Monday, 1 August 2022

गरीबी रेखा के मापदंड और नीतिगत निहितार्थ

     गरीबी पूरी दुनिया में हमेशा ज्वलंत मुद्दा के रूप में पायी जाती है। गरीबी रेखा के प्रतिमान क्या होने चाहिए? यह पूरी दुनिया में हमेशा चर्चा का विषय रही है। अगर स्थितियां ऐसी ही रही तो यह कभी न समाप्त होने वाली बहस के रूप में देखी जा सकती है।  अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी रेखा के गणित को सुलझाने के लिए अनेक प्रयास किये जा चुके है और अभी जारी भी है। भारत सरकार ने भी आजादी के बाद  तात्कालिक योजना आयोग के सानिध्य में कार्यकारी दल, विशेषज्ञ दल और टास्क फोर्स के माध्यम से गरीबी रेखा को परिभाषित किया और हर प्रयास में गरीबी रेखा की एक खास अवधारणा  विकसित हुई लेकिन सरकार का हर प्रयास महज कागजी कार्यवाही ही सिध्द हुई जो कि धरातलीय सच्चाई का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही थीयोजना आयोग के सानिध्य में अंतिम बार डॉ सी० रंगराजन के अध्यक्षता में विशेषज्ञ दल ने गरीबी रेखा निर्धारण का एक नया फार्मूला दिया।  इस कमेटी ने बताया कि अगर गाँव में रहने वाला व्यक्ति 32.40 रु० और शहर में रहने वाला व्यक्ति 46.90 रु० प्रतिदिन या इससे अधिक कमाता है तो वह गरीब नहीं है अर्थात वह व्यक्ति गरीबी रेखा से ऊपर जीवन-यापन कर रहा है। योजना आयोग द्वारा दिए गए पूर्ववर्ती फार्मूले की तरह यह फार्मूला भी लोगों को रास नहीं आया। इस फार्मूले से गरीबी निर्धारण से ज्यादा राजनीतिक सरगर्मी मापी गई। गरीबी रेखा के इस प्रतिमान को कुछ विशेषज्ञ भूखमरी और कुपोषित रेखा कहे थे तो कुछ लोग इसे कुत्ता-बिल्ली लाइन कह कर इस परिभाषा का उपहास उड़ाये। 2014 के आम चुनाव में गरीबी मापदंड की इस परिभाषा को उसी तरह भुनाया गया था जैसे कालाधन, घोटाला और महंगाई।

            वर्तमान सरकार ने डॉ सी० रंगराजन कमेटी के परिभाषा को अस्वीकार करते हुए एक नए कमेटी का गठन कर गरीबी को नए तरीके से परिभाषित करने की बात की। जिसे नीति आयोग के पहले मीटिंग में गरीबी रेखा निर्धारण के लिए एक टास्क फोर्स बनाने का निर्णय लिया गया। 16 मार्च 2015 को नीति आयोग के वाइस चेयरमैन डॉ अरविन्द पनगरिया के अध्यक्षता में “भारत में गरीबी उन्मूलन” के लिए 14 सदस्यी एक टास्क फोर्स बनी। इस टास्क फोर्स को गरीबी मापदंड की कार्यकारी परिभाषा विकसीत करना था तथा गरीबी उन्मूलन के लिए एक रोडमैप तैयार करना और साथ ही साथ गरीबी उन्मूलन के लिए कारगर नीतियों के सन्दर्भ में सुझाव देना था। इस टास्क फोर्स को जून 2015 तक अपनी रिपोर्ट तैयार करना था। 21 जुलाई 2015 को 30 अगस्त 2015 तक इसका समय विस्तारित किया गया। भारत में गरीबी मापदंड के इस नये परिभाषा का इस समय बुद्धिजीवी से लेकर आम आदमी तक बड़ी शिद्दत से इंतजार कर रहा है लेकिन हैरत की बात है कि निश्चित्त समय बीतने के दो साल बाद भी टास्क फोर्स द्वारा विकसित आधिकारिक परिभाषा जो भारत सरकार के विचार का प्रतिनिधित्व करती हो, आज तक पब्लिक डोमेन में नहीं आयी है और न ही यह पता है कि उस टास्क फोर्स का समय कब तक बढ़ाया गया है।

