैं। इन सभी मुद्दों के लिए संजय सहनी संघर्ष करेंगे।

स्वास्थ्य:

मुजफ्फरपुर क्षेत्र चमकी बुखार (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम) से प्रभावित क्षेत्र है। यह बच्चों में पाई जाने वाली बीमारी हैं जो इसके आस-पास के जिलों में संभवतः अप्रैल-जून के बीच बड़े पैमाने पर होता आ रहा हैं किंतु स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही, सुविधा एवं जागरूकता की कमी से अनेकानेक बच्चे साल दर साल बेमौत मर जाते है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों की कमी, अस्पताल में डाक्टर व अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की घोर कमी, आधुनिक जाँच मशीनों और दवाइयों की कम उपलब्धता इत्यादि कई महत्वपूर्ण कारण है जिससे इस तरह की अनैच्छिक घटनाएं होती है। परिणाम स्वरूप नवदीप के चिराग बिना जले ही बुझ जाते है। संजय सहनी अपने घोषणा पत्र में यह दावा किये है कि अगर वे विधायक चुनकर आते है तो मनियारी में बंद पड़े महंत दर्शन दास अस्पताल को पुनः चालू करवाएंगे तथा इसके साथ ही साथ कुढ़नी विधानसभा के अंतर्गत आने वाले बंद पड़े सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को तत्काल प्रभाव से पुनः चालू करवाएंगे। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों का सही संचालन और उनमें आधुनिक सुविधा और पर्याप्त दवाइयां उपलब्ध करवाएंगे।

रोजगार:

सरकार की सबसे बड़ी नाकामी हैं बिहार में राज्याश्रित विभागों और संस्थाओं में सीटे खाली हैं किंतु सरकार उन रिक्तियों पर आज तक बहाली नहीं करवा पायी है। अगर वे विधायक बनकर आएंगे तो शिक्षकों एवं अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति, ट्रेनिंग और जबाबदेही सुनिश्चित करवाएंगे। वे सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग को बढ़ावा देंगे जिससे घरेलू उद्योगों को मजबूती मिलेगी। संजय सहनी खुद एक मनरेगा मजदूर है वे सालों से इसके सही इम्प्लीमेंटेशन के लिए काम कर रहे हैं। वे इसकी  मजदूरी बढ़वाने के लिए विधानसभा में आवाज उठाएंगे। संजय सहनी अपने भाषणों और घोषणापत्र में यह दावा किये है कि सभी सरकारी अनुबंध कर्मचारियों, आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी सेविका, सहायिका, रोजगार सेवक सहित अन्य कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि की मांग करेंगे तथा साथ ही इनके मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष करेंगे। वे संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में रोजगार सृजित करेंगे। महिलाओं को सुरक्षा और सशक्तिकरण उनके संघर्षों के मूल में होगा। उनके घोषणा पत्र में यह भी दावा किया गया है कि सभी योग्य व्यक्तियों के लिए वृद्ध, विधवा और विकलांग पेंशन स्वीकृति करवाना तथा इसकी राशि बढ़वाना। सभी को राशन कार्ड निर्गत करवाना तथा उस पर सरकार द्वारा निर्धारित पूरा राशन उपलब्ध करवाना। यह अच्छी खबर है कि वैश्विक ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री प्रोफेसर ज्यां द्रेज जिन्होंने नरेगा योजना निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वे संजय सहनी के पक्ष में कैम्पेन कर रहें हैं।

 

उद्योग और आधारभूत संरचना:

