"हिंदुस्तान - मुर्दाबाद", "भारत के बर्बादी तक - जंग रहेगी, जंग रहेगी" यह नारा दिया गया जो देश के लिए शर्म की बात है। हमारी असहमति देश की प्रशासनिक व्यवस्था से हो सकती है। हमारी असहमति देश की कानून व्यवस्था से हो सकती है। हमारी असहमति देश की गद्दार नेताओ से हो सकती है। हमारी असहमति देश के उन तमाम लोगो/संस्थाओ से भी हो सकती है जो लोग आधिकारिक रूप से सिस्टम में रह कर, देश का आगे बढ़ाने के नाम पर देश को लात मार रहे है। देश को लूट रहे है। जो देश को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बर्बाद कर रहे है, इन तमाम लोगो से हमारी असहमति है। लेकिन हमारे इस असहमति का मतलब ये नहीं होना चाहिए कि हम जिसके लिए लड़ रहे है, उसी का मुर्दाबाद करने लगे। वैसे जे एन यू के छात्रों को ऐसा क्यों करना पड़ा यह विचार का मुद्दा होना चाहिए। लेकिन सवाल ये है की सिर्फ वही देश द्रोही के श्रेणी में क्यों है? क्या दंगे कराने वाले देश द्रोही के श्रेणी में नहीं आते? इनको देश से निकालने का कथित-वीजा कोई नहीं देता। इनकी देश-द्रोहिता पर आवाज नहीं उठती है. ऐसे पक्षपातीय राष्ट्र भक्ति पर भी लानत होनी चाहिए। इस पर विचार करने के जगह राजनीति करने वालो तुम पर शर्म है।
Sunday, 12 February 2017
Tuesday, 27 December 2016
पटाकिया मनोरंजन और दुस्वारियां
पुणे स्थित चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन ने अपने रिसर्च में पाया कि 1 अनार बम 34 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाता है। एक फुलझड़ी 74 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाती है। 1 पुलपुल बम 208 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाता है। 1 स्नैक टैवलेट बम 464 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाता है। इस रिसर्च फाउंडेशन ने यह भी बताया था कि दिवाली के दिन भारत में 20 गुना प्रदुषण फैलता है। जरा सोचिये, हमारे पल भर के मनोरंजन की कीमत पर प्रकृति को यह नुक़सान चुकानी पड़ती है। इतना ही नहीं; इन पटाकों की वजह से अनगिनत पक्षियां मौत के मुंह में समां जाती है। इसलिए हमें पटाका से होने वाली इन दुस्वारियों से बचना चाहिए और पटाखे नहीं जलाना चाहिए।
पुरे देश और पूरी दुनिया में सेलिब्रेट होने वाला न्यू ईयर, इस पर भी कुछ लोगों अपने छड़ भर के मनोरंजन के लिए पटाका जलाते है। इसका खामियाज़ा प्रकृति को उठाना पड़ता है। हमें प्रकृति को सतत स्वस्थ्य रखने के लिए मनोरंजन के इस तरीके को तिलांजलि कर मनोरंजन के अन्य तरीकों को अख़्तियार में लाना चाहिए। जो इन्वॉयरमेंट फ्रेंडली हो।
एक विशेष अपील और, कुछ खास तौर के भाई लोग से और आज-कल (खास तौर पे शहरों में) इसमें कुछ बहन जी भी इन्वोल्व है। जो नये साल पे टन्न हो जाते/जाती है। आपकी वजह से ३१ दिसंबर की रात में एक्सीडेंट की घटनाएं बहुत बढ़ जाती है। इतना ही नहीं झगड़ा - फसात की संख्या भी बढ़ जाती है। आप तो खुद ध्वस्त होते ही है, कई बार एक सही व्यक्ति भी बिना गलती किये आपके बेवकूफियों का शिकार हो जाता है। इसलिए आप जैसे धुरन्धारों से विशेष अपील है कि आप इन नौटंकियों के भविष्यगामी परिणाम के मद्दे नजर अपने मनोरंजन के साधनों को अख्तियार में लाएंगे।
रघु द्वारा जनहित में जारी ........