भारत जैसे विकासशील देश जहाँ  कुपोषण का स्तर भयानक स्थिति में हो। किसान और मजदूर गरीबी और बेबसी की वजह से आये दिन आत्महत्या कर करे हो। देश की एक बड़ी आबादी भोगानुभव में जी रही हो। वहाँ (उस देश में) आधिकारिक तौर पर यह न पता हो कि गरीब कौन है? गरीबी की प्रकृति क्या है? गरीबों की संख्या कितनी है? यह सरकार के अकर्मण्यता को दर्शाता है। भारत को अपने कुपोषण, भुखमरी और गरीबी की वजह से कई बार वैश्विक पटल पर शर्म से झुकना पड़ता है। भारत सरकार और सूबे की सरकारों को यह चाहिए कि वे सर्वप्रथम गरीब और गरीबी के प्रकृति को पहचाने फिर उसके उन्मूलन हेतु नीतियां चलायें। उन नीतियों  का निहितार्थ सिर्फ कागजी न होकर धरातलीय कार्यकारी भी हो।



परिचय

राघवेंद्र यादव

रिसर्च स्कॉलर

सेंटर फॉर स्टडीज एण्ड रिसर्च  इन  इकोनॉमिक्स & प्लानिंग

स्कूल ऑफ सोशल साइंस

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात

गांधीनगर, गुजरात, 382029

Email- raghavendra.pahal50@gmail.com

 

 

गरीबी रेखा निर्धारण: एक नीति विषयक पहल

गरीबी एक निर्विवाद सत्य है लेकिन यह जानना बेहद विवाद का विषय है कि गरीब कौन है? सामान्यतया, गरीबी निर्धारण मानवीय स्थिति का अध्ययन है जिसे आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक…. आदि प्रतिबिम्बों के रूप में देखा जा सकता है। अगर हम गरीबी रेखा निर्धारण के इतिहास को देखे तो पहले पोषक तत्वों के आधार पर गरीबी रेखा का निर्धारण किया जाता था लेकिन आज वैश्वीकरणउदारीकरणऔर निजीकरण ने गरीबों की इतनी प्रजातियां पैदा कर दी हैं कि इसकी प्रकृति को समझना अर्थशास्त्रियों और सामाजिक वैज्ञानिकों के लिए बेहद कठिन और पेचीदा हो गया है। वैसे वैज्ञानिक तौर पर गरीबी निर्धारण के लिए कोई एक निश्चित रेखा नहीं खींची जा सकती है जिसके नीचे जीवन यापन करने वाले व्यक्ति को गरीब और उसके ऊपर जीवन यापन करने वाले व्यक्ति को अमीर कहा जा सके क्योंकि गरीबी एक गुणात्मक चर है। जिसकी मात्रात्मक माप संभव नहीं है। फिर भी सामान्य तौर पर कुछ मूलभूत वस्तुओं का सूचकांक बना कर जीवन यापन करने के लिए एक रेखा खींची जा सकती है जिस पर एक आम आदमी को आत्म सम्मान के साथ स्वास्थ्य जिंदगी जीना मुमकिन हो। गरीबी रेखा का यह मापदंड गरीब और गैर-गरीब को अलग कर सकती है।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी रेखा के गणित को सुलझाने के लिए अनेक प्रयास किये जा चुके है और अभी भी जारी है। भारत में वर्तमान समय में  गरीबी को परिभाषित करने के लिए नीति आयोग के सानिध्य में मार्च 2015 में एक कार्य दल का गठन किया गया है। इस कार्य दल को गरीबी रेखा मापदंड की कार्यकारी परिभाषा विकसीत करना, गरीबी उन्मूलन के लिए एक रोडमैप तैयार करना और साथ ही साथ गरीबी उन्मूलन के लिए कारगर नीतियों के सन्दर्भ में सुझाव देना है। इस कार्य दल को जून 2015 तक अपनी रिपोर्ट तैयार करना था। 21 जुलाई 2015 को 30 अगस्त  2015 तक इसका समय विस्तारित किया गया लेकिन हैरत की बात है कि निश्चित्त समय बीतने के दो साल बाद भी इस कार्य दल द्वारा विकसित आधिकारिक परिभाषा जो भारत सरकार के विचार का प्रतिनिधित्व करती हो, आज तक पब्लिक डोमेन में नहीं आयी और न ही यह पता है कि उस कार्य दल का समय कब तक विस्तारित किया गया है।