मुजफ्फरपुर जनपद उत्तर बिहार की कथित राजधानी हैं यहाँ कई बड़े प्रोजेक्ट्स जैसे - हवाईअड्डा, रेलवे कारखाना भारत वैगन, दवा की फैक्ट्री आईडीबीएल, मोतीपुर चीनी मिल जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय स्तर की इकाई बन्द हो गई जो लोगों के रोजगार एवं क्षेत्र के संरचनात्मक विकास और समृद्धि की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण थीं। दूरदर्शन केंद्र भी यहां बदहाली में अपनी आखिरी साँसे ले रहा हैं किंतु सोये जनप्रतिनिधियों का इससे कोई सरोकार नहीं हैं। वर्तमान नगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक नगर विकास मंत्री हैं। मुजफ्फरपुर स्मार्ट सिटी घोषित होने के बाद भी यह लगातार अपने निम्न स्तर पर रहा जिसके लिए जनप्रतिनिधियों की उदासीन और ढुलमुल रवैया भी जिम्मेदार है। यदि महात्मा गाँधी सेतु के समानांतर रेलवे पुल बनाया जाय तो बिहार की समृद्धि को यह चार चांद लगायेगा। ज्ञात हो कि उत्तर बिहार को दक्षिण बिहार से जोड़ने में महात्मा गाँधी सेतु का महत्वपूर्ण योगदान हैं। अगर यह रेलवे कनेक्ट हो गया तो जनता और उद्यमियों का पैसा और समय दोनों बचेगा। इसके अलावा मुजफ्फरपुर लीची, लहठी और सूती कपड़ो के लिये विश्वविख्यात हैं किंतु जनप्रतिनिधियों का इसपर भी कोई ध्यान नहीं हैं जिसमें उद्योग की अपार संभावनाएं हैं लेकिन दुर्भाग्य कि न तो इसपर सरकारें (केंद्र और राज्य) ध्यान दे रही है और न ही उद्योगपति। यहाँ कंपिनयों को उचित साधन-संसाधन एवं उधमी को पर्याप्त सुरक्षा न मिलना भी मुख्य कारणों में रहा है। यहाँ की टूटी एवं सिमटी सड़कें तथा  जलजमाव से भरे नाले मुँह चिढ़ाते है। अगर संजय सहनी विधायक चुन कर आते है तो इन सभी मुद्दों पर प्रमुखता से ध्यान देंगे व इन सभी के लिए जमीनी संघर्ष करेंगे। कोसी नदी जिसे बिहार का शोक भी कहा जाता है, से बिहार बाढ़ प्रभावित रहता है। इससे बचाव के लिए मजबूत कदम उठाएंगे।



जनता से अपील:

वह बिहार जो कभी पूरे भारत का शासन मगध साम्राज्य के द्वारा पाटलिपुत्र (पटना) पर केंद्रित था। विश्व का प्रथम गणतंत्र घोषित करने वाला गणराज्य लिच्छवी गणराज्य ( वैशाली ) बिहार में ही अवस्थित हैं। आज बिहार जिन ऊंचाइयों को पाने के लिए लड़ रहा है वह इतिहास में बहुत पहले ही पा लिया था किंतु राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक लचर नीतियों और कुरीतियों की वजह से इससे वंचित है। इसलिए जनता को यह चाहिए कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर, जाति-धर्म को छोड़कर, धन-बल और बाहु-बल को धक्का देकर, दल्लों-दलालों और चमचों को धिक्कारकर, धन-पशुओं को खदेड़कर, राजनीतिक घरानों के लाड़लों/लाड़लियों को नकारकर समाज के निचले पायदान से आने वाले ऐसे व्यक्ति को चुनें जो इस देश के हासिये के किसानों, मजदूरों, मजलूमों और वंचितों की आवाज बन सके। उनके दुःख-दर्द को महसूस करे तथा उसके लिए संघर्ष करे। हमें शासक नहीं, प्रतिनिधि चाहिए। हमें एक ऐसा समाज चाहिए जिसमें कतार में खडा आख़िरी व्यक्ति भी मर्यादा और सम्मान के साथ जीवन यापन कर सके।

 

 

*प्रथम लेखक: अर्थशास्त्र एवं आयोजन अध्ययन केंद्र, केंद्रीय विश्वविद्यालय गुजरात में शोधरत है। raghavendra.pahal50@gmail.com पर संपर्क कर सकते है।

**द्वितीय लेखक: युवा समाजसेवी & नारायण नर्सिंग कॉलेज सासाराम बिहार में इंटर्न्स है।

Saturday, 10 August 2019

"आजमगढ़ विश्वविद्यालय, आजमगढ़"


"रूह-ए-आजमगढ़ में तामीर-ए-विश्वविद्यालय उतना ही प्रासंगिक है जितना किसी बेघर को घर देना।"
(राघवेन्द्र)