पुरे देश और पूरी दुनिया में सेलिब्रेट होने वाला न्यू ईयर, इस पर भी कुछ लोगों अपने छड़ भर के मनोरंजन के लिए पटाका जलाते है। इसका खामियाज़ा प्रकृति को उठाना पड़ता है। हमें प्रकृति को सतत स्वस्थ्य रखने के लिए मनोरंजन के इस तरीके को तिलांजलि कर मनोरंजन के अन्य तरीकों को अख़्तियार में लाना चाहिए। जो इन्वॉयरमेंट फ्रेंडली हो।
एक विशेष अपील और, कुछ खास तौर के भाई लोग से और आज-कल (खास तौर पे शहरों में) इसमें कुछ बहन जी भी इन्वोल्व है। जो नये साल पे टन्न हो जाते/जाती है। आपकी वजह से ३१ दिसंबर की रात में एक्सीडेंट की घटनाएं बहुत बढ़ जाती है। इतना ही नहीं झगड़ा - फसात की संख्या भी बढ़ जाती है। आप तो खुद ध्वस्त होते ही है, कई बार एक सही व्यक्ति भी बिना गलती किये आपके बेवकूफियों का शिकार हो जाता है। इसलिए आप जैसे धुरन्धारों से विशेष अपील है कि आप इन नौटंकियों के भविष्यगामी परिणाम के मद्दे नजर अपने मनोरंजन के साधनों को अख्तियार में लाएंगे।
रघु द्वारा जनहित में जारी ........
Tuesday, 20 December 2016
जो शिक्षा बाहर में दी गई है वो व्यवस्था यहाँ पर हो
ये आजमगढ़ में लालगंज लोकसभा क्षेत्र से सांसद श्रीमती नीलम सोनकर जी का वक्तव्य चुनाव प्रचार के समय का है। आप भी जानिए साहिबा ने क्या कहा था।
"....... लालगंज लोकसभा के, जो शिक्षा की व्यवस्था न होने के कारण लोग बाहर जाते है। चाहे वो लखनऊ जाये, बी एच यू जाये, दिल्ली जाये या कही भी जाये लेकिन शिक्षा के अभाव में उनको बाहर जाना पड़ता है। तो मैं चाहूंगी अगर मुझे ऐसा अवसर मिलता है तो यहाँ पर, जो शिक्षा बाहर में व्यवस्था दी गई है वो व्यवस्था यहाँ पर हो। ताकि यहाँ पर बच्चे बाहर जाकर न पढ़े।"
साहिबा के इस बात से हम बिल्कुल सहमत है और शायद पूरा आजमगढ़ सहमत है कि हां ये सही कह रही है। और इससे आजमगढ़ के ब्रेन ड्रेन को रोकने में मदद मिलेगी। इन्होंने फिर आगे ये भी कहा कि
"....... मैं चाहूंगी यहाँ पर जीतनी भी महिलाएं है और बालिका है, उन सबको उच्च शिक्षा प्राप्त हो और उच्च शिक्षा प्राप्त होने की वजह से वे जागरूक हो जाएँगी और अपने अधिकार को समझ सकेंगी कि सरकार ने उनके लिए क्या-क्या अधिकार दिया है और जब अधिकार अपना जान लेंगी तो वे एक जुट होकर, एक मत होकर, एक दिशा में काम करेंगी।"
बतौर महिला प्रत्यासी, महिलाओ की जरुरत बखूबी बतायीं थी। यह एक मजबूत इसारा था आजमगढ़ के विकास के लिए। उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि
"...... इस सब, जो मैं कर सकूँ अपने सरकार के सामने वो बात रखूं ताकि यहाँ कि समस्या जब वहाँ रखूंगी तो सुनी जाएगी और यहाँ का विकास कार्य होगा।"
सांसद महोदया से आजमगढ़ में विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में #विश्वविद्यालय_अभियान कई बार संपर्क किया और इस जरुरत की ओर ध्यान आकर्षित किया। मैं खुद सांसद जी से आजमगढ़ में विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में बात किया। सांसद महोदया ने कहा,
"हां आप लोगों की मांग तो बिल्कुल सही है और मैं इसका पूरा समर्थन करती हूँ। राज्य सरकार को यहाँ एक विश्वविद्यालय देना चाहिए। लेकिन मैं इसमें क्या कर सकती हूँ? आप बताइये मुझसे क्या चाहते है?"