भारत जैसे विकासशील देश जहाँ कुपोषण का स्तर भयानक स्थिति में हो। किसान और मजदूर गरीबी और बेबसी की वजह से आये दिन आत्महत्या कर रहे हो। देश की एक बड़ी आबादी भोगानुभव में जी रही हो। वहाँ (उस देश में) आधिकारिक तौर पर यह न पता हो कि गरीब कौन है? गरीबी की प्रकृति क्या है? गरीबों की संख्या कितनी है? यह सरकार के अकर्मण्यता को दर्शाता है। गरीबी अध्ययन महज दो देशों या राज्यों में तुलना का विषय ही नहीं वरन यह नीति विषयक भी है। इसलिये सरकार आधिकारिक तौर पर गरीबी रेखा का प्रतिमान सुनिश्चित करे जिससे गरीबों का सही चेहरा सामने आएगा और सही मायने में गरीबों के प्रसार का पता चलेगा। गरीबी की प्रकृति और गरीबों के प्रसार का सही आकड़ा ज्ञात होने पर गरीबी उन्मूलन के लिए बनाई गई रणनीति ज्यादा सार्थक और कारगर होगी। गरीबी उन्मूलन के लिए बने रणनीतियों का निहितार्थ सिर्फ कागजी न होकर जमीनी स्तर पर क्रियाशील भी होना चाहिए।





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राघवेंद्र यादव

रिसर्च स्कॉलर

सेंटर फॉर स्टडीज एण्ड रिसर्च  इन  इकोनॉमिक्स & प्लानिंग

स्कूल ऑफ सोशल साइंस

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात

गांधीनगर, गुजरात, 382029

Email- raghavendra.pahal50@gmail.com

 

Monday, 16 May 2022

संयुक्त विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा: अवसर और चुनौतियाँ

संयुक्त विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा: अवसर और चुनौतियाँ

 *राघवेंद्र यादव

 

संयुक्त विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (सीयूईटी) पूरवर्ती केंद्रीय विश्वविद्यालय संयुक्त प्रवेश परीक्षा (सीयूसीईटी) का संशोधित रूप है। सीयूसीईटी 2010 में यूपीए के कार्यकाल में शुरू हुआ था। सीयूसीईटी नए केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए बनी थी। बाद में कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालय और राज्य विश्वविद्यालय और जुड़ गए। अगर अब उस प्लान का विस्तार कर पुरे देश के उन 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों से जोड़ दिया गया जो शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार से सम्बद्ध है तो यह सराहनीय कदम है। इसकी मांग बहुत पहले से अकादमिक जगत में चल रही थी लेकिन वे सिर्फ 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए ही क्यों? जबकि यूजीसी के वेबसाइट पर 54 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। वे विश्वविद्यालय जो शिक्षा मंत्रालय से जुड़ें हैं उनमें सीयूईटी लागू है। लेकिन जो केंद्रीय विश्वविद्यालय शिक्षा मंत्रालय से सम्बद्ध न होकर भारत सरकार के अन्य मंत्रालयों से सम्बद्ध हैं; उन विश्वविद्यालयों में भी सीयूईटी लागू होना चाहिए। वास्तव में सीयूईटी ठीक उसी तरह का एक यूनिक मॉडल होगा जैसे आईo आईo टीo, आईo आईo एमo, मेडिकल कॉलेज (एनo ईo ईo टीo), नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (क्लैट) और अन्य इलीट इंस्टिटूशन्स में प्रवेश परीक्षा थी। ‘संयुक्त विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा’ को ‘केंद्रीय विश्वविद्यालय संयुक्त प्रवेश परीक्षा’ बनाकर इसको सिर्फ सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में लागू किया जाना चाहिए तथा राज्य विश्वविद्यालयों, डीम्ड विश्वविद्यायलयों और अन्य में नहीं। लेकिन हां, सभी अलग-अलग राज्यों के राज्य विश्वविद्यालयों के लिए एक फार्म और एक परीक्षा पद्धति होनी चाहिए अर्थात एक राज्य में उस राज्य के सभी विश्वविद्यालयों और उसके संघटक कालेजों के लिए एक संयुक्त प्रवेश परीक्षा होनी चाहिए जिससे उस राज्य के सभी विश्वविद्यालयों और उसके संघटक कालेजों में दाखिला मिल सके।