यह सर्वविदित है कि गुणवत्तापरक उच्च शिक्षा की जरुरत ने आजमगढ़ में विश्वविद्यालय की मांग के लिए प्रेरित किया। यहाँ के बुद्धजीवियों द्वारा यह भी कयास लगाया जा रहा है कि आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनने से यहाँ का बहुमुखी विकास होगा। उत्तर प्रदेश के विधान सभा में माननीय मुख्यमंत्री जी द्वाराआजमगढ़ में विश्वविद्यालय की घोषणा किये जाने के बाद से ही इसके स्थापना के लिए भूमि पर चर्चायें शुरू हो गई थीं। माननीय मुख्यमंत्री जी द्वारा आजमगढ़ दौरे के बाद इस पर प्रशासनिक कार्य भी तेजी से हुआ। उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन कर "आजमगढ़ विश्वविद्यालय, आजमगढ़" बनाये जाने के बाद ये अतिआवश्यक हो चूका है। इस बीच समाचार के सुर्खियों से कुछ खबरें मिलती रही कि यहाँ जमीन मिली वहाँ जमीन मिली। यह भी खबर थीं कि विश्वविद्यालय के लिए 50 एकड़ जमीं पर्याप्त है। इस सन्दर्भ में ‘विश्वविद्यालय अभियान टीम’ के साथियों ने भी काफी खोज-बिन कर प्रशासन को सुझाव दिए। मैं उत्तर प्रदेश सरकार से यह अपील कर रहा हूँ कि "आजमगढ़ विश्वविद्यालय, आजमगढ़" सिर्फ सर्टीफिकेट बाटने वाली संस्था न होकर यह पूर्ण-आवासीय और विश्व स्तरीय सुविधायुक्त विश्वविद्यालय हो।

आजमगढ़ की अवाम का आवाज बनकर मैं उत्तर प्रदेश सरकार से यह निवेदन कर रहा हूँ कि आजमगढ़ की आभा और प्रतिभा को ध्यान में रखते हुए "आजमगढ़ विश्वविद्यालय, आजमगढ़" में उच्च शिक्षा से सम्बंधित प्राचीन पाठ्यक्रमों से लेकर नवीन पाठ्यक्रमों के लिए केंद्र/विभाग बनें। जहाँ से राज्य को और इस देश को बेहतर मानव संसाधन मिल सकें। यहाँ से अच्छे प्रशासक निकले, अच्छे वैज्ञानिक निकले, अच्छे समाज वैज्ञानिक निकले, अच्छे शिक्षाविद निकले, अच्छे इंजीनियर निकले, अच्छे प्रबंधक निकले, अच्छे  डाक्टर निकले, अच्छे नेता निकले, अच्छे अभिनेता निकले, अच्छे खिलाड़ी  ....... आदि निकले। एक ऐसा विश्वविद्यालय जो भारत को विश्व गुरु बनाने में नेतृत्व कर सके। इस तरह के विश्वविद्यालय के लिये 50 एकड़ जमीन बेहद संकुचित स्थान होगा। ज्ञात हो कि देश के और दुनिया के नामचीन विश्वविद्यालयों को ज्यादा जमीन आवंटित है। "आजमगढ़ विश्वविद्यालय, आजमगढ़" के लिए कम से कम 250 एकड़ से 300 एकड़ के बीच होना चाहिए। आजमगढ़ ग्रामीण बाहुल्य इलाका है। मेरा निजी मानना है कि इस विश्वविद्यालय को शहर के भीड़-भाड़ से अलग खुले में एक ऐसे जगह पर होना चाहिए जहाँ पर यातायात की सुविधा उपलब्ध हो। मैं उत्तर प्रदेश सरकार से यह उम्मीद करता हूँ कि राजनीतिक आपा-धापी से ऊपर उठकर आजमगढ़ में विश्वविद्यालय की स्थापना की जायेगी।

मैं उत्तर प्रदेश सरकार से यह मांग करता हूँ कि सरकार "आजमगढ़ विश्वविद्यालय, आजमगढ़" के लिए एक कमेटी का गठन करे जो निष्पक्ष रूप से इसके लिए एक मॉडल विकसीत करे। जिसमें इसके स्थापना के लिए सबसे उपयुक्त जगह चिन्हित हो  और वहाँ की उपलब्धता और जरूरतों को ध्यान में रख कर कोर्स का सुझाव दे।
सधन्यवाद