मैंने उनसे आग्रह किया कि,
"मैडम हम सरकार से मांग कर रहे है और सूबे की सरकार हमारी बात नहीं सुन रही है। आप सरकार से बात कर सकती है। आप सीo एमo को लेटर लिख सकती है। तो शायद आजमगढ़ को विश्वविद्यालय मिल जाय। इसके बाद सांसद महोदया ने आश्वासन दिया ठीक है, अभी तो मैं दिल्ली में हूँ लेकिन सरकार से बात करुँगी।" और आज तक बात होती रही .........
आजमगढ़ को विश्वविद्यालय न मिलने तक संघर्ष जारी रहेगा ......
राघवेंद्र यादव
विश्वविद्यालय अभियान
you may listen from mentioned link
https://www.youtube.com/watch?v=N-dNwIsS7kg
"....... लालगंज लोकसभा के, जो शिक्षा की व्यवस्था न होने के कारण लोग बाहर जाते है। चाहे वो लखनऊ जाये, बी एच यू जाये, दिल्ली जाये या कही भी जाये लेकिन शिक्षा के अभाव में उनको बाहर जाना पड़ता है। तो मैं चाहूंगी अगर मुझे ऐसा अवसर मिलता है तो यहाँ पर, जो शिक्षा बाहर में व्यवस्था दी गई है वो व्यवस्था यहाँ पर हो। ताकि यहाँ पर बच्चे बाहर जाकर न पढ़े।"
साहिबा के इस बात से हम बिल्कुल सहमत है और शायद पूरा आजमगढ़ सहमत है कि हां ये सही कह रही है। और इससे आजमगढ़ के ब्रेन ड्रेन को रोकने में मदद मिलेगी। इन्होंने फिर आगे ये भी कहा कि
"....... मैं चाहूंगी यहाँ पर जीतनी भी महिलाएं है और बालिका है, उन सबको उच्च शिक्षा प्राप्त हो और उच्च शिक्षा प्राप्त होने की वजह से वे जागरूक हो जाएँगी और अपने अधिकार को समझ सकेंगी कि सरकार ने उनके लिए क्या-क्या अधिकार दिया है और जब अधिकार अपना जान लेंगी तो वे एक जुट होकर, एक मत होकर, एक दिशा में काम करेंगी।"
बतौर महिला प्रत्यासी, महिलाओ की जरुरत बखूबी बतायीं थी। यह एक मजबूत इसारा था आजमगढ़ के विकास के लिए। उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि
"...... इस सब, जो मैं कर सकूँ अपने सरकार के सामने वो बात रखूं ताकि यहाँ कि समस्या जब वहाँ रखूंगी तो सुनी जाएगी और यहाँ का विकास कार्य होगा।"
सांसद महोदया से आजमगढ़ में विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में #विश्वविद्यालय_अभियान कई बार संपर्क किया और इस जरुरत की ओर ध्यान आकर्षित किया। मैं खुद सांसद जी से आजमगढ़ में विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में बात किया। सांसद महोदया ने कहा,
"हां आप लोगों की मांग तो बिल्कुल सही है और मैं इसका पूरा समर्थन करती हूँ। राज्य सरकार को यहाँ एक विश्वविद्यालय देना चाहिए। लेकिन मैं इसमें क्या कर सकती हूँ? आप बताइये मुझसे क्या चाहते है?"