शिक्षा मंत्रालय (पूरवर्ती मानव संसाधन विकास मंत्रालय) भारत सरकार ने सीयूईटी के माध्यम से प्रवेश परीक्षा करवाने का दायित्व राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) को दिया है। सीयूईटी का पुरे देश में विरोध हो रहा है और इसे बंद करके पहले जैसी प्रणाली को लागू करने की मांग की जा रही है। विरोध होना सही भी है क्योंकि पुरे देश से आने वाले ग्रामीण और सुदूरवर्ती क्षेत्र के छात्रों पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा खास तौर से राज्य स्कूल बोर्डों से पढ़ने वाले छात्रों और छात्राओं पर। मेरे ख्याल से इसका विरोध सिर्फ  संशोधन के लिए होना चाहिए। सीयूईटी को बंद करके पहले जैसी प्रणाली के लिए नहीं क्योंकि अलग-अलग विश्वविद्यालयों का अलग-अलग फॉर्म भरना, फीस जमा करना, परीक्षा देना इत्यादि चीजें छात्रों और छात्राओं के लिए अवसर सीमित कर देती है तथा सरकार के संसाधन ज्यादा खर्च होते है। अगर एक फॉर्म और एक परीक्षा से देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालय और संघटक कालेजों में या एक फॉर्म और एक परीक्षा से किसी भी एक राज्य के सभी विश्वविद्यालयों और संघटक कालेजों में दाखिला पाने के अवसर हो तो यह अच्छा है और इसे होना चाहिए। इससे छात्रों और छात्राओं का समय, पैसा समेत कई तरह से लाभ होगा। यह लाभ सिर्फ छात्रों और छात्राओं का ही नहीं अपितु इससे सभी विश्वविद्यालयों का मानव श्रम बचेगा तथा साथ ही साथ आर्थिक बोझ भी कम होगा। केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों के दाखिला प्रक्रिया में एकरूपता लाने की दिशा में यह एक सराहनीय कदम है। एकरूपता होने के कारण लोगों को समान अवसर मिलेंगे।

विश्वविद्यालयों में दाखिला पाने के लिए सिर्फ तीन प्रणाली हो सकती है। पहला प्रवेश परीक्षा, दूसरा न्यूनतम योग्यता के मेरिट के आधार पर और तीसरा प्रथम आगमन, प्रथम स्वागतम के आधार पर। इसमें सबसे सशक्त और अच्छा प्रवेश परीक्षा प्रणाली है। भारतीय संविधान में शिक्षा समवर्ती सूची में होने के नाते भारतीय स्कूल प्रणाली में केंद्र तथा राज्य के स्कूल बोर्डों में विविधता है और अलग-अलग राज्य के स्कूल बोर्डों में भी विविधता है। अलग-अलग स्कूल बोर्डों के पाठ्यक्रम एवं मूल्यांकन पद्धति में एकरूपता नहीं है। जो  स्कूल बोर्ड मूल्यांकन का उदार पद्धति अपनाते है उन बोर्ड के छात्रों का लाभ होगा। जिसमें सीबीएसई और आईसीएससी जैसे बोर्ड शामिल है। कुछ स्कूल बोर्ड  सामान्य मूल्यांकन पद्धति अपनाते है और कुछ स्कूल बोर्ड शख्त मूल्यांकन पद्धति अपनाते है। अगर दाखिला प्रवेश परीक्षा की मेरिट के अलावा कक्षा की मेरिट पर होगी तो जो स्कूल बोर्ड मूल्यांकन का शख्त पद्धति अपनाते है उन स्कूल बोर्ड के छात्रों और छात्राओं का नुकसान होगा। ज्ञानार्जन आधारित अध्ययन और अंक संग्रहण आधारित अध्ययन, ये दो अलग-अलग पढाई के तरीके है। अंक संग्रहण आधारित अध्ययन कक्षा की परीक्षा में अच्छा अंक लाने में सहायक हो सकता है लेकिन जरुरी नहीं है कि इससे प्रवेश परीक्षा में भी अच्छा नंबर आये जबकि ज्ञानार्जन आधारित अध्ययन करने से प्रवेश परीक्षा में अच्छा नंबर लाया जा सकता है। अगर न्यूनतम योग्यता के मेरिट के आधार पर प्रवेश दिया जायेगा तो गरीब, ग्रामीण और सुदूरवर्ती छात्रों पर नकारात्मक असर पड़ेगा और फलस्वरूप गरीब और अमीर के बीच खाई बढ़ती जायेगी। शिक्षा केंद्र और राज्य दोनों का विषय है। केंद्र सरकार सिर्फ केंद्राश्रित शैक्षणिक संस्थानों को संचालित और निगमित करने के लिए विधि बना सकती है। राज्याश्रित शैक्षणिक संस्थानों लिए नहीं। राज्य अपने शैक्षणिक संस्थानों को संचालित और निगमित करने के लिए खुद विधि बनायेंगे। एनटीए, शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार की एजेंसी है तो उसको केंद्र सरकार के शैक्षणिक संस्थानों के लिए प्रवेश परीक्षा लेना चाहिए। सभी राज्यों के विश्वविद्यालयों का नहीं। राज्यों के विश्वविद्यालयों में विविधता है इसलिए एक प्रवेश परीक्षा से सभी राज्यों के विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं लिया जाना चाहिए।

