Friday, 25 May 2018

सामाजिक न्याय के योद्धा चंद्रजीत यादव: एक असाधारण व्यक्तित्व

सामाजिक न्याय के योद्धा भूतपूर्व सांसद, भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री और किसानों, मजदूरों, मजलूमों की आवाज आदरणीय श्री चंद्रजीत यादव जी की पुर्णतिथि पर हम श्रद्धांजलि-श्रद्धा-सुमन अर्पित करते है। यह सर्वविदित है कि आजमगढ़ अपने अतीत में समाजवादी और मार्क्सवादी विचारधारा का गढ़ रहा है और आज भी है। इस वैचारिक गढ़ को परिपक़्व बनाने में श्री चंद्रजीत जी का अमूल्य योगदान रहा है।

डॉ राम समुझ जी (IRS) ने अपनी पुस्तक "Reservation Policy: Its relevance in modern India" में चंद्रजीत जी की पुस्तक "आरक्षण क्यों" (why reservation?) का सन्दर्भ देते हुए लिखें है कि
Chandrajeet Yadav, a former Union Minister pointed out the reasons for better administration in the states of Tamilnadu, Karnataka and Kerala than that of UP, Bihar and M.P. saying that they implementaed the reservation policy in the beginning of 19th century much earlier than Hindi states and quantum of their reservation are about 68%.*

*Yadav, Chandrajeet – Arkshan kyo (why reservation?), Samajik Nyay Kendra, New Delhi, Pp. 10-11

यह पुस्तक अभी लोक-अनुक्षेत्र में नहीं है। मुझे नहीं पता कि इसमें क्या लिखा है लेकिन चंद्रजीत जी के द्वारा संसद में उठाये गए सवालों, उनके द्वारा किये गए बहस से थोड़ा-बहुत परिचित हूँ और इसके आलावा उनके द्वारा लड़े गए सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई से भी कुछ परिचित हूँ। इस आधार पर मुझे उम्मीद है कि 'आरक्षण' पर जिन सवालों का जबाब आज हम ढूढ़ रहे है, शायद वे इस पुस्तक में हमें मिले।

सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे जिम्मेदार लोगों से मैं अपील करता हूँ कि इस पुस्तक का पुनर्प्रकाशन करवायें और इसके आलावा इनकी दूसरी लेखनी को भी लोक-अनुक्षेत्र में लाएं। इनके (चंद्रजीत जी के) भाषणों जो लिखित, आडियो या वीडियो रूप में हो उन्हें संकलित करके प्रकाशित करवाया जाय। अगर ऐसा होता है तो हम सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले एक असाधारण व्यक्तित्व को फिर से जीवित कर पायेंगे।

साभार 
हथौटवी पहल 

Friday, 17 November 2017

अन्य पिछड़े वर्ग को रिलैक्सेशन

अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण वैधानिक रूप से परिभाषित होने के बाद डीओपीटी ने एक ओएम निकाला जिसमे कहा गया था कि वे स्वायत्त निकाय/संस्था जो सरकार से अनुदान प्राप्त करती है, अपने संविधियों और अनुच्छेदों में स्टैण्डर्ड में रिलैक्सेशन जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति को उपलब्ध कराती थी वह रिलैक्सेशन अब अन्य पिछड़े वर्ग को भी दिया जायेगा। 2009 में डीओपीटी ने एक ओएम लेटर में यह भी कहा था कि यह संज्ञान में आया है कि कुछ स्वायत्त निकायों/संस्थाओ ने अपने संविधियों और अनुच्छेदों में इसके लिए उपयुक्त प्रावधान नहीं किये है। डीओपीटी ने सभी मंत्रालयों और विभागों से निवेदन किया था कि वे यह सुनिश्चित करें कि सभी स्वायत्त निकायों/संस्थाओ के संविधियों और अनुच्छेदों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए ऐसे प्रावधान कर्तव्यनिष्ठा पूर्वक कार्यान्वित किये जा रहे है।
सवाल ये है कि आज वर्षों बाद भी सरकार से अनुदान प्राप्त करने वाले अधिकांश स्वायत्त निकायों/संस्थाओ में इसका सही तरीके से अनुसरण नहीं हो रहा है। यह बात सम्बंधित आयोगों और मंत्रालयों को पता है कि अधिकांश जगह पर रिजर्वेशन/रिलैक्सेशन/कंसेशन का किसी न किसी रूप में उलंघन हो रहा है फिर भी वे हाथ पर हाथ धरे बैठे है। हालांकि इसका उलंघन करने वाली संस्थान के विरुद्ध दंडात्मक प्रावधान भी बने है फिर भी यह बिमारी ला-इलाज बनी हुई है। यह बीमारी तब तक ठीक नहीं होगी जब तक कि सामाजिक न्याय के योद्धा इस मुद्दे पर खामोस बने रहेंगे। पुरे देश के सभी स्वायत्त निकायों/संस्थाओ में सही और प्रभावी तरीके से इसे लागू करवाने के लिए सड़क से संसद तक लड़ाई की जरुरत है।