मैंने उनसे आग्रह किया कि,
"मैडम हम सरकार से मांग कर रहे है और सूबे की सरकार हमारी बात नहीं सुन रही है। आप सरकार से बात कर सकती है। आप सीo एमo को लेटर लिख सकती है। तो शायद आजमगढ़ को विश्वविद्यालय मिल जाय। इसके बाद सांसद महोदया ने आश्वासन दिया ठीक है, अभी तो मैं दिल्ली में हूँ लेकिन सरकार से बात करुँगी।" और आज तक बात होती रही .........
आजमगढ़ को विश्वविद्यालय न मिलने तक संघर्ष जारी रहेगा ......
राघवेंद्र यादव
विश्वविद्यालय अभियान
you may listen from mentioned link
https://www.youtube.com/watch?v=N-dNwIsS7kg
Friday, 11 November 2016
हालत - ए - शिक्षा
आज हमारे देश में कुछ स्कूलों में कुछ छोटे बच्चों को प्रवेश इस लिए नहीं दिए जा रहे है क्योंकि उनके माता पिता निरक्षर है। मुझे लगता है कि ये उसी मज़लिस के क्रूर सोच के पक्षधर है जो निरक्षर को निरक्षर तथा गरीब को और गरीब बनाने की साजिशे रचते है। इस लिए ऐसे मज़लिस के मज़मून की मज़ाल को समझना जरुरी है। जरा सोचिये जिस देश की सरकार सर्व शिक्षा अभियान जैसे महत्वपूर्ण मिशन चला रही हो। "पढ़ेगा भारत, बढ़ेगा भारत" जैसे वैचारिक नारे दिए जा रहे हो। ऐसे दौर में इस तरह के लोमहर्षक नियम बनाना इन महत्वपूर्ण मिशन को तमाचा मारने जैसा है और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तपके के साथ घोर अन्याय है। मैं इस देश की सरकार तथा राज्य सरकारों से यह उम्मीद करता हूँ कि ऐसे संवेदनशील मुद्दो से अंजान न बने, ऐसे स्कूलों को चिन्हित कर इनके संविधान को बदलवाए और अगर ये नहीं मानते है तो इनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए।
ये तो प्राथमिक शिक्षा का हाल है। अग़र हम उच्च शिक्षा पर नजर डाले तो इनकी वैचारिक हालत और भी निकम्मी है। शायद आज हमारे देश का कोई भी शख्स इस कथन से असहमत नहीं होगा की हमारे देश की उच्च शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा भाग चमचा युग में जी रही है। उपरोक्त दोनों दशाये वेहद खतरनाक है इन्हे सुधारने के लिए बड़े बदलाव की जरुरत है।
मेरे भारत, मेरे हिन्दोस्ताँ, मेरे इंडिया मैं तुमसे यही कहना चाहता हूँ कि तुम्हारी ये हालत हम जैसे लोग सुधारंगे………
राघवेन्द्र यादव
इन्कलाब - जिंदाबाद
Saturday, 1 October 2016
ये दोहरापन क्यों है?
उत्तर
प्रदेश
सरकार
से
पूछ
रहा
हूँ
कि
ये
दोहरापन
क्यों
है?