यूजीसी के चेयरमैन डॉ मम्मीडाला जगदीश कुमार एक इंटरव्यू में बता रहे थे कि शैक्षणिक संस्थान सीयूईटी के अंक के आलावा मेरिट के आधार पर न्यूनतम योग्यता निर्धारित कर सकते है। अब सवाल यह है कि इसकी जरुरत क्यों है? और अगर ऐसा किया जायेगा तो इसका असर किस तबके के छात्रों और छात्राओं पर पड़ेगा? जब सीयूईटी अपने मूल में कक्षा के मेरिट सिस्टम के खिलाफ और प्रवेश परीक्षा के मेरिट पर आधारित है तो क्या सरकार यह बतायेगी की सीयूईटी के प्रवेश परीक्षा में अच्छे अंक लाने के बावजूद न्यूनतम योग्यता में कक्षा के मेरिट का औचित्य क्या है? क्या दाखिला के लिए प्रवेश परीक्षा पर्याप्त मानदंड नहीं है? या फिर यह शोषण करने की साजिश है और अच्छा करने के नाम पर ग्रामीण, सुदूरवर्ती और प्रथम पीढ़ी अध्ययन करने वाले छात्रों और छात्राओं को अच्छे शैक्षणिक संस्थानों में दाखिला लेने से वंचित करने की सरकारी नीति है। अगर प्रवेश परीक्षा हो रहा है तो उसके बाद न्यूनतम अंक निर्धारित करने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि छात्र प्रवेश परीक्षा में अपने योग्यता का प्रदर्शन कर रहा है। इसलिए प्रवेश परीक्षा के आलावा न्यूनतम अंक निर्धारित करने की प्रासंगिकता नहीं है। अगर संस्थान अलग-अलग मेरिट रखेंगे तो उनमें एकरूपता कहाँ होगी? केंद्र को चाहिए कि शैक्षणिक संस्थानों में एकरूपता लाने के लिए एक कानून बनाये जिसको सभी विश्वविद्यालय और संघटक कॉलेज पालन करें। सभी शैक्षणिक संस्थानों में एकरूपता लाना सीयूईटी के मूल मकसद में से एक है जिससे सबको समान अवसर मिले तो फिर अलग-अलग शैक्षणिक संस्थानों में एक पाठ्यक्रम के न्यूनतम योग्यता में विविधता होना उसके मूल उद्देश्य के खिलाफ होगा।