Sunday, 29 October 2017

विश्व गरीबी उन्मूलन दिवस


आज #विश्व_गरीबी_उन्मूलन_दिवस है। पिछले दिनों #ग्लोबल_हंगर_इंडेक्स आया था। जिसमे भारत दुनिया के सबसे ख़राब हालत में रह रहे बीस देशों में से एक है। आज सरकार, संस्थान, इंटेलेक्चुअल, रिसर्चर, एक्टिविस्ट, नेता, मीडिया, सोसल मीडिया ...... समेत हर वर्ग को इस मुद्दे पर पुरजोर बहस करनी चाहिए थी। समीक्षा करनी चाहिए थी। हर दृष्टिकोण से तहक़ीक़ात करनी चाहिए थी कि गरीबी उन्मूलन पर क्या हुआ है? क्या हो रहा है? क्या किया जाना चाहिए? लेकिन हैरत की बात है कि आज की ज्वलंत बहस मुहब्बत के किले पर चल रही है कि वह पर्यटक स्थल है या नहीं। सही मायने में यह बहस तो होनी ही नहीं चाहिए, अगर हो रही है तो यह विशुद्ध बेवकूफी है। विश्व गरीबी उन्मूलन दिवस पर सरकार और संस्थाओ का खामोश होना गैर गाम्भीर्यता को दर्शाता है। #विश्व_योग_दिवस मनाने में सरकार करोडो रूपये विज्ञापन में खर्च कर देती है। महीनों पहले से तैयारियां शुरू हो जाती है। सरकार योग दिवस पर जितना ध्यान देती है अगर उतना ध्यान गरीबी उन्मूलन दिवस पर देती तो भारत की भूखमरी को "राष्ट्रीय तमाचा" या "राष्ट्रीय शर्म" जैसे असहनीय पीड़ादायक शब्दों से नहीं नवाजा जाता। भारत की यह शर्मनाक हालात मानवीय शून्यता को दर्शाता है।

Monday, 12 June 2017

एमफिल/पीएचडी में दाखिला के लिए दोहरा मापदंड क्यों?