आप
विधान
सभा
में
एरा
विश्वविद्यालय
लखनऊ,
उत्तर
प्रदेश
विधेयक,
2015 पारित
करने
के
लिए
सदन
में
कहते
है
कि
"यह
विधेयक
है
विश्वविद्यालय के
बारे
में
और
सैद्धान्तिक
रूप
से
हम
लोग
किसी
भी
नए
विश्वविद्यालय
की
स्थापना
का
कभी
भी
विरोध
नहीं
करते
है।"
अगर
नए
विश्वविद्यालय
बनाने
के
सन्दर्भ
में
वाकयी
आपके
विचार
ऐसे
है
तो
यह
सराहनीय
विचार
है
और
हम
ऐसे
विचार
का
स्वागत
करते
है।
लेकिन
यथार्थ
कुछ
और
है।
इसे
मैं
आपके
विचार
नहीं
बल्कि
कागजी
नौटंकी
मानता
हूँ।
क्योंकि
उत्तर
प्रदेश
विधान
परिषद
में
जब
आजमगढ़
में
विश्वविद्यालय
बनाये
जाने
पर
सूबे
के
मुख्यमंत्री
से
सवाल
पूछा
गया
तो
सरकार
के
मंत्री
जवाब
दिए
कि
आजमगढ़
में
विश्वविद्यालय
बनाया
जाना
प्रासंगिक
नहीं
है।
इसका मतलब है कि वे आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाये जाने का विरोध कर रहे है।
सूबे
की
सरकार
का
यह
एक
मनमाना
जवाब
था,
जिसका
यथार्थ
से
कोई
लेना-देना
नहीं
था।
इस
जवाब
ने
हजारों
आजमगढ़ियों
को
आहत
किया
था।
मैं
जानना
चाहता
हूँ
कि
अगर
एक
प्राइवेट
कालेज
को
विश्वविद्यालय
बनाने
के
लिए
इतना
मधुर
और
बौद्धिक
विचार
दिए
गए
तो
आजमगढ़
में
विश्वविद्यालय
बनाने
के
लिए
इतना
निष्क्रिय
और
उलजुलूल
उत्तर
क्यों
दिया
गया?
मैं
सूबे
की
सरकार
से
पूछता
हूँ
कि
"आजमगढ़
विश्वविद्यालय
विधेयक"
कब
पारित
होगा?
Thursday, 11 August 2016
आदिवासी हालात और दिवस
जोहार साथियों,
विश्व आदिवासी दिवस दुनिया के महत्वपूर्ण दिवसों में से एक है। अगर युo एनo के आकड़ो पर गौर करे तो दुनिया के 90 देशों में लगभग 370 मिलियन आदिवासी है। जिनके पास 7००० (सात हजार) भाषाएँ और 5००० (पांच हजार) अलग-अलग कल्चर है। आदिवासियों का मौखिक साहित्य अत्यंत समृद्ध है। लोक कथाओं, गीतों, कहावतों और मुहावरों की वाचिक परंपरा आदिवासी समुदायों में भरी-पड़ी है।
विश्व के विभिन्न देशों में निवासरत आदिवासियों के मानव अधिकार की सुरक्षा के लिए यु0 एन0 ने 1982 में एक सब-कमीशन बनाया। इस कमीशन ने यह पाया की आदिवासी गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, बंधुआ मजदूर और सामाजिक उपेक्षा जैसे समस्याओं से जूझ रहे हैं। इन समस्याओ के निराकरण हेतु यु0 एन0 वर्किंग ग्रुप के सब-कमीशन ने 9 अगस्त 1982 में विश्व आदिवासी दिवस मनाने का प्रस्ताव यु0 एन0 जनरल असेम्बली में रखा जिसे 1994 में यु0 एन0 जनरल असेम्बली ने स्वीकार कर लिया। 9 अगस्त 2016 को विश्व आदिवासी दिवस, शिक्षा के अधिकार को समर्पित है।
आदिवासियों का अपना धर्म है। ये प्रकृति को अपना ईस्ट देव मानते है और जंगल, पहाड़, नदियों..... आदि की आराधना करते हैं। लेकिन दूभर हालात होने के नाते ईसाई मशीनरी, इस्लामिक मशीनरी, हिन्दू मशीनरी....... आदि ने कुछ लोभ देकर या जबरन धर्म परिवर्तन करवाया। परंतु आज ये स्वयं की धार्मिक पहचान के लिए संगठित हो रहे हैं। अगर हम भारत के आदिवासियों की बात करे तो ब्राहमेनिकल मैकेनिजम ने इन्हें कभी आदमी के रूप में स्वीकार ही नहीं किया। लेकिन यह भी एक विडम्बना है की "रामायण", जिसपर हिन्दू धर्म का ताना-बाना बुना गया है, के रचयिता महर्षि वाल्मीकि जी आदिवासी थे।
हम आज 23वे विश्व आदिवासी दिवस को मना रहे है। लेकिन सरकारें जो प्रयास दूसरे विश्व दिवसों को मनाने में करती है वो विश्व आदिवासी दिवस मनाने में नहीं करती। इस दिवस पर मीडिया में भी गाहे-बगाहे ही खबरें, लेख या संपादकीय दिखती है। जो यह दर्शाता है कि लोग आदिवासियों के जीवन स्तर में सुधार को लेकर कितना जागरूक या चिंतित है। आज से दो साल बाद हम विश्व आदिवासी दिवस का 25वा विश्व आदिवासी दिवस मनाएंगे। अगर 25वे विश्व आदिवासी दिवस को यु0 एन0 विश्व आदिवासी वर्ष के रूप में मनाये तो आदिवासियों के जीवन स्तर में सुधार लाने का एक बड़ा प्रयास होगा।
राघवेंद्र यादव
शोधार्थी
सेंटर फॉर स्टडीज एंड रिसर्च इन इकोनॉमिक्स एंड प्लानिंग
सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ गुजरात
विश्व आदिवासी दिवस दुनिया के महत्वपूर्ण दिवसों में से एक है। अगर युo एनo के आकड़ो पर गौर करे तो दुनिया के 90 देशों में लगभग 370 मिलियन आदिवासी है। जिनके पास 7००० (सात हजार) भाषाएँ और 5००० (पांच हजार) अलग-अलग कल्चर है। आदिवासियों का मौखिक साहित्य अत्यंत समृद्ध है। लोक कथाओं, गीतों, कहावतों और मुहावरों की वाचिक परंपरा आदिवासी समुदायों में भरी-पड़ी है।
विश्व के विभिन्न देशों में निवासरत आदिवासियों के मानव अधिकार की सुरक्षा के लिए यु0 एन0 ने 1982 में एक सब-कमीशन बनाया। इस कमीशन ने यह पाया की आदिवासी गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, बंधुआ मजदूर और सामाजिक उपेक्षा जैसे समस्याओं से जूझ रहे हैं। इन समस्याओ के निराकरण हेतु यु0 एन0 वर्किंग ग्रुप के सब-कमीशन ने 9 अगस्त 1982 में विश्व आदिवासी दिवस मनाने का प्रस्ताव यु0 एन0 जनरल असेम्बली में रखा जिसे 1994 में यु0 एन0 जनरल असेम्बली ने स्वीकार कर लिया। 9 अगस्त 2016 को विश्व आदिवासी दिवस, शिक्षा के अधिकार को समर्पित है।
आदिवासियों का अपना धर्म है। ये प्रकृति को अपना ईस्ट देव मानते है और जंगल, पहाड़, नदियों..... आदि की आराधना करते हैं। लेकिन दूभर हालात होने के नाते ईसाई मशीनरी, इस्लामिक मशीनरी, हिन्दू मशीनरी....... आदि ने कुछ लोभ देकर या जबरन धर्म परिवर्तन करवाया। परंतु आज ये स्वयं की धार्मिक पहचान के लिए संगठित हो रहे हैं। अगर हम भारत के आदिवासियों की बात करे तो ब्राहमेनिकल मैकेनिजम ने इन्हें कभी आदमी के रूप में स्वीकार ही नहीं किया। लेकिन यह भी एक विडम्बना है की "रामायण", जिसपर हिन्दू धर्म का ताना-बाना बुना गया है, के रचयिता महर्षि वाल्मीकि जी आदिवासी थे।
हम आज 23वे विश्व आदिवासी दिवस को मना रहे है। लेकिन सरकारें जो प्रयास दूसरे विश्व दिवसों को मनाने में करती है वो विश्व आदिवासी दिवस मनाने में नहीं करती। इस दिवस पर मीडिया में भी गाहे-बगाहे ही खबरें, लेख या संपादकीय दिखती है। जो यह दर्शाता है कि लोग आदिवासियों के जीवन स्तर में सुधार को लेकर कितना जागरूक या चिंतित है। आज से दो साल बाद हम विश्व आदिवासी दिवस का 25वा विश्व आदिवासी दिवस मनाएंगे। अगर 25वे विश्व आदिवासी दिवस को यु0 एन0 विश्व आदिवासी वर्ष के रूप में मनाये तो आदिवासियों के जीवन स्तर में सुधार लाने का एक बड़ा प्रयास होगा।