राघवेन्द्र यादव 
आजमगढ़

Friday, 10 May 2019

किसी पार्टी को वोट न देकर किसी प्रत्यासी को देखिये

साहित्यकार काशीनाथ सिंह जी ने पिछले आम चुनाव में कहा था कि अगर "मोदी जीते तो काशी हार जाएगी" उनका यह वक्तव्य आजमगढ़ सदर सीट के लिए भी उतना ही प्रासंगिक था जितना बनारस के लिए। जिसे हम जैसे अनेकानेक लोगों ने माना था कि अगर आजमगढ़ से श्री मुलायम सिंह यादव जी जीत गए तो आजमगढ़ हार जायेगा। और हुआ भी यही।
हमारे संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ सदर से श्री मुलायम जी चुनाव जितने के बाद या तो जन्मोत्सव मनाने गए या फीता काटने। क्या हमारे माननीय सांसद श्री मुलायम जी ये बताएंगे कि वे आजमगढ़ की कितनी समस्यायों को अपने इस कार्यकाल में सदन में उठायें है? क्या आप ये बताएंगे कि आपको आजमगढ़ की जनता बतौर सांसद क्यों नकार रही है?
श्री अखिलेश जी जो अस्मित्ता की राजनीति कर रहे है। जिनका राजनीति उनके राजनीतिक अनुभव से कही ज्यादा उनके पारिवारिक पहचान पर टिका है। क्या वे भी पांच साल बाद वर्तमान सांसद जी के पद चिन्हों पर चल कर अगले चुनाव में किसी और सीट से चुनाव लड़ कर आजमगढ़ सदर की सीट अपने परिवार के किसी और व्यक्ति को खड़ा कर देंगे?
आज़मगढ़ की अवाम से अपील है कि वे वोट के पहले खूब सोच समझ लें कि जो बदलाव पांच साल बाद हुआ है फिर पांच साल बाद वही न करना पड़े। और हां इसका मतलब ये भी नहीं है कि इनके विकल्प में इन्ही जैसे किसी और प्रवसनकारी को जगह दे दें। जो चुनाव जीतने के बाद आपके बीच न मिले। इसलिए आप लोग दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर किसी पार्टी को वोट न देकर किसी प्रत्यासी को देखिये। और आपके नजर में जो प्रत्यासी सबसे उपयुक्त हो उसे वोट करें।
और हां!!
संभव हो तो वोट जरूर करें। आपके नजर में कोई प्रत्यासी सही नहीं है तो भी वोट करें, नोटा ही सही।
(नोट: प्रवसन से हमारा तात्पर्य यह नहीं है कि कोई बाहर से आकर चुनाव नहीं लड़े। भारत का कोई भी व्यक्ति किसी भी सीट से चुनाव लड़े लेकिन कम से कम वह निर्वाचन क्षेत्र जहाँ से वह चुनाव लड़ रहा हो वह उसका कार्य क्षेत्र हो। कल को चुनाव जितने के बाद वह वहां की जनता को आसानी से मिल सके।)
राघवेंद्र:
आजमगढ़ सदर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र का एक वोटर

आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाये जाने का विरोध क्यों ?

अटैच्ड स्क्रीनशॉट पिछली सरकार में श्री ध्रुव कुमार त्रिपाठी जी द्वारा #आजमगढ़_में_विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में विधान परिषद् उत्तर प्रदेश में माननीय मुख़्यमंत्री जी से पूछा गया सवाल है। सरकार के मंत्रीजी जवाब दिए कि आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाया जाना प्रासंगिक नहीं है। इसका मतलब है कि वे आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाये जाने का विरोध कर रहे थे। अगर कलम से लिखा गया उत्तर तत्कालीन मुख्यमंत्री मिस्टर Akhilesh Yadav जी का है तो यह निंदनीय है। इस जबाब से आजमगढ़ में विश्वविद्यालय का चाहत रखने वाला हर व्यक्ति आहात हुआ था।
वही सरकार प्राइवेट विश्वविद्यालय के लिए अधिनियम लायी थी और उन्होंने कहा था, ".... सैद्धान्तिक रूप से हम लोग किसी भी नए विश्वविद्यालय की स्थापना का कभी भी विरोध नहीं करते है।" अगर नए विश्वविद्यालय बनाने के सन्दर्भ में वाकयी आपके विचार ऐसे है तो यह सराहनीय विचार है और हम ऐसे विचार का स्वागत करते है। मैं यह जानना चाहता हूँ कि प्राइवेट विश्वविद्यालय के लिए ही ऐसे विचार क्यों है ? राज्याश्रित विश्वविद्यालय के लिए ऐसे विचार क्यों नहीं है? मैं जानना चाहता हूँ कि अगर एक प्राइवेट कालेज को विश्वविद्यालय बनाने के लिए इतना मधुर और बौद्धिक विचार दिए गए तो आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाने के लिए इतना निष्क्रिय और उलजुलूल उत्तर क्यों दिया गया? #हम चाहते है कि इसके लिए मिस्टर अखिलेश जी को आजमगढ़ के अवाम से #माफ़ी मांग लेना चाहिए।