भारत के राजपत्र, भाग-3 , खंड-4 , जो 5  मई 2016 को प्रकाशित हुआ के धारा 2 और 3 के उप  धारा 2.1, 2.2 और 3.1, 3.2 के तहत ऍमफील/पीएचडी में दाख़िला लेने के लिए स्नातकोत्तर उपाधि  या उसके समतुल्य में कम से कम 55% अंक या इसके समकक्ष ग्रेड प्राप्त हो। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जन जाति/अन्य पिछड़ा वर्ग (गैर लाभान्वित श्रेणी) को 5% की छूट या ग्रेड में समतुल्य छूट प्रदान की जाएगी। यूजीसी द्वारा बनाया गया यह प्रतिमान भारत में पढ़ने वाले छात्रों के लिए है।  भारत के बाहर अर्थात विदेश में पढ़ने वाले भारतीयों के अलग प्रतिमान है। उनके लिए, विदेशी शैक्षणिक संस्थान से स्नातकोत्तर उपाधि  या उसके समतुल्य की उपाधि प्राप्त की हो जो ऐसे किसी सांविधिक प्राधिकरण द्वारा या ऐसे एक प्राधिकरण के अंतर्गत स्वीकृत एवं प्रत्यायित है जो कि उस देश में किसी कानून के अंतर्गत स्थापित अथवा निगमित हो। अब सवाल यह है कि कोई छात्र भारत के टॉप शैक्षणिक संस्थान में पढ़ता हो जो गुणवत्ता एवं मानकों को सुनिश्चित करने एवं उनके आकलन, प्रत्यायन हेतू सांविधिक प्राधिकरण के अंतर्गत स्वीकृत एवं प्रत्यायित है। जो कि भारत के कानून के अंतर्गत स्थापित एवं निगमित है। उसके लिए परास्नातक में 55% का बैरियर और विदेश में पढ़ने वाले छात्रों के लिए सिर्फ स्नातकोत्तर या उसके समतुल्य की उपाधि। उनके लिए कोई पर्सेंटेज बैरियर नहीं। आख़िर ऐसा दोहरा मापदंड क्यों? क्योंकि विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्र इलीट क्लास के होते है। ये बड़े-बड़े नेता, आढ़तिया नौकरशाह, बड़े-बड़े बिजनेसमैन या लाख में हर महीने तनख्वाह उठाने वाले प्रोफ़ेसर्स के बेटे-बेटियाँ होती है। इसलिए उनको परास्नातक के प्रतिशतता में छूट मिलती है और भारत में पढ़ने वाले छात्रों के लिए प्रतिशतता का बैरियर इस लिए लगाया जाता है कि वंचित तपका और रिमोट (सुदूरवर्ती) और शैक्षणिक रूप से पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों  को शोध में दाख़िला लेने से रोका जा सके। एक कोर्स में दाख़िला के लिए ये दोहरा मापदंड न्याय संगत नहीं है। यह नियम पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों  को अप्रत्यक्ष रूप से उच्तम शिक्षा से वंचित करने का एक शातिर प्रयास सिद्ध हो रहा है।  अगर रिमोट (सुदूरवर्ती) और शैक्षणिक रूप से पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के छात्र शोध कार्य से वंचित रहे तो सामाजिक न्याय की आधारशिला एक अपूर्ण स्वप्न बन कर रह जाएगी।  सरकार के कानून निर्माताओं को चाहिए कि वे भारत में पढ़ने वाले छात्रों को भी परास्नातक या समकक्ष की उपाधि प्राप्त करना ही ऍमफील/पीएचडी की न्यूनतम योग्यता सुनिश्चित करें।

Friday, 21 April 2017

अम्बेडकर जयंती: बदलाव का नया दौर

जय भीम, जय समाजवाद साथियों-

यह बेहद संतुष्टि प्रदाता पल होते है जब हम किसी ऐसे शख्शियत को और उसके विचारों को याद कर रहे होते है जिसने इंसानियत कायम करने के लिए पुरे ज़माने से, पुरे जोश के साथ लडा। ये सिर्फ लड़े ही नहीं, प्रतिद्वंदियों को पछाड़े भी जिसका असर सिर्फ उसी समय नहीं दिखा बल्कि आज-तक दिख रहा है और यह आज-कल के आलावा परसों-नरसों-बरसों तक दिखता रहेगा। उस समय मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विद्यार्थी हुआ करता था और केo पीo युo सीo छात्रावास का अंतेवासी था। इस छात्रावास में अम्बेडकर जयंती नहीं मनाई जाती थी और इलाहाबाद में ही नहीं, तक़रीबन पुरे युपी में कदाचित जगहों पर ही अम्बेडकर जयंती मनाई जाती थी। लेकिन छात्रावास में  धार्मिक त्यौहार और यहाँ तक की अखण्ड रामायण और गीता के पाठ कभी कभी कराये जाते थे। वह इस दशक का शुरूआती दौर था जब अम्बेडकर जयंती के दिन हम आपस में डिस्कस किया करते थे कि आज का कोई अख़बार उठा कर देख लीजिये जिस तरह से जवाहर लाल नेहरू, महात्मा गांधी, आदि लोगों के जयंती या पुण्यतिथि पर जो स्थान उनको न्यूज पेपर में मिलता है वो स्थान अम्बेडकर जयंती या पुण्यतिथि पर अम्बेडकर जी को नहीं मिलता। कुछ अखबारों में सरकारी विज्ञापन आ जाते थे लेकिन मीडिया रिपोर्टिंग कुछ खास नहीं होती थी। मेरे बैच ने इसकी (अम्बेडकर जयंती) शुरुवात करने का निर्णय लिया। कुछ लोगो का सहयोग मिला और कुछ लोग इससे संतुष्ट नहीं थे। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हमारे बैच ने इसे मनाया। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये हालात इक्कीशवी शदी के एक दशक बाद था।  उस समय हम लोगों के डिस्कस के निष्कर्ष हुआ करते थे कि सरकार को चाहिए कि अम्बेडकर जयंती और संविधान दिवस मनाना सभी स्कूलों और कालेजों में मैंडेट्री कर दे।  उसके बाद करीब 2013-14 में अम्बेडकर पर डिस्कोर्स शुरू हुआ; जिसका बाद में इसका बड़े स्तर पर राजनीतिकरण हुआ और आज विशेषज्ञ यह कह रहे है कि 20वी सदी गाँधी की थी और 21वी सदी अम्बेडकर की होगी। अब बाबा साहेब की जयंती बड़े स्तर पर मनाते देख हर्ष से पूर्ण हो रहा हूँ। अगर एक्टिविजम का ये दौर ऐसे ही चालू रहा तो अगले दशक में एक बड़ी सामाजिक क्रांति आ सकती है जो जातीय आधार पर ऊँच - नीच की हाइरार्की को ध्वस्त करने में बड़े स्तर पर सफल होगी। 