राघवेंद्र यादव
शोधार्थी
सेंटर फॉर स्टडीज एंड रिसर्च इन इकोनॉमिक्स एंड प्लानिंग
सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ गुजरात
Tuesday, 26 July 2016
कश्मीर की पत्थरबाजी
आज कश्मीर में पत्थर फेंकने को लेकर गजब की भक्ति दिखाई जा रही है। क्या यह पहली बार हो रहा है? क्या ऐसा सिर्फ कश्मीर में ही होता है? कश्मीर को छोड़कर पुरे भारत में कही नहीं होता है? अगर होता है तो उस पर इतना राजनितिक नौटंकी करने के जगह समाधान पर ध्यान देना चाहिए कि उनको ऐसा न करना पड़े। मेरा अनुभव है कि भारत का शायद कोई भी ऐसा राज्य नहीं है जहां कर्फ्यू लगे और पुलिस के ऊपर पत्थर न फेंका गया हो। खैर ये तो बड़े मुद्दे पर होता है। इसे छोडिए। आइए हम कुछ छोटे मुद्दों पर बात करते है। हम किसी भी राज्याश्रित या केंद्राश्रित विश्वविद्यालय को लेते है। वहां कुछ छात्र अपने मांग को लेकर सड़क पर आते है। फिर दोनों (छात्र और पुलिस) में झड़प होती है और छात्रों द्वारा पुलिस पर पत्थर फेंके जाते है, ठीक वैसे ही जैसे कश्मीर में चल रहा है। क्या हम इन पत्थरबाजों को आतंकवादी कहते है, जैसा की कश्मीर के लिए कहा जा रहा है? इसके आलावा, हम सभी वकीलों और पुलिस के झड़प से भी चीर-परिचित होंगे। इनके झड़प में भी पुलिस के ऊपर पत्थरबाजी होती है क्या हम उन वकीलों को आतंकवादी कहते है? शायद नहीं। हम राजनितिक पार्टियों को लेते है। सत्तासीन पार्टी को छोड़ कर, अन्य पार्टियाँ कुछ मुद्दे तलाश (ढूढ़कर) कर सड़क पर शक्ति प्रदर्शन करती है। जिसमे कई बार ऐसा होता है कि वे पुलिस से झगड़ते है और पुलिस के ऊपर पत्थर फेंकते है। शायद हम उन्हें भी आतंकवादी जैसा उच्चारण नहीं करते है। पुरे भारत में कश्मीर को छोड़कर दूसरे किसी भी राज्य के किसी भी जनपद में ऐसी पत्थरबाजी होती है तो हम उन्हें आतंकवादी नहीं कहते है। तो ये नौटंकी और टैग कश्मीर के लिए क्यों है? मेरा मानना है कि यह सब गवर्नमेंट फेल्योर के कारण है। इसके लिए कुछ राजनितिक व्यापारी जिम्मेदार है। उनके खिलाप करवाई करनी चाहिए। लेकिन दुखद की इसे आम जनता झेल रही है और कुछ नौटंकीबाज जबरदस्ती की भक्ति दिखा रहे है और कह रहे है की कश्मीरियों को गोली मार देना चाहिए। टैग और सर्टिफिकेट बांटने वाले इन चोचलेबाजों को राजनितिक नौटंकी करने के जगह समाधान पर ध्यान देना चाहिए कि उनको ऐसा न करना पड़े और कश्मीर में अमन-चैन रहे। आम कश्मीरियों को छर्रे या गोली मारने से समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। सरकार को चाहिए की इसपर गम्भीरता से विचार करे और "स्थाई समाधान" निकाले। जिसमे आम जनता की भलाई है, हमारे देश की रक्षा करने वाले वीरों की भलाई है और हमारे देश की भलाई है।
Saturday, 9 July 2016
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Monday, 16 May 2016
आजमगढ़ पुरे प्रदेश में प्रथम स्थान पर
बधाई हो !!!!!!
आजमगढ़ के होनहारों ने अपना लोहा मनवा दिया।
यूपी बोर्ड 2016 हाईस्कूल के रिजल्ट में, जिला स्तरीय मेरिट के आधार पर आजमगढ़ 95.12% के साथ पुरे प्रदेश में प्रथम स्थान पर है।
अब ये इंटर के बाद किस यूनिवर्सिटी के हिस्सा बनेंगे? इनमें जो इकोनोमिकली वीक होंगे उनका क्या होगा?
सरकार से अनुरोध है कि आजमगढ़ के इन टैलेंट्स को रौदें नहीं, इनके टैलेंट पर रहम करे। ये आजमगढ़ के ही नहीं, उत्तर प्रदेश के ही नहीं, देश के भविष्य है। यहाँ अतिशीघ्र एक यूनिवर्सिटी का निर्माण करवाए।
आजमगढ़ के होनहारों ने अपना लोहा मनवा दिया।
यूपी बोर्ड 2016 हाईस्कूल के रिजल्ट में, जिला स्तरीय मेरिट के आधार पर आजमगढ़ 95.12% के साथ पुरे प्रदेश में प्रथम स्थान पर है।
अब ये इंटर के बाद किस यूनिवर्सिटी के हिस्सा बनेंगे? इनमें जो इकोनोमिकली वीक होंगे उनका क्या होगा?
सरकार से अनुरोध है कि आजमगढ़ के इन टैलेंट्स को रौदें नहीं, इनके टैलेंट पर रहम करे। ये आजमगढ़ के ही नहीं, उत्तर प्रदेश के ही नहीं, देश के भविष्य है। यहाँ अतिशीघ्र एक यूनिवर्सिटी का निर्माण करवाए।
Saturday, 14 May 2016
आजमगढ़ में विश्वविद्यालय की मांग किसका हिस्सा?
आजमगढ़ में विश्वविद्यालय की मांग को उत्तर प्रदेश सूबे की सरकार स्वीकार नहीं कर रही है। सरकार मनमानी पूर्ण तर्क देकर कहती है कि आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाया जाना प्रासंगिक नहीं है। सूबे की सरकार को मैं बता देना चाहता हूँ कि आजमगढ़ में विश्वविद्यालय, निरर्थक अलंकरण का हिस्सा नहीं है। यह बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का हिस्सा है। यह गरीबों और उच्च शिक्षा से बंचित लोगो को हक दिलाने का हिस्सा है। यह ग्रामीण छात्राएं जो कुछ कारणों से उच्च शिक्षा के लिए जनपद से बहार नहीं जा पाती उनको मौका देने का हिस्सा है। फिर भी सूबे की सरकार को लगता है कि आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाया जाना प्रासंगिक नहीं है तो मैं शिक्षा मंत्री यु पी, मुख्यमंत्री यु पी और पुरे उत्तर प्रदेश सरकार को चैलेन्ज करता हूँ कि वे कभी भी आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाए जाने की प्रासंगिकता पर बात कर सकते है, बहस कर सकते है, संवाद कर सकते है।
हम लेकर रहेंगे ........विश्वविद्यालय
आजमगढ़ में ........विश्वविद्यालय
हम लेकर रहेंगे ........विश्वविद्यालय
आजमगढ़ में ........विश्वविद्यालय
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