Friday, 11 January 2019

124th Amendment Constitution Bill 2019

Central Government ought to have completed its homework on 124th Amendment Constitution Bill 2019. Such type of suggestions have been given by several parliamentarians during the discussion on the same subject in both houses Upper and Lower. Was it really missed by Central Government? Was it really Chunavi Stunt as a segment of people, specialist, media .... and others said? Was the Government (BJP) feared by the results of recently passed election? Was the Government hurried? So, it became subject of discussion without legislative scrutiny. The Government didn't think to send it to Standing Committee of Parliament for their consideration. I think, it is not true. It is neither the subject of hurried nor Chunavi Stunt. It is a subject of Brahmanical sly trick because casteist domain of the Government and ''Others" know, if it will become subject of examination or will be tied on criterion of the legality then this Bill will be rejected on that place and will not be part of Parliamentary discussion because 'reservation' is not the subject of "Income" it is the subject of "Representation" and "Exploitation from the years". The 'Brahmanical set-up' know this hard truth. That's why Government bring it in the last session of last year of the governing period. Some parliamentarians said that Government did not do anything since last fifty seven months. I think, Government was waiting for the last year, last session from long time. Clever brilliant Congresi (pseudo Brahmanic) are the real hero of this draconian Bill.
So, I congratulate to Congres Pary, not to the BJP because personally, I believe that intellectual of BJP can't do such type of act without help of Clever brilliant Congresi (pseudo Brahmanic).
Generally, I am not against any policy, who made for poor. I believe that this Bill is not the treatment of the economic problem in right manner.
YE JANATA HAI SAHAB, SAB SAMAJHTI HAI...

Friday, 25 May 2018

सामाजिक न्याय के योद्धा चंद्रजीत यादव: एक असाधारण व्यक्तित्व

सामाजिक न्याय के योद्धा भूतपूर्व सांसद, भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री और किसानों, मजदूरों, मजलूमों की आवाज आदरणीय श्री चंद्रजीत यादव जी की पुर्णतिथि पर हम श्रद्धांजलि-श्रद्धा-सुमन अर्पित करते है। यह सर्वविदित है कि आजमगढ़ अपने अतीत में समाजवादी और मार्क्सवादी विचारधारा का गढ़ रहा है और आज भी है। इस वैचारिक गढ़ को परिपक़्व बनाने में श्री चंद्रजीत जी का अमूल्य योगदान रहा है।

डॉ राम समुझ जी (IRS) ने अपनी पुस्तक "Reservation Policy: Its relevance in modern India" में चंद्रजीत जी की पुस्तक "आरक्षण क्यों" (why reservation?) का सन्दर्भ देते हुए लिखें है कि
Chandrajeet Yadav, a former Union Minister pointed out the reasons for better administration in the states of Tamilnadu, Karnataka and Kerala than that of UP, Bihar and M.P. saying that they implementaed the reservation policy in the beginning of 19th century much earlier than Hindi states and quantum of their reservation are about 68%.*

*Yadav, Chandrajeet – Arkshan kyo (why reservation?), Samajik Nyay Kendra, New Delhi, Pp. 10-11

यह पुस्तक अभी लोक-अनुक्षेत्र में नहीं है। मुझे नहीं पता कि इसमें क्या लिखा है लेकिन चंद्रजीत जी के द्वारा संसद में उठाये गए सवालों, उनके द्वारा किये गए बहस से थोड़ा-बहुत परिचित हूँ और इसके आलावा उनके द्वारा लड़े गए सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई से भी कुछ परिचित हूँ। इस आधार पर मुझे उम्मीद है कि 'आरक्षण' पर जिन सवालों का जबाब आज हम ढूढ़ रहे है, शायद वे इस पुस्तक में हमें मिले।

सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे जिम्मेदार लोगों से मैं अपील करता हूँ कि इस पुस्तक का पुनर्प्रकाशन करवायें और इसके आलावा इनकी दूसरी लेखनी को भी लोक-अनुक्षेत्र में लाएं। इनके (चंद्रजीत जी के) भाषणों जो लिखित, आडियो या वीडियो रूप में हो उन्हें संकलित करके प्रकाशित करवाया जाय। अगर ऐसा होता है तो हम सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले एक असाधारण व्यक्तित्व को फिर से जीवित कर पायेंगे।

साभार 
हथौटवी पहल