Wednesday, 5 April 2017

उच्च शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण


.......हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

साथियों,
 सर्व प्रथम मैं यह स्पष्ठ कर दूं कि मेरा यह राइटिंग किसी संगठन के खिलाप नहीं है। किसी विचारधारा के विरुद्ध नहीं है। मेरा प्रयास है, हुकूमते-हिन्द का ध्यान इस ओर आकृष्ट करना।

जैसा कि यह सर्वविदित है कि आजाद भारत सातवें दशक के उत्तरार्ध में है लेकिन हैरत की बात है कि आज तक हमारा संविधान पूरी तरह से जमीनी स्तर पर इम्प्लीमेंट नहीं हो पाया है। अगर मैं बात करू भारत के "केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान " (वे चाहे यूनिवर्सिटी हो या नेशनल इंट्रेस्ट के इंस्टिट्यूशन)  की तो वहाँ भी कुछ ऐसे संस्थान आज भी मिलेंगे जहाँ पर भारत सरकार की रिजर्वेशन पालिसी पूरी तरह से इम्प्लीमेंट नहीं हो पायी है। इसलिए, उच्च शैक्षणिक संस्थानों के सरकारिया-साहबजादों को इसपर विशेष ध्यान देना चाहिए।

मैं, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ बिहार और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च पुणे (IISER) का उदहारण दे रहा हूँ। <https://www.cucet2017.co.in/PDF/EligibilityCriteria/CUSBR%20Eligibility%20Criteria-CUCET2017.pdf>

<http://www.iiserpune.ac.in/admissions/int-phd-programme>

यहाँ पर एडमिशन के लिए नोटिफिकेशन आया है और ओबीसी (नान-क्रीमीलेयर) के लिए रिजर्वेशन इम्प्लीमेंट नहीं हुआ है।

 मैं, आपका ध्यान भारत के राजपत्र, भाग-1, खंड-1, जो 22 दिसंबर 2011 को प्रकाशित हुआ, और भारत के राजपत्र, भाग-1, खंड-1, जो 20 अप्रैल 2008 को प्रकाशित हुआ, पर आकृष्ट करना चाहता हूँ।, जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, और अन्य पिछड़े वर्ग को  केंद्रीय शैक्षणिक संस्थाओ में दाखिले में आरक्षण उपलब्ध कराता है। मैं, इस देश के सामजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ों की आवाज बनकर एचआरडी मंत्रालय, भारत सरकार से यह अपील करता  हूँ कि भारत के संविधान की आत्मा का सम्मान करते हुए, देश के सभी केंद्रीय शैक्षणिक संस्थाओ (जो केंद्र सरकार द्वारा स्थापित, अनुरक्षित अथवा सहायता प्रदत्त है) में रिजर्वेशन लागू करवाना सुनिश्चित करें।



