इस देश के बड़े हिस्से में एनसीईआरटी की किताबें नहीं पढ़ाई जाती है। इसलिए वे छात्र प्रभावित होंगे जो राज्य बोर्ड से पढ़ते है और इससे सीबीएसई बोर्ड के छात्रों को लाभ होगा जिसमें अधिकतम अच्छी आर्थिक स्थिति के बच्चे पढ़ते हैं। सरकार अक्सर अमीर आश्रित नीतियां बनाती है। ये नीति भी उन्ही में से एक साबित होगी क्योंकि प्रस्तावित प्रवेश परीक्षा सीबीएसई पैटर्न पर आधारित होगी। हालाँकि एनसीईआरटी की किताबें मेरे अनुभव में सभी बोर्डों की किताबों से अच्छी हैं। इसलिए गणित, विज्ञान, अर्थशास्त्र ...... इत्यादि को (साहित्य को छोड़ कर) सभी स्कूल बोर्डों में अनिवार्य कर देना चाहिए। साहित्य का पाठ्यक्रम जैसे हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी ..... इत्यादि सम्बंधित राज्यों को निर्धारित करना चाहिए। ऐसा करने से कई फायदे एक साथ सध जायेंगे जो सरकारों का उद्देश्य भी है और चुनौती भी। सभी स्कूल बोर्डों में एनसीईआरटी लागू करने से देश की शिक्षा में एकरूपता आयेगा जिसका लाभ न सिर्फ सीयूईटी में मिलेगा बल्कि जितनी भी संयुक्त प्रवेश परीक्षाएं होती है जैसे आईo आईo टीo, एनo ईo ईo टीo, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी..... इत्यादि सभी में राज्य बोर्डों के छात्र-छात्राओं की हिस्सेदारी बढ़ेगी और दूसरा इससे निजी स्कूलों की किताबों पर हो रही लूट को ख़त्म किया जा सकेगा जिससे अभिभावकों को आर्थिक शोषण से बचाया जा सकता है।  

सामान्य वर्ग की फीस 650 रुपया है। ईडब्ल्यूएस और ओबीसी नॉन क्रीमीलेयर की फीस 600 रुपया है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पीडब्ल्यूडी और थर्ड जेंडर के लिए 550 रुपया फीस निर्धारित है। भारत सरकार ने बीपीएल को भी फीस में छूट देने का प्रावधान बनाया है। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी और यूजीसी के नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे बीपीएल छात्रों और छात्राओं की फीस भारत सरकार के छूट नीति के तहत निर्धारित करें। सामान्य वर्ग की फीस से ईडब्ल्यूएस और ओबीसी नॉन क्रीमीलेयर को 50 रुपया कम और ईडब्ल्यूएस और ओबीसी नॉन क्रीमीलेयर की फीस से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पीडब्ल्यूडी और थर्ड जेंडर को 50 रुपया कम करने से कल्याण पर क्या प्रभाव होगा? क्या इतना कम छूट का प्रावधान जानबूझकर इस लिए बनाया गया है ताकि आरक्षण होना और आरक्षण न होना लगभग बराबर हो या इसका खास असर न हो? यूजीसी नेट में एनटीए सामान्य वर्ग से 50% कम फीस ओबीसी नॉन क्रीमीलेयर को और ओबीसी नॉन क्रीमीलेयर से 50% कम फीस अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पीडब्ल्यूडी और थर्ड जेंडर को देने का प्रावधान है। यूजीसी के नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे भारत सरकार द्वारा बनाये गए ‘शुल्क में छूट’ नियमों के तहत आरक्षित वर्गों की शुल्क निर्धारित करें।

संयुक्त प्रवेश परीक्षा करवाने के तीन मॉडल हो सकते है। पहला विश्वविद्यालयों का एक संगठन बनाकर प्रवेश परीक्षा की जिम्मेदारी किसी एक विश्वविद्यालय को दे देना। दूसरा केंद्र और राज्य सरकारें राष्ट्रीय और राज्य प्रवेश परीक्षा एजेंसी बना कर सम्बंधित शैक्षणिक संस्थानों में संयुक्त प्रवेश परीक्षा करवायें। तीसरा और सबसे सशक्त तरिका होगा अगर संघ लोक सेवा आयोग और राज्यों के लोक सेवा आयोगों को सम्बंधित शैक्षणिक संस्थानों में दाखिला के लिए प्रवेश परीक्षा करवाने का भी दायित्व दे दिया जाय। ज्ञात हो कि अभी तक संघ लोक सेवा आयोग और लोक सेवा आयोग सिर्फ केंद्र और राज्य के लिए नौकरियों के लिए प्रवेश परीक्षा करवाते है। अगर इसमें कानूनन संशोधन करके दो अलग-अलग विभाग बना दिया जाय जिसमें एक विभाग नौकरियों में प्रवेश परीक्षा करवाये और एक विभाग शैक्षणिक संस्थानों में दाखिला के लिए प्रवेश परीक्षा करवाये तो यह स्थाई समाधान होगा। आईo आईo टीo, आईo आईo एमo, एनo ईoईo टीo समेत सभी केंद्रीय शैक्षणिक संस्थाओं को संघ लोक सेवा आयोग से जोड़ देना चाहिए और सभी राज्य शैक्षणिक संस्थाओं में होने वाले संयुक्त प्रवेश परीक्षाओं को सम्बंधित राज्यों के लोक सेवा आयोगों से जोड़ देना चाहिए। भारत एक कल्याणकारी राज्य होने के नाते सरकार इन आयोगों से चाहे तो निःशुल्क प्रवेश परीक्षा करवा सकती है जिससे गरीब और अमीर सभी तबके के सभी छात्रों-छात्राओं को समान अवसर मिलेगा और परिणाम स्वरुप शिक्षा का विस्तार होगा जो यूजीसी, सरकार और विश्व समुदायों सभी का लक्ष्य है।  या इसके अलावा अगर सरकारें पूरा खर्च उठाने में सक्षम नहीं है तो सम्बंधित आयोग न्यूनतम शुल्क पर प्रवेश परीक्षा करवा सकती है। अगर सरकारें कोई आर्थिक सहयोग नहीं देतीं  हैं तो सम्बंधित आयोग नो प्रॉफिट नो लॉस के सिद्धांत पर प्रवेश परीक्षा करवा सकती है। तीसरे मॉडल के तीनों विकल्प ठेके पर प्रवेश परीक्षा करवाने के तुलना में एक अच्छा और आदर्श विकल्प होंगे।

सीयूईटी लागू करने के फायदे है लेकिन संशोधन करने के बाद और अगर संशोधन नहीं किया गया तो इससे नुकसान भी होगा जिसका नकारात्मक असर गरीब, ग्रामीण तबके और सुदूरवर्ती क्षेत्र के छात्रों और छात्राओं पर सबसे ज्यादा पड़ेगा। इसके अलावा जो छात्र-छात्राएं अच्छे संसाधनों से वंचित है उन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसके लिए सरकार, गैर सरकारी संगठन और सिविल सोसाइटी सबकों आगे आना चाहिए जिससे सभी तबके के छात्रों और छात्राओं को समान अवसर मिल सके। केंद्र सरकार के स्कूल बोर्ड अमीर छात्रों के स्कूल बोर्ड माने जाते है। अगर पाठ्यक्रम में बिना एकरूपता लाये सीयूईटी सीबीएसई पैटर्न पर करवाया जायेगा तो इससे राज्य बोर्ड के छात्रों और छात्राओं का नुकसान होगा। इस नुकसान से बचने और स्कूली शिक्षा में एकरूपता लाने के लिए सभी स्कूल बोर्डों में एनसीईआरटी अनिवार्य रूप से लागू करवा देना चाहिए। सीयूईटी विवरण-पुस्तिका के अनुसार इस प्रवेश परीक्षा में हिंदी, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, उर्दू, असमिया, बंगाली, पंजाबी, ओडिया और अंग्रेजी समेत कुल तेरह भाषाओं में प्रश्न पत्र आयेगा। क्या भारत में सिर्फ तेरह भाषाओं में स्कूल बोर्ड की पढ़ाई होती है? उन राज्यों के स्कूल बोर्डों में जहाँ इन तेरह भाषाओं के आलावा किसी अन्य भाषा में पढ़ाई होती है उन राज्यों के छात्रों का नुकसान होगा। इसकी भरपाई कैसे होगी? सरकार के नीति निर्माताओं को चाहिए कि जितने भाषाओं में स्कूल बोर्ड की पढ़ाई होती है उन सभी भाषाओं में प्रवेश पत्र का माध्यम दें। जिससे किसी भी स्कूल बोर्ड के साथ अन्याय न हो। सरकार को चाहिए कि वे ग्रामीण और सुदूरवर्ती क्षेत्रों में पर्याप्त संख्या में परीक्षा केंद्र सुनिश्चित करे। ग्रामीण और सुदूरवर्ती क्षेत्रों में आन लाइन और ऑफ लाइन दोनों विकल्प दिया जाना चाहिए। पहले सीयूसीईटी पुरे भारत में नये केंद्रीय विश्वविद्यालय में स्नातक, परास्नातक एवं शोध पाठ्यक्रम में दाखिला लेने के लिए एक प्रवेश परीक्षा आयोजित करती थी। सीयूईटी को भी स्नातक के अलावा परास्नातक और शोध पाठ्यक्रम के साथ-साथ डिप्लोमा और विश्वविद्यालयों में होने वाले सर्टिफिकेट कोर्स के लिए भी लागू किया जाना चाहिए।

*लेखक: अर्थशास्त्र एवं आयोजन अध्ययन केंद्र, केंद्रीय विश्वविद्यालय गुजरात में शोधार्थी है। उन्हें ईमेल <raghuyadav50@gmail.com> से संपर्क किया जा सकता है।

Friday, 8 April 2022

सीयूईटी: अवसर और चुनौतियाँ

सीयूईटी: अवसर और चुनौतियाँ

सीयूईटी का पुरे देश में विरोध हो रहा है और इसे बंद करके पहले जैसी प्रणाली को लागु करने की मांग की जा  रही है। सही है। विरोध होना भी चाहिए क्योंकि पुरे देश से आने वाले ग्रामीण तबके के छात्रों पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा खास तौर से जो राज्य बोर्ड से पढ़ने वाले छात्र है। मेरे ख्याल से इसका विरोध सिर्फ  संशोधन के लिए होना चाहिए, सीयूईटी को बंद करके पहले जैसी प्रणाली के लिए नहीं क्योंकि अलग-अलग विश्वविद्यालयों का फॉर्म भरना, फीस जमा करना, परीक्षा देना इत्यादि चीजे सीमित अवसर कर देती है। अगर एक फॉर्म और परीक्षा से देश के किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय में दाखिला पाने के अवसर हो तो यह अच्छा है और इसे होना चाहिए। इसकी मांग बहुत पहले से अकादमिक जगत में चल रही थी। यूपीए के कार्यकाल में सीयूसीईटी सभी नए केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए बनी थी। फिर बाद में कुछ राज्य विश्वविद्यालय भी जुड़े। अगर उस प्लान को पुरे देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों से जोड़ दिया जाय तो यह सराहनीय कदम है।

 वास्तव में सीयूईटी ठीक उसी तरह का एक यूनिक मॉडल होगा जैसे आईआईटी, आईआईऍम, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी और अन्य इलीट इंस्टिटूशन्स में था। सीयूईटी को सिर्फ सभी सेंट्रल यूनिवर्सिटी के लिए लागु किया जाना चाहिए राज्य विश्वविद्यालय, डीम्ड विश्वविद्यायल और अन्य नहीं। लेकिन हां, सभी अलग-अलग राज्यों के राज्य विश्वविद्यालयों के लिए एक फार्म और एक परीक्षा होनी चाहिए जिससे उस राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में दाखिला मिल सके। विश्वविद्यालयों में दाखिला पाने के लिए सिर्फ तीन प्रणाली हो सकती है। पहला इंट्रेंस एग्जाम दूसरा मिनिमम एलिजिबिलिटी के मेरिट के आधार पर और तीसरा प्रथम आगमन प्रथम स्वागतम के आधार पर। इसमें सबसे सशक्त और अच्छा इंट्रेंस प्रणाली है सरकार अक्सर अमीर आश्रित नीतियां बनती है। ये नीति भी उन्ही में में से एक है।

इस देश के बड़े हिस्से में एनसीईआरटी की किताबें नहीं पढ़ाई जाती है। इस लिए वे छात्र प्रभावित होंगे जो राज्य बोर्ड से पढ़ते है और इससे सीबीएसई बोर्ड के छात्रों को लाभ होगा जिसमें अधिकतम अच्छी आर्थिक स्थिति के बच्चे पढ़ते हैं। हालाँकि एनसीईआरटी की किताबें मेरे अनुभव में सभी बोर्ड की किताबों से अच्छी है। इसलिए गणित, विज्ञान, अर्थशास्त्र ...... इत्यादि को (साहित्य को छोड़ कर) सभी विद्यालयों में अनिवार्य कर देना चाहिए। साहित्य का पाठ्यक्रम जैसे हिंदी, इंगलिश, गुजराती, मराठी ..... इत्यादि सम्बंधित राज्यों को निर्धारित करना चाहिए।