Monday, 12 June 2017

एमफिल/पीएचडी में दाखिला के लिए दोहरा मापदंड क्यों?

भारत के राजपत्र, भाग-3 , खंड-4 , जो 5  मई 2016 को प्रकाशित हुआ के धारा 2 और 3 के उप  धारा 2.1, 2.2 और 3.1, 3.2 के तहत ऍमफील/पीएचडी में दाख़िला लेने के लिए स्नातकोत्तर उपाधि  या उसके समतुल्य में कम से कम 55% अंक या इसके समकक्ष ग्रेड प्राप्त हो। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जन जाति/अन्य पिछड़ा वर्ग (गैर लाभान्वित श्रेणी) को 5% की छूट या ग्रेड में समतुल्य छूट प्रदान की जाएगी। यूजीसी द्वारा बनाया गया यह प्रतिमान भारत में पढ़ने वाले छात्रों के लिए है।  भारत के बाहर अर्थात विदेश में पढ़ने वाले भारतीयों के अलग प्रतिमान है। उनके लिए, विदेशी शैक्षणिक संस्थान से स्नातकोत्तर उपाधि  या उसके समतुल्य की उपाधि प्राप्त की हो जो ऐसे किसी सांविधिक प्राधिकरण द्वारा या ऐसे एक प्राधिकरण के अंतर्गत स्वीकृत एवं प्रत्यायित है जो कि उस देश में किसी कानून के अंतर्गत स्थापित अथवा निगमित हो। अब सवाल यह है कि कोई छात्र भारत के टॉप शैक्षणिक संस्थान में पढ़ता हो जो गुणवत्ता एवं मानकों को सुनिश्चित करने एवं उनके आकलन, प्रत्यायन हेतू सांविधिक प्राधिकरण के अंतर्गत स्वीकृत एवं प्रत्यायित है। जो कि भारत के कानून के अंतर्गत स्थापित एवं निगमित है। उसके लिए परास्नातक में 55% का बैरियर और विदेश में पढ़ने वाले छात्रों के लिए सिर्फ स्नातकोत्तर या उसके समतुल्य की उपाधि। उनके लिए कोई पर्सेंटेज बैरियर नहीं। आख़िर ऐसा दोहरा मापदंड क्यों? क्योंकि विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्र इलीट क्लास के होते है। ये बड़े-बड़े नेता, आढ़तिया नौकरशाह, बड़े-बड़े बिजनेसमैन या लाख में हर महीने तनख्वाह उठाने वाले प्रोफ़ेसर्स के बेटे-बेटियाँ होती है। इसलिए उनको परास्नातक के प्रतिशतता में छूट मिलती है और भारत में पढ़ने वाले छात्रों के लिए प्रतिशतता का बैरियर इस लिए लगाया जाता है कि वंचित तपका और रिमोट (सुदूरवर्ती) और शैक्षणिक रूप से पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों  को शोध में दाख़िला लेने से रोका जा सके। एक कोर्स में दाख़िला के लिए ये दोहरा मापदंड न्याय संगत नहीं है। यह नियम पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों  को अप्रत्यक्ष रूप से उच्तम शिक्षा से वंचित करने का एक शातिर प्रयास सिद्ध हो रहा है।  अगर रिमोट (सुदूरवर्ती) और शैक्षणिक रूप से पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के छात्र शोध कार्य से वंचित रहे तो सामाजिक न्याय की आधारशिला एक अपूर्ण स्वप्न बन कर रह जाएगी।  सरकार के कानून निर्माताओं को चाहिए कि वे भारत में पढ़ने वाले छात्रों को भी परास्नातक या समकक्ष की उपाधि प्राप्त करना ही ऍमफील/पीएचडी की न्यूनतम योग्यता सुनिश्चित करें।

Friday, 21 April 2017

अम्बेडकर जयंती: बदलाव का नया दौर

जय भीम, जय समाजवाद साथियों-

यह बेहद संतुष्टि प्रदाता पल होते है जब हम किसी ऐसे शख्शियत को और उसके विचारों को याद कर रहे होते है जिसने इंसानियत कायम करने के लिए पुरे ज़माने से, पुरे जोश के साथ लडा। ये सिर्फ लड़े ही नहीं, प्रतिद्वंदियों को पछाड़े भी जिसका असर सिर्फ उसी समय नहीं दिखा बल्कि आज-तक दिख रहा है और यह आज-कल के आलावा परसों-नरसों-बरसों तक दिखता रहेगा। उस समय मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विद्यार्थी हुआ करता था और केo पीo युo सीo छात्रावास का अंतेवासी था। इस छात्रावास में अम्बेडकर जयंती नहीं मनाई जाती थी और इलाहाबाद में ही नहीं, तक़रीबन पुरे युपी में कदाचित जगहों पर ही अम्बेडकर जयंती मनाई जाती थी। लेकिन छात्रावास में  धार्मिक त्यौहार और यहाँ तक की अखण्ड रामायण और गीता के पाठ कभी कभी कराये जाते थे। वह इस दशक का शुरूआती दौर था जब अम्बेडकर जयंती के दिन हम आपस में डिस्कस किया करते थे कि आज का कोई अख़बार उठा कर देख लीजिये जिस तरह से जवाहर लाल नेहरू, महात्मा गांधी, आदि लोगों के जयंती या पुण्यतिथि पर जो स्थान उनको न्यूज पेपर में मिलता है वो स्थान अम्बेडकर जयंती या पुण्यतिथि पर अम्बेडकर जी को नहीं मिलता। कुछ अखबारों में सरकारी विज्ञापन आ जाते थे लेकिन मीडिया रिपोर्टिंग कुछ खास नहीं होती थी। मेरे बैच ने इसकी (अम्बेडकर जयंती) शुरुवात करने का निर्णय लिया। कुछ लोगो का सहयोग मिला और कुछ लोग इससे संतुष्ट नहीं थे। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हमारे बैच ने इसे मनाया। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये हालात इक्कीशवी शदी के एक दशक बाद था।  उस समय हम लोगों के डिस्कस के निष्कर्ष हुआ करते थे कि सरकार को चाहिए कि अम्बेडकर जयंती और संविधान दिवस मनाना सभी स्कूलों और कालेजों में मैंडेट्री कर दे।  उसके बाद करीब 2013-14 में अम्बेडकर पर डिस्कोर्स शुरू हुआ; जिसका बाद में इसका बड़े स्तर पर राजनीतिकरण हुआ और आज विशेषज्ञ यह कह रहे है कि 20वी सदी गाँधी की थी और 21वी सदी अम्बेडकर की होगी। अब बाबा साहेब की जयंती बड़े स्तर पर मनाते देख हर्ष से पूर्ण हो रहा हूँ। अगर एक्टिविजम का ये दौर ऐसे ही चालू रहा तो अगले दशक में एक बड़ी सामाजिक क्रांति आ सकती है जो जातीय आधार पर ऊँच - नीच की हाइरार्की को ध्वस्त करने में बड़े स्तर पर सफल होगी। 


Wednesday, 5 April 2017

उच्च शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण


.......हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

साथियों,
 सर्व प्रथम मैं यह स्पष्ठ कर दूं कि मेरा यह राइटिंग किसी संगठन के खिलाप नहीं है। किसी विचारधारा के विरुद्ध नहीं है। मेरा प्रयास है, हुकूमते-हिन्द का ध्यान इस ओर आकृष्ट करना।

जैसा कि यह सर्वविदित है कि आजाद भारत सातवें दशक के उत्तरार्ध में है लेकिन हैरत की बात है कि आज तक हमारा संविधान पूरी तरह से जमीनी स्तर पर इम्प्लीमेंट नहीं हो पाया है। अगर मैं बात करू भारत के "केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान " (वे चाहे यूनिवर्सिटी हो या नेशनल इंट्रेस्ट के इंस्टिट्यूशन)  की तो वहाँ भी कुछ ऐसे संस्थान आज भी मिलेंगे जहाँ पर भारत सरकार की रिजर्वेशन पालिसी पूरी तरह से इम्प्लीमेंट नहीं हो पायी है। इसलिए, उच्च शैक्षणिक संस्थानों के सरकारिया-साहबजादों को इसपर विशेष ध्यान देना चाहिए।

मैं, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ बिहार और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च पुणे (IISER) का उदहारण दे रहा हूँ। <https://www.cucet2017.co.in/PDF/EligibilityCriteria/CUSBR%20Eligibility%20Criteria-CUCET2017.pdf>

<http://www.iiserpune.ac.in/admissions/int-phd-programme>

यहाँ पर एडमिशन के लिए नोटिफिकेशन आया है और ओबीसी (नान-क्रीमीलेयर) के लिए रिजर्वेशन इम्प्लीमेंट नहीं हुआ है।

 मैं, आपका ध्यान भारत के राजपत्र, भाग-1, खंड-1, जो 22 दिसंबर 2011 को प्रकाशित हुआ, और भारत के राजपत्र, भाग-1, खंड-1, जो 20 अप्रैल 2008 को प्रकाशित हुआ, पर आकृष्ट करना चाहता हूँ।, जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, और अन्य पिछड़े वर्ग को  केंद्रीय शैक्षणिक संस्थाओ में दाखिले में आरक्षण उपलब्ध कराता है। मैं, इस देश के सामजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ों की आवाज बनकर एचआरडी मंत्रालय, भारत सरकार से यह अपील करता  हूँ कि भारत के संविधान की आत्मा का सम्मान करते हुए, देश के सभी केंद्रीय शैक्षणिक संस्थाओ (जो केंद्र सरकार द्वारा स्थापित, अनुरक्षित अथवा सहायता प्रदत्त है) में रिजर्वेशन लागू करवाना सुनिश्चित करें।



















Sunday, 12 February 2017

एमo फिल/पीo एचडी में दाखिला देने का अनम्य कानून

भारत में उच्च शिक्षण संस्थानों को गाइड करने के लिए बनाया गया विश्वविद्यालय अनुदान आयोग आज कल अनपढो जैसी हरकत करने लगा है। यह आयोग 5 जुलाई 2016 को प्रकाशित राजपत्र के क्लॉज 5 के सब-क्लॉज 5.4 में कहता है कि उच्च शिक्षण संस्थान M.Phil/Ph.D में अभियर्थियों को द्वि-चरणीय प्रक्रिया के माध्यम से दाखिला देंगे। लेकिन यह आयोग अपने उसी राजपत्र में त्रि-चरणीय प्रक्रिया के माध्यम से M.Phil/Ph.D में दाखिला देने का अनम्य कानून बनाया है। पहला प्रतिमान अर्थात पहला चरण परास्नातक में 50-55% . दूसरा प्रतिमान लिखित परीक्षा और तीसरा प्रतिमान इंटरव्यू। इस तरह से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अपने ही वक्तव्य का खंडन कर रहा है; मतलब वह कह कुछ रहा है और कर कुछ रहा है। M.Phil/Ph.D में एडमिशन के लिए सिर्फ दो प्रतिमान ही होने चाहिए।  पहला प्रतिमान लिखित परीक्षा और दूसरा प्रतिमान इंटरव्यू। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को तीसरे प्रतिमान को तत्काल प्रभाव से समाप्त करना चाहिए क्योंकि शोध कार्य के लिए ऐसे प्रतिमान की कोई प्रासंगिकता नहीं है। 

इनकी, देश-द्रोहिता पर आवाज नहीं उठती

"हिंदुस्तान - मुर्दाबाद", "भारत के बर्बादी तक - जंग रहेगी, जंग रहेगी" यह नारा दिया गया जो देश के लिए शर्म की बात है। हमारी असहमति देश की प्रशासनिक व्यवस्था से हो सकती है। हमारी असहमति देश की कानून व्यवस्था से हो सकती है। हमारी असहमति देश की गद्दार नेताओ से हो सकती है। हमारी असहमति देश के उन तमाम लोगो/संस्थाओ से भी हो सकती है जो लोग आधिकारिक रूप से सिस्टम में रह कर, देश का आगे बढ़ाने के नाम पर देश को लात मार रहे है। देश को लूट रहे है। जो देश को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बर्बाद कर रहे है, इन तमाम लोगो से हमारी असहमति है। लेकिन हमारे इस असहमति का मतलब ये नहीं होना चाहिए कि हम जिसके लिए लड़ रहे है, उसी का मुर्दाबाद करने लगे। वैसे जे एन यू के छात्रों को ऐसा क्यों करना पड़ा यह विचार का मुद्दा होना चाहिए। लेकिन सवाल ये है की सिर्फ वही देश द्रोही के श्रेणी में क्यों है? क्या दंगे कराने वाले देश द्रोही के श्रेणी में नहीं आते? इनको देश से निकालने का कथित-वीजा कोई नहीं देता। इनकी देश-द्रोहिता पर आवाज नहीं उठती है. ऐसे पक्षपातीय राष्ट्र भक्ति पर भी लानत होनी चाहिए। इस पर विचार करने के जगह राजनीति करने वालो तुम पर शर्म है।

Tuesday, 27 December 2016

पटाकिया मनोरंजन और दुस्वारियां

पुणे स्थित चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन ने अपने रिसर्च में पाया कि 1 अनार बम  34 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाता है। एक फुलझड़ी 74 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाती है। 1 पुलपुल बम 208 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाता है। 1 स्नैक टैवलेट बम 464 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फैलाता है। इस  रिसर्च फाउंडेशन ने यह भी बताया था कि दिवाली के दिन भारत में 20 गुना प्रदुषण फैलता है। जरा सोचिये, हमारे पल भर के मनोरंजन की कीमत पर प्रकृति को यह नुक़सान चुकानी पड़ती है। इतना ही नहीं;  इन पटाकों की वजह से अनगिनत पक्षियां मौत के मुंह में समां जाती है। इसलिए हमें पटाका से होने वाली इन दुस्वारियों से बचना चाहिए और पटाखे नहीं जलाना चाहिए।

पुरे देश और पूरी दुनिया में सेलिब्रेट होने वाला न्यू ईयर, इस पर भी कुछ लोगों अपने छड़ भर के मनोरंजन के लिए पटाका जलाते है। इसका खामियाज़ा प्रकृति को उठाना पड़ता है। हमें प्रकृति को सतत स्वस्थ्य रखने के लिए मनोरंजन के इस तरीके को तिलांजलि कर मनोरंजन के अन्य तरीकों को अख़्तियार में लाना चाहिए। जो इन्वॉयरमेंट फ्रेंडली हो।

एक विशेष अपील और,  कुछ खास तौर के भाई लोग से और आज-कल (खास तौर पे शहरों में) इसमें कुछ बहन जी भी इन्वोल्व है। जो नये साल पे टन्न हो जाते/जाती है। आपकी वजह से ३१ दिसंबर की रात में एक्सीडेंट की घटनाएं बहुत बढ़ जाती है। इतना ही नहीं झगड़ा - फसात की संख्या भी बढ़ जाती है। आप तो खुद ध्वस्त होते ही है, कई बार एक सही व्यक्ति भी बिना गलती किये आपके बेवकूफियों का शिकार हो जाता है। इसलिए आप जैसे धुरन्धारों से विशेष अपील है कि आप इन नौटंकियों के भविष्यगामी परिणाम के मद्दे नजर अपने मनोरंजन के साधनों को अख्तियार में लाएंगे।

रघु द्वारा जनहित में जारी ........

Tuesday, 20 December 2016

जो शिक्षा बाहर में दी गई है वो व्यवस्था यहाँ पर हो

ये आजमगढ़ में लालगंज लोकसभा क्षेत्र से सांसद श्रीमती नीलम सोनकर जी का वक्तव्य चुनाव प्रचार  के समय का है। आप भी जानिए साहिबा ने क्या कहा था।

"....... लालगंज लोकसभा के, जो शिक्षा की व्यवस्था न होने के कारण लोग बाहर जाते है। चाहे वो लखनऊ जाये, बी एच यू जाये, दिल्ली जाये या कही भी जाये लेकिन शिक्षा के अभाव में उनको बाहर जाना पड़ता है। तो मैं चाहूंगी अगर मुझे ऐसा अवसर मिलता है तो यहाँ पर, जो शिक्षा बाहर में व्यवस्था दी गई है वो व्यवस्था यहाँ पर हो। ताकि यहाँ पर बच्चे बाहर जाकर न पढ़े।"

साहिबा के इस बात से हम बिल्कुल सहमत है और शायद पूरा आजमगढ़ सहमत है कि हां ये सही कह रही है। और इससे आजमगढ़ के ब्रेन ड्रेन को रोकने में मदद मिलेगी। इन्होंने फिर आगे ये भी कहा कि

"....... मैं चाहूंगी यहाँ पर जीतनी भी महिलाएं है और बालिका है, उन सबको उच्च शिक्षा प्राप्त हो और उच्च शिक्षा प्राप्त होने की वजह से वे जागरूक हो जाएँगी और अपने अधिकार को समझ सकेंगी कि सरकार ने उनके लिए क्या-क्या अधिकार दिया है और जब अधिकार अपना जान लेंगी तो वे एक जुट होकर, एक मत होकर, एक दिशा में काम करेंगी।"

बतौर महिला प्रत्यासी, महिलाओ की जरुरत बखूबी बतायीं थी। यह एक मजबूत इसारा था आजमगढ़ के विकास के लिए। उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि

"...... इस सब, जो मैं कर सकूँ अपने सरकार के सामने वो बात रखूं ताकि यहाँ कि समस्या जब वहाँ रखूंगी तो सुनी जाएगी और यहाँ का विकास कार्य होगा।"

सांसद महोदया से आजमगढ़ में विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में #विश्वविद्यालय_अभियान कई बार संपर्क किया और इस जरुरत की ओर ध्यान आकर्षित किया। मैं खुद सांसद जी से आजमगढ़ में विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में बात किया। सांसद महोदया ने कहा,

"हां आप लोगों की मांग तो बिल्कुल सही है और मैं इसका पूरा समर्थन करती हूँ। राज्य सरकार को यहाँ एक विश्वविद्यालय देना चाहिए। लेकिन मैं इसमें क्या कर सकती हूँ? आप बताइये मुझसे क्या चाहते है?"

 मैंने उनसे आग्रह किया कि,

 "मैडम हम सरकार से मांग कर रहे है और सूबे की सरकार हमारी बात नहीं सुन रही है। आप सरकार से बात कर सकती है। आप सीo एमo को लेटर लिख सकती है। तो शायद आजमगढ़ को विश्वविद्यालय मिल जाय। इसके बाद सांसद महोदया ने आश्वासन दिया ठीक है, अभी तो मैं दिल्ली में हूँ लेकिन सरकार से बात करुँगी।" और आज तक बात होती रही .........

आजमगढ़ को विश्वविद्यालय न मिलने तक संघर्ष जारी रहेगा ......

राघवेंद्र यादव
विश्वविद्यालय अभियान


you may listen from mentioned link

https://www.youtube.com/watch?v=N-dNwIsS7kg

Friday, 11 November 2016

हालत - ए - शिक्षा

आज हमारे देश में कुछ स्कूलों में कुछ छोटे बच्चों को प्रवेश इस लिए नहीं दिए जा रहे है क्योंकि उनके माता पिता निरक्षर है। मुझे लगता है कि ये उसी मज़लिस के क्रूर सोच के पक्षधर है जो निरक्षर को निरक्षर तथा गरीब को और गरीब बनाने की साजिशे रचते है। इस लिए ऐसे मज़लिस के मज़मून की मज़ाल को समझना जरुरी है। जरा सोचिये जिस देश की सरकार सर्व शिक्षा अभियान जैसे महत्वपूर्ण मिशन चला रही हो। "पढ़ेगा भारत, बढ़ेगा भारत" जैसे वैचारिक नारे दिए जा रहे हो। ऐसे दौर में इस तरह के लोमहर्षक नियम बनाना इन महत्वपूर्ण मिशन को तमाचा मारने जैसा है और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तपके के साथ घोर अन्याय है। मैं इस देश की सरकार तथा राज्य सरकारों से यह उम्मीद करता हूँ कि ऐसे संवेदनशील मुद्दो से अंजान न बने, ऐसे स्कूलों को चिन्हित कर इनके संविधान को बदलवाए और अगर ये नहीं मानते है तो इनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए।
ये तो प्राथमिक शिक्षा का हाल है। अग़र हम उच्च शिक्षा पर नजर डाले तो इनकी वैचारिक हालत और भी निकम्मी है। शायद आज हमारे देश का कोई भी शख्स इस कथन से असहमत नहीं होगा की हमारे देश की उच्च शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा भाग चमचा युग में जी रही है। उपरोक्त दोनों दशाये वेहद खतरनाक है इन्हे सुधारने के लिए बड़े बदलाव की जरुरत है।
मेरे भारत, मेरे हिन्दोस्ताँ, मेरे इंडिया मैं तुमसे यही कहना चाहता हूँ कि तुम्हारी ये हालत हम जैसे लोग सुधारंगे………
राघवेन्द्र यादव
इन्कलाब - जिंदाबाद

Saturday, 1 October 2016

ये दोहरापन क्यों है?

 उत्तर प्रदेश सरकार से पूछ रहा हूँ कि ये दोहरापन क्यों है? आप विधान सभा में एरा विश्वविद्यालय लखनऊ, उत्तर प्रदेश विधेयक, 2015 पारित करने के लिए सदन में कहते है कि "यह विधेयक है विश्वविद्यालय  के बारे में और सैद्धान्तिक रूप से हम लोग किसी भी नए विश्वविद्यालय की स्थापना का कभी भी विरोध नहीं करते है।" अगर नए विश्वविद्यालय बनाने के सन्दर्भ में वाकयी आपके विचार ऐसे है तो यह सराहनीय विचार है और हम ऐसे विचार का स्वागत करते है। लेकिन यथार्थ कुछ और है। इसे मैं आपके विचार नहीं बल्कि कागजी नौटंकी मानता हूँ। क्योंकि उत्तर प्रदेश विधान परिषद में जब आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाये जाने पर सूबे के मुख्यमंत्री से सवाल पूछा गया तो सरकार के मंत्री जवाब दिए कि आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाया जाना प्रासंगिक नहीं है। इसका मतलब है कि वे आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाये जाने का विरोध कर रहे है। सूबे की सरकार का यह एक मनमाना जवाब था, जिसका यथार्थ से कोई लेना-देना नहीं था। इस जवाब ने हजारों आजमगढ़ियों को आहत किया था। मैं जानना चाहता हूँ कि अगर एक प्राइवेट कालेज को विश्वविद्यालय बनाने के लिए इतना मधुर और बौद्धिक विचार दिए गए तो आजमगढ़ में विश्वविद्यालय बनाने के लिए इतना निष्क्रिय और उलजुलूल उत्तर क्यों दिया गया? मैं सूबे की सरकार से पूछता हूँ कि "आजमगढ़ विश्वविद्यालय विधेयक" कब पारित होगा?








Thursday, 11 August 2016

आदिवासी हालात और दिवस

जोहार साथियों,
विश्व आदिवासी दिवस दुनिया के महत्वपूर्ण दिवसों में से एक है। अगर युo एनo के आकड़ो पर गौर करे तो दुनिया के 90 देशों में लगभग 370 मिलियन आदिवासी है। जिनके पास 7००० (सात हजार) भाषाएँ और 5००० (पांच हजार) अलग-अलग कल्चर है। आदिवासियों का मौखिक साहित्य अत्यंत समृद्ध है। लोक कथाओं, गीतों, कहावतों और मुहावरों की वाचिक परंपरा आदिवासी समुदायों में भरी-पड़ी है। 
 विश्व के विभिन्न देशों में निवासरत आदिवासियों के मानव अधिकार की सुरक्षा के लिए यु0 एन0 ने 1982 में एक सब-कमीशन बनाया। इस कमीशन ने यह पाया की आदिवासी गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, बंधुआ मजदूर और सामाजिक उपेक्षा जैसे समस्याओं से जूझ रहे हैं। इन समस्याओ  के निराकरण हेतु यु0 एन0 वर्किंग ग्रुप के सब-कमीशन ने 9 अगस्त 1982 में  विश्व आदिवासी दिवस मनाने का प्रस्ताव यु0 एन0 जनरल असेम्बली में रखा जिसे 1994 में यु0 एन0 जनरल असेम्बली ने स्वीकार कर लिया। 9 अगस्त 2016 को विश्व आदिवासी दिवस, शिक्षा के अधिकार को समर्पित है।
आदिवासियों का अपना धर्म है। ये प्रकृति को अपना ईस्ट देव मानते है और जंगल, पहाड़, नदियों..... आदि की आराधना करते हैं।  लेकिन दूभर हालात होने के नाते ईसाई मशीनरी, इस्लामिक मशीनरी, हिन्दू मशीनरी....... आदि ने कुछ लोभ देकर या जबरन धर्म परिवर्तन करवाया। परंतु आज ये स्वयं की धार्मिक पहचान के लिए संगठित हो रहे हैं। अगर हम भारत के आदिवासियों की बात करे तो ब्राहमेनिकल मैकेनिजम ने इन्हें कभी आदमी के रूप में स्वीकार ही नहीं किया। लेकिन यह भी एक विडम्बना है की  "रामायण", जिसपर हिन्दू धर्म का ताना-बाना  बुना गया है, के रचयिता महर्षि वाल्मीकि जी आदिवासी थे। 
हम आज 23वे विश्व आदिवासी दिवस को मना रहे है। लेकिन सरकारें जो प्रयास दूसरे विश्व दिवसों को मनाने में करती है वो विश्व आदिवासी दिवस मनाने में नहीं करती। इस दिवस पर मीडिया में भी गाहे-बगाहे ही खबरें, लेख  या संपादकीय दिखती है। जो यह दर्शाता है कि लोग आदिवासियों के जीवन स्तर में सुधार को लेकर कितना जागरूक या चिंतित है। आज से दो साल बाद हम विश्व आदिवासी दिवस का 25वा  विश्व आदिवासी दिवस मनाएंगे। अगर 25वे  विश्व आदिवासी दिवस को यु0 एन0 विश्व आदिवासी वर्ष के रूप में मनाये तो आदिवासियों के जीवन स्तर में सुधार लाने का एक बड़ा प्रयास होगा।


राघवेंद्र यादव 
शोधार्थी 
सेंटर फॉर स्टडीज एंड रिसर्च इन इकोनॉमिक्स एंड प्लानिंग 

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ गुजरात