Sunday, 12 February 2017

एमo फिल/पीo एचडी में दाखिला देने का अनम्य कानून

भारत में उच्च शिक्षण संस्थानों को गाइड करने के लिए बनाया गया विश्वविद्यालय अनुदान आयोग आज कल अनपढो जैसी हरकत करने लगा है। यह आयोग 5 जुलाई 2016 को प्रकाशित राजपत्र के क्लॉज 5 के सब-क्लॉज 5.4 में कहता है कि उच्च शिक्षण संस्थान M.Phil/Ph.D में अभियर्थियों को द्वि-चरणीय प्रक्रिया के माध्यम से दाखिला देंगे। लेकिन यह आयोग अपने उसी राजपत्र में त्रि-चरणीय प्रक्रिया के माध्यम से M.Phil/Ph.D में दाखिला देने का अनम्य कानून बनाया है। पहला प्रतिमान अर्थात पहला चरण परास्नातक में 50-55% . दूसरा प्रतिमान लिखित परीक्षा और तीसरा प्रतिमान इंटरव्यू। इस तरह से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अपने ही वक्तव्य का खंडन कर रहा है; मतलब वह कह कुछ रहा है और कर कुछ रहा है। M.Phil/Ph.D में एडमिशन के लिए सिर्फ दो प्रतिमान ही होने चाहिए।  पहला प्रतिमान लिखित परीक्षा और दूसरा प्रतिमान इंटरव्यू। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को तीसरे प्रतिमान को तत्काल प्रभाव से समाप्त करना चाहिए क्योंकि शोध कार्य के लिए ऐसे प्रतिमान की कोई प्रासंगिकता नहीं है। 

इनकी, देश-द्रोहिता पर आवाज नहीं उठती

"हिंदुस्तान - मुर्दाबाद", "भारत के बर्बादी तक - जंग रहेगी, जंग रहेगी" यह नारा दिया गया जो देश के लिए शर्म की बात है। हमारी असहमति देश की प्रशासनिक व्यवस्था से हो सकती है। हमारी असहमति देश की कानून व्यवस्था से हो सकती है। हमारी असहमति देश की गद्दार नेताओ से हो सकती है। हमारी असहमति देश के उन तमाम लोगो/संस्थाओ से भी हो सकती है जो लोग आधिकारिक रूप से सिस्टम में रह कर, देश का आगे बढ़ाने के नाम पर देश को लात मार रहे है। देश को लूट रहे है। जो देश को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बर्बाद कर रहे है, इन तमाम लोगो से हमारी असहमति है। लेकिन हमारे इस असहमति का मतलब ये नहीं होना चाहिए कि हम जिसके लिए लड़ रहे है, उसी का मुर्दाबाद करने लगे। वैसे जे एन यू के छात्रों को ऐसा क्यों करना पड़ा यह विचार का मुद्दा होना चाहिए। लेकिन सवाल ये है की सिर्फ वही देश द्रोही के श्रेणी में क्यों है? क्या दंगे कराने वाले देश द्रोही के श्रेणी में नहीं आते? इनको देश से निकालने का कथित-वीजा कोई नहीं देता। इनकी देश-द्रोहिता पर आवाज नहीं उठती है. ऐसे पक्षपातीय राष्ट्र भक्ति पर भी लानत होनी चाहिए। इस पर विचार करने के जगह राजनीति करने वालो तुम पर शर्म है।

Tuesday, 27 December 2016

पटाकिया मनोरंजन और दुस्वारियां

पुणे स्थित चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन ने अपने रिसर्च में पाया कि 1 अनार बम  34 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाता है। एक फुलझड़ी 74 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाती है। 1 पुलपुल बम 208 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाता है। 1 स्नैक टैवलेट बम 464 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाता है। इस  रिसर्च फाउंडेशन ने यह भी बताया था कि दिवाली के दिन भारत में 20 गुना प्रदुषण फैलता है। जरा सोचिये, हमारे पल भर के मनोरंजन की कीमत पर प्रकृति को यह नुक़सान चुकानी पड़ती है। इतना ही नहीं;  इन पटाकों की वजह से अनगिनत पक्षियां मौत के मुंह में समां जाती है। इसलिए हमें पटाका से होने वाली इन दुस्वारियों से बचना चाहिए और पटाखे नहीं जलाना चाहिए।

पुरे देश और पूरी दुनिया में सेलिब्रेट होने वाला न्यू ईयर, इस पर भी कुछ लोगों अपने छड़ भर के मनोरंजन के लिए पटाका जलाते है। इसका खामियाज़ा प्रकृति को उठाना पड़ता है। हमें प्रकृति को सतत स्वस्थ्य रखने के लिए मनोरंजन के इस तरीके को तिलांजलि कर मनोरंजन के अन्य तरीकों को अख़्तियार में लाना चाहिए। जो इन्वॉयरमेंट फ्रेंडली हो।

एक विशेष अपील और,  कुछ खास तौर के भाई लोग से और आज-कल (खास तौर पे शहरों में) इसमें कुछ बहन जी भी इन्वोल्व है। जो नये साल पे टन्न हो जाते/जाती है। आपकी वजह से ३१ दिसंबर की रात में एक्सीडेंट की घटनाएं बहुत बढ़ जाती है। इतना ही नहीं झगड़ा - फसात की संख्या भी बढ़ जाती है। आप तो खुद ध्वस्त होते ही है, कई बार एक सही व्यक्ति भी बिना गलती किये आपके बेवकूफियों का शिकार हो जाता है। इसलिए आप जैसे धुरन्धारों से विशेष अपील है कि आप इन नौटंकियों के भविष्यगामी परिणाम के मद्दे नजर अपने मनोरंजन के साधनों को अख्तियार में लाएंगे।

रघु द्वारा जनहित में जारी ........

Tuesday, 20 December 2016

जो शिक्षा बाहर में दी गई है वो व्यवस्था यहाँ पर हो

ये आजमगढ़ में लालगंज लोकसभा क्षेत्र से सांसद श्रीमती नीलम सोनकर जी का वक्तव्य चुनाव प्रचार  के समय का है। आप भी जानिए साहिबा ने क्या कहा था।

"....... लालगंज लोकसभा के, जो शिक्षा की व्यवस्था न होने के कारण लोग बाहर जाते है। चाहे वो लखनऊ जाये, बी एच यू जाये, दिल्ली जाये या कही भी जाये लेकिन शिक्षा के अभाव में उनको बाहर जाना पड़ता है। तो मैं चाहूंगी अगर मुझे ऐसा अवसर मिलता है तो यहाँ पर, जो शिक्षा बाहर में व्यवस्था दी गई है वो व्यवस्था यहाँ पर हो। ताकि यहाँ पर बच्चे बाहर जाकर न पढ़े।"

साहिबा के इस बात से हम बिल्कुल सहमत है और शायद पूरा आजमगढ़ सहमत है कि हां ये सही कह रही है। और इससे आजमगढ़ के ब्रेन ड्रेन को रोकने में मदद मिलेगी। इन्होंने फिर आगे ये भी कहा कि

"....... मैं चाहूंगी यहाँ पर जीतनी भी महिलाएं है और बालिका है, उन सबको उच्च शिक्षा प्राप्त हो और उच्च शिक्षा प्राप्त होने की वजह से वे जागरूक हो जाएँगी और अपने अधिकार को समझ सकेंगी कि सरकार ने उनके लिए क्या-क्या अधिकार दिया है और जब अधिकार अपना जान लेंगी तो वे एक जुट होकर, एक मत होकर, एक दिशा में काम करेंगी।"

बतौर महिला प्रत्यासी, महिलाओ की जरुरत बखूबी बतायीं थी। यह एक मजबूत इसारा था आजमगढ़ के विकास के लिए। उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि

"...... इस सब, जो मैं कर सकूँ अपने सरकार के सामने वो बात रखूं ताकि यहाँ कि समस्या जब वहाँ रखूंगी तो सुनी जाएगी और यहाँ का विकास कार्य होगा।"

सांसद महोदया से आजमगढ़ में विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में #विश्वविद्यालय_अभियान कई बार संपर्क किया और इस जरुरत की ओर ध्यान आकर्षित किया। मैं खुद सांसद जी से आजमगढ़ में विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में बात किया। सांसद महोदया ने कहा,

"हां आप लोगों की मांग तो बिल्कुल सही है और मैं इसका पूरा समर्थन करती हूँ। राज्य सरकार को यहाँ एक विश्वविद्यालय देना चाहिए। लेकिन मैं इसमें क्या कर सकती हूँ? आप बताइये मुझसे क्या चाहते है?"

 मैंने उनसे आग्रह किया कि,

 "मैडम हम सरकार से मांग कर रहे है और सूबे की सरकार हमारी बात नहीं सुन रही है। आप सरकार से बात कर सकती है। आप सीo एमo को लेटर लिख सकती है। तो शायद आजमगढ़ को विश्वविद्यालय मिल जाय। इसके बाद सांसद महोदया ने आश्वासन दिया ठीक है, अभी तो मैं दिल्ली में हूँ लेकिन सरकार से बात करुँगी।" और आज तक बात होती रही .........

आजमगढ़ को विश्वविद्यालय न मिलने तक संघर्ष जारी रहेगा ......

राघवेंद्र यादव
विश्वविद्यालय अभियान


you may listen from mentioned link

https://www.youtube.com/watch?v=N-dNwIsS